छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव जिले में पलाश के फूलों और पालक से प्राकृतिक रंग और गुलाल बनाया जा रहा है। होली त्योहार से पहले मां बम्लेश्वरी समूह की महिलाएं इस काम में जुटी हैं। समूह को लगभग 3 क्विंटल रंग का ऑर्डर मिला है। रविवार को ग्राम फाफामार में महिलाओं को रंग गुलाल बनाने की विशेष ट्रेनिंग दी गई। इसमें ग्राम सोनवानी टोला, टीपानगढ़, तेंदूटोला और मासुल की महिलाएं शामिल हुई। अब तक तीन जिलों के 100 गांवों की 5000 से अधिक महिलाएं इस अभियान से जुड़ चुकी हैं। पलाश के फूल और पालक से बन रहा गुलाल हरियाली बहिनी अभियान प्रमुख शिव कुमार देवांगन ने बताया कि पलाश के फूल और पालक से गुलाल तैयार किया जा रहा है। साथ ही पलाश के फूलों का पाउडर भी बनाया जा रहा है। पद्मश्री फूलबासन यादव ने हरियाली बहिनी की सराहना करते हुए कहा कि रंग-गुलाल की गुणवत्ता पर विशेष ध्यान दें। 15-20 साल पहले तक लोग पलाश के फूलों को गर्म पानी में उबालकर होली खेलते थे। केमिकल युक्त रंगों के चलन ने इस परंपरा को कमजोर कर दिया। अब फिर से इस परंपरा को जीवित करने का प्रयास किया जा रहा है। 3 क्विंटल गुलाल का ऑर्डर पलाश के फूल औषधीय गुणों से भरपूर हैं। ये त्वचा और स्वास्थ्य के लिए लाभदायक हैं। प्रशिक्षण के दौरान ही 3 क्विंटल गुलाल का ऑर्डर मिल चुका है। 14 मार्च को होली है, इसलिए गांव-गांव में लगातार प्रशिक्षण दिया जा रहा है। यह पहल महिलाओं को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने में भी मदद कर रही है। बता दें कि मां बम्लेश्वरी जनहितकारी समिति, पताल भैरवी मंदिर परिसर इसका हेड ऑफिस है। पलाश के फूलों से तैयार होने वाले औषधि लाभकारी रंग गुलाल लोगों को आकर्षित कर रही है। इस कार्य से गांव-गांव में महिलाएं स्वस्थ सहायता समूह से जुड़कर अपना व्यापार व्यवसाय खड़ा कर रहे हैं, अपनी आजीविका का बहुत बड़ा साधन तैयार कर ग्रामीण परिवेश को मजबूत बनाने का कार्य कर रही है। इन बीमारियों के इलाज में उपयोग ग्रामीण क्षेत्र में बहुतायत मात्रा में मिलने वाले पलाश-टेसू के फूल बड़ी मात्रा में एकत्रित किए गए हैं। आयुर्वेद में इन फूलों का उपयोग औषधि बनाने में किया जाता है। इसमें रोगाणु रोधी और एंटीऑक्सीडेंट गुण होते हैं, जो लीवर डायरिया बीमारियों के इलाज में प्रयोग किया जाता है। पलाश का पौधा बुखार चर्म रोग आदि के इलाज में उपयोगी है


