जोधपुर के ओसियां स्थित महावीर जैन मंदिर में भगवान महावीर की मूर्ति बालू मिट्टी और दूध से निर्मित है। प्रतिमा पर 2 से 3 साल में सोने की परत चढ़ाई जाती है। 7वीं सदी में निर्मित इस मंदिर को मारवाड़ का खजुराहो भी कहा जाता है। बताया जाता है कि जैन आचार्य रत्नप्रभसूरी की इसी तपोभूमि से ओसवाल समाज की उत्पत्ति हुई थी। उन्हें चातुर्मास के दौरान सच्चियाय माता ने दर्शन देकर ओसियां में रुकने की सलाह दी थी। इसके बाद यहां कई लोगों ने जैन धर्म अपना लिया। ओसियां में ओसवाल समाज की कुलदेवी सच्चियाय माता का मंदिर भी है। मंदिर को रिटायर्ड जज ने नैतिक व आध्यात्मिक संस्कारों के तालमेल का अजूबा बताया है। दैनिक भास्कर में पढ़िए ओसियां स्थित पश्चिमी भारत के सबसे पुराने जैन मंदिर का इतिहास जैन इतिहासकारों के अनुसार, राजस्थान में जैन तीर्थ स्थलों में मारवाड़ के खजूराहो कहे जाने वाले ओसियां का प्रमुख स्थान है। 7वीं सदी में यहां निर्मित महावीर जैन मंदिर में भगवान महावीर स्वामी की अद्भुत प्रतिमा विराजित है, जो बालू मिट्टी व दूध से निर्मित है। स्वर्ण अभिमंडित यह प्रतिमा भगवान महावीर की समय की बताई जाती है। यहीं से ओसवंश यानी ओसवाल समाज की उत्पत्ति हुई। महावीर स्वामी की प्रतिमा पर प्रत्येक दो-ती वर्ष में स्वर्ण विलेपन (सोने की परत) किया जाता है।
इसी ओसियां में ओसवाल समाज की कुलदेवी मां सच्चियाय का मंदिर है। जहां हिंदू-जैन सहित विभिन्न धर्मावलंबियों के लिए प्रमुख आस्था का केंद्र है। इस पर प्रकाशित ‘प्राचीन तीर्थ ओसियां ओसवाल वंश का इतिहास’ ग्रंथ में रिटायर्ड जस्टिस जसराज चौपड़ा का संदेश में भी लिखा गया है- ‘एक छोटे से नगर, जहां एक भी ओसवाल परिवार स्थाई निवास नहीं है। वहां नैतिक व आध्यात्मिक संस्कारों से ओतप्रोत संस्थान का संचालन करना अपने आप में अजूबा है…’। देखें मंदिर की अद्भुत तस्वीरें… भगवान महावीर को समर्पित प्रमुख स्थल ओसियां में महावीर जैन मंदिर 24वें जैन तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी को समर्पित है। इस स्थल के ओसियां नामकरण को लेकर कहा जाता है कि प्राचीन काल में यह नगर उक्कल नगर और ओसियां नगर के नाम से जाना जाता था। आचार्य रत्नप्रभ सूरी एक समय अपने 500 शिष्यों के साथ गुर्जर देश को पार कर इस मरुभूमि पर पहुंचे थे। जैन आचार्य ने कराई थी एक साथ दो जिनालय की स्थापना कहते हैं कि जैन आचार्य रतन प्रभ सूरीश्वर महाराज ने एक साथ दो जिनालय की स्थापना करवाई थी। जैनाचार्य के अनुसार, 2470 वर्ष पहले सच्चियाय माताजी प्रकट हुए और कहा कि वे आज से सभी जैनों की कुलदेवी कहलाएंगी। फिर जैन आचार्य मणिप्रभ सागर सूरीश्वर की निश्रा में इस मंदिर का पुनः जीर्णोद्धार करवाया गया। इसकी देखरेख और प्रबंधन सेठ श्री मंगलसिंह रतनसिंह देव की पेढ़ी द्वारा की जाती है। ओसवाल समाज की हुई थी उत्पत्ति ओसियां के सच्चियाय माता मंदिर में मिले 956 ईस्वी के एक शिलालेख के अनुसार, इसे 783 ईस्वी में राजा वत्सराज द्वारा गुर्जर-प्रतिहार वंश के दौरान बनाया गया था। जो इसे पश्चिमी भारत में सबसे पुराना जीवित जैन मंदिर बनाता है। जैन किंवदंतियों के अनुसार, आचार्य रत्नप्रभासूरि ने (457 ईसा पूर्व) एक प्रमुख ब्राह्मण के बेटे के जीवन को बहाल किया था। यहां तक कि इस दौरान ग्रामीणों ने जैन धर्म अपना लिया और इस स्थान से ओसवाल समुदाय की उत्पत्ति हुई। सच्चियाय माता मंदिर की रक्षक देवी बन गईं। रत्नप्रभासूरि ने तब उनका नाम सच्चियाय माता रखा क्योंकि उन्होंने रत्नप्रभासूरि को चातुर्मास के दौरान ओसियां में रहने की सच्ची सलाह दी थी। वंश की रक्षा करती है देवी जैन समाज सच्चियाय माता की पूजा एक सम्यकत्वी (अर्थात जिसके पास रत्नत्रय है) देवी के रूप में करते हैं, जो भूमि और ओसवालों के वंश की रक्षा करती हैं। कहा जाता है कि इस गांव में रत्नप्रभासूरी ने ओसवाल वंश की स्थापना की थी। उन्होंने अहिंसा के सच्चे मार्ग का अनुसरण किया था।
मंदिर में पाए गए 953 ई. के एक शिलालेख में कहा गया है कि ओसियां हर जाति के अलंकृत मंदिरों से समृद्ध था। मंदिर का पहला जीर्णोद्धार 956 ई. में हुआ था। जॉर्ज मिशेल मौजूदा मुख्य मंदिर को अधिकांश 11वीं शताब्दी के रूप में वर्णित करते हैं। इसमें 8वीं शताब्दी के कुछ हिस्से हैं। तोरण (अलंकृत प्रवेश द्वार) 1015 ई. का है। मंदिर को मुस्लिम शासकों ने लूटा था और कोई भी मूल मूर्ति नहीं बची। 1016 ई. में, मंदिर का जीर्णोद्धार किया गया, और एक मान स्तंभ का निर्माण किया गया। मंदिर का बाद में 12वीं शताब्दी में जीर्णोद्धार किया गया। जीवित स्वामी की छवि उकेरी जैन धर्म के श्वेतांबर संप्रदाय से संबंधित मंदिर के तोरण पर तीर्थंकर की जीवितस्वामी छवि उकेरी गई है। इस मंदिर को गुर्जर-प्रतिहार वंश की वास्तुकला का प्रमाण माना जाता है। मंदिर का गर्भगृह, मंडप से युक्त घेरदार दीवार से घिरा है। इसके अलावा यहां एक बंद हॉल, एक खुला बरामदा और एक अलंकृत तोरण (प्रवेश द्वार) और उत्कृष्ट मूर्तियां हैं। मंदिर में एक बंद और दो स्तंभों वाले हॉल हैं, जो मुख्य मंदिर की धुरी को बढ़ाते हैं। गर्भगृह के सामने का तोरण तीर्थंकरों की अलंकृत नक्काशी से समृद्ध है। इनमें 12 पद्मासन मुद्रा में और 4 कायोत्सर्ग मुद्रा में हैं।
इस मंदिर में सात सहायक मंदिर हैं, जिनमें से चार गर्भगृह के पूर्वी और तीन पश्चिमी भाग में हैं। ये मंदिर प्रदक्षिणा पथ द्वारा जुड़े हुए हैं । मंदिर के पूर्वी भाग में महावीर और पार्श्वनाथ की आकृतियां हैं। मंदिर के ऊपर शिखर का निर्माण बाद में मारू-गुर्जर वास्तुकला के साथ किया गया था। पढ़ें राजस्थान के अन्य जैन मंदिरों का रोचक इतिहास… वह तीर्थ जहां भगवान महावीर के कानों में ठोकी कीलें:यहां पत्थरों पर पैरों की निशान की पूजा; दुनियाभर से आते हैं लाखों श्रद्धालु गाय के दूध से निकली थी भगवान महावीर की प्रतिमा:आज भी ग्वालों के वंशज के बगैर नहीं निकलती है रथ यात्रा, शिखर पर सोने के कलश दुनिया में सिर्फ यहां मूंछों वाले भगवान महावीर स्वामी:चमत्कार देख महाराणा कुंभा हो गए थे नतमस्तक, सुबह-शाम बदल जाता है चेहरे का भाव


