पीडब्ल्यूडी की आपत्ति के बाद ट्रॉमा सेंटर के वार्ड डॉक्टरों के पुराने आवास तोड़कर बनेंगे

ट्रॉमा सेंटर के लिए नए वार्ड का निर्माण अब पास ही में डॉक्टरों के पुराने आवास की जगह करवाने की तैयारी की जा रही है। आरएसआरडीसी ने छत पर नए निर्माण कार्य करने से हाथ खींच लिए हैं। पीडब्ल्यूडी ने भी इसे सेफ नहीं माना है। पीबीएम परिसर स्थित मेडिसिन आईसीयू के सामने तीन-चार पुराने सरकारी आवास हैं, जिन्हें पीडब्ल्यूडी ने अनसेफ घोषित कर रखा है। उन्हें गिराकर उस स्थान पर अब ट्रॉमा सेंटर के लिए वार्ड बनाया जाएगा। मेडिकल कॉलेज प्रिंसिपल ने यह स्थान तय किया है, लेकिन ट्रॉमा सेंटर प्रभारी डॉ. बीएल खजोटिया इसके पक्ष में नहीं हैं। उनका मत है कि ट्रॉमा की छत पर ही वार्ड बनाया जाए। उनका कहना है कि छत के दूसरे हिस्से में पहले से दो वार्ड बने हुए हैं। रैंप के बिना उनका उपयोग नहीं हो पा रहा है। छत पर ही रैंप भी प्रस्तावित है। आरएसआरडीसी ने इसी को प्लान करके दो साल पहले टेंडर किए थे। अब जगह बदलने से लागत बढ़ जाएगी। समय भी लगेगा। डॉक्टरों के पुराने आवास के स्थान पर इमरजेंसी मेडिसिन यूनिट बनाई जा सकती है। इस मुद्दे को लेकर गुरुवार को उनकी प्रिंसिपल से काफी देर तक बहस हुई, लेकिन प्रिंसिपल ने स्पष्ट कर दिया कि वार्ड नीचे ही बनाया जाएगा। रैंप बाहर से निकाला जा सकता है। आरएसआरडीसी से कह दिया गया है कि वे नए स्थान पर निर्माण कार्य की तैयारी करें। वहीं दूसरी तरफ ट्रॉमा की छत पर किए गए गड्ढों को बंद करने का काम शुरू कर दिया गया है। फाल्स सीलिंग भी वापस ठीक की जा रही है। हालांकि फाल्स सीलिंग में बिजली के सभी तार खुले पड़े हैं। छत पर जहां से पानी गिरा था, उस स्थान पर लोहे के सरिए साफ नजर आ रहे हैं। उस स्थान से छत की मरम्मत नहीं की गई है। बताया जा रहा है कि शुक्रवार को प्रभारी मंत्री का दौरा प्रस्तावित है। उसे देखते हुए काम के नाम पर लीपापोती की जा रही है। गौरतलब है कि ट्रॉमा सेंटर की छत पर वार्ड, रैंप और लिफ्ट लगाने के लिए रोड सेफ्टी के तहत तीन साल पहले 1.78 करोड़ रुपए मंजूर हुए थे। आज तक यह काम पूरा नहीं हो पाया है। एमसीएच बिल्डिंग में चल रहा है वार्ड ट्रॉमा सेंटर में हड्डी रोग विभाग का एक वार्ड एमसीएच बिल्डिंग में चल रहा है। निर्माण कार्य के कारण वहां से वार्ड शिफ्ट कर दिया गया था। इससे मरीजों और डॉक्टरों दोनों को ही काफी परेशानी उठानी पड़ती है। ट्रॉमा की छत पर 100 बेड की कैपेसिटी वाले दो वार्ड बने हुए हैं। उनमें बेड भी रखे हैं, लेकिन सालों से वे किसी काम नहीं लिए जा सके। क्योंकि वहां तक मरीजों को पहुंचाने के लिए रैंप और लिफ्ट दोनों ही नहीं है। योजना के तहत पीबीएम की मेन बिल्डिंग से ऑर्थो के जेड और वाई वार्ड ट्रॉमा में ही शिफ्ट होने थे, लेकिन अब भी वहीं चल रहे हैं। डॉक्टरों को तीन जगह चक्कर लगाने पड़ते हैं। मरीजों को भी भटकना पड़ता है। ट्रॉमा सेंटर के आगे के हिस्से का निर्माण एक दानदाता के सहयोग से हुआ था, जबकि पीछे का भाग यूआईटी ने बनाया था। निर्माण की गुणवत्ता को लेकर पहले ही काफी सवाल खड़े हो चुके हैं। बारिश में छत से पानी गिरना, सीलन आना आम बात है। भास्कर इनसाइट छत पर बीम खोदने से हुआ था सुराख, निर्माण में बताई खामियां ट्रॉमा सेंटर के लिए नए वार्ड, रैंप और लिफ्ट लगाने के लिए छह महीने पहले टेंडर किए गए थे। आरएसआरडीसी ने काम शुरु करवाया। छत पर बीम के लिए खुदाई की गई तो सुराख हो गया। कुछ दिन बाद बारिश हुई तो उसमें से पानी आ गया, जिससे ट्रॉमा सेंटर की फाल्स सीलिंग टूट गई। इस घटना के बाद आईसीयू सहित एक तरफ का भाग बंद कर दिया गया। इस तोड़ा फोड़ी को लेकर काफी बवाल मचा। आरएसआरडीसी ने पुराना स्ट्रक्चर ही गलत करार दे दिया और एक स्वतंत्र एजेंसी से जांच कराने को कहा। दरअसल ट्रॉमा सेंटर के आगे का भाग एक निजी ट्रस्ट के सहयोग से बना था। ट्रस्ट के ही एक प्रतिनिधि आर्किटेक्ट ने उसे डिजाइन किया था। छत में सुराख को लेकर प्रतिनिधि और आरएसआरडीसी के अभियंताओं के बीच प्रिंसिपल के कक्ष में गरमा गरम बहस तक हो गई। उसके बाद से ही काम बंद पड़ा है। पीडब्ल्यूडी ने कहा- छत पर निर्माण सेफ नहीं : ट्रॉमा सेंटर की छत पर वार्ड और रैंप के निर्माण कार्य की जांच पीडब्ल्यूडी से कराई गई थी। विभाग के इंजीनियरों की टीम ने जांच के बाद माना कि बिल्डिंग पर नया निर्माण कराना सेफ नहीं है। एक्सईएन राजीव गुप्ता ने बताया कि बिल्डिंग के स्ट्रक्चर में प्रॉब्लम है। छत का ट्रीटमेंट प्रॉपर नहीं हुआ। इसलिए इस पर दूसरी बिल्डिंग खड़ी करना सेफ नहीं होगा। आरएसआरडीसी भी इससे सहमत है। एईएन अशोक चौहान का कहना है कि प्रिंसिपल के बताए स्थान पर वार्ड बना दिया जाएगा। हालांकि इससे लागत बढ़ जाएगी। टेंडर में नींव की खुदाई का एस्टीमेट नहीं है। उसे रिवाइज करना पड़ेगा।

FacebookMastodonEmail

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *