पद्मश्री पूर्णिमा से भास्कर की चर्चा:रिजल्ट नहीं, सही बेसिक और डिसिप्लिन से निकलते हैं चैंपियन, सिस्टम बदलने से तीरंदाजी में आगे आ रहे युवा

पद्मश्री और टाटा आर्चरी अकादमी की मुख्य कोच पूर्णिमा महतो इन दिनों रायपुर में चल रही नेशनल जूनियर आर्चरी चैंपियनशिप में पहुंची हैं। इस दौरान उन्होंने भास्कर से बातचीत में भारतीय तीरंदाजी की ग्रोथ, छत्तीसगढ़ की संभावनाओं, सही उम्र, खेल और नौकरी के संतुलन सहित कई मुद्दों पर बात की। बातचीत के प्रमुख अंश- पूर्णिमा महतो ने कहा- छत्तीसगढ़ में अभी विकसित हो रहा है तीरंदाजी का स्ट्रक्चर Q. टाटा आर्चरी अकादमी की तीरंदाजी ग्रोथ में क्या भूमिका रही है?
– 1996 में देश की पहली आर्चरी अकादमी की शुरुआत हुई थी। पहले टीम इवेंट में सिर्फ कंपाउंड के खिलाड़ी नजर आते थे, लेकिन अब रिकर्व में भी देश से इंटरनेशनल लेवल के खिलाड़ी निकल रहे हैं। Q. कहा जाता है कि मेडल जीतने के बाद पहचान मिलती है। ऐसा क्यों था?
– हमारे समय में ऐसा ही था। मेडल के बाद ही रिकग्निशन मिलता था। लेकिन अब हालात काफी बदल चुके हैं। स्टेट लेवल टूर्नामेंट, खेलो इंडिया गेम्स, आर्चरी अकादमियां और सरकार मिलकर खेल को सपोर्ट कर रहे हैं। Q. रिकर्व-कंपाउंड में छत्तीसगढ़ पिछड़ा क्यों, क्या वजह है?
– छत्तीसगढ़ में तीरंदाजी का स्ट्रक्चर अभी विकसित हो रहा है। यह मेंटल, फिजिकल और टेक्निकल खेल है, इसलिए सही कोच, इक्विपमेंट, ट्रेनिंग जरूरी है। Q. तीरंदाजी की सही उम्र क्या है?
– 8 साल की उम्र सबसे उपयुक्त है। दो से तीन साल में खिलाड़ी अपने बेसिक क्लियर कर लेता है। इसके बाद अंडर-14 में एंट्री होती है। 8 से 10 साल की उम्र में चैंपियन बनना जरूरी नहीं है, बल्कि बेसिक बनाना जरूरी है। Q. युवाओं के लिए क्या संदेश है?
-हार से सीखें, मेहनत का कोई शॉर्टकट नहीं होता। खेल के साथ करियर लक्ष्य तय करें। Q. कोटे से नौकरी मिलने के बाद खेलना छोड़ देते हैं, आपकी राय?
– स्पोर्ट्स कोटे से नौकरी मिलने के बाद भी खेल प्राथमिकता में रहना चाहिए और परफॉर्मेंस के लिए स्पष्ट मापदंड होने चाहिए।

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