स्वास्थ्य विभाग की तमाम कोशिशों के बाद भी हरदा जिला पुरुष नसबंदी के मामले में फिसड्डी साबित हो रहा है। एक साल में पूरे जिले से मात्र 12 पुरुषों ने स्वेच्छा से नसबंदी करवाई है। तमाम प्रचार-प्रसार के बावजूद विभाग इस साल भी पुरूष नसबंदी के लक्ष्य को हासिल नहीं कर पाया है। स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों की माने,तो पुरुषों में परिवार नियोजन ऑपरेशन को लेकर कई तरह के भ्रांतियां हैं, जिसके चलते पुरुष स्वेच्छा से आगे नहीं आते। जानकारी के अनुसार, वर्ष 2021 से 2024 तक चार सालों में जहां 7 हजार 24 महिलाओं ने परिवार नियोजन अपनाया है। वहीं इन चार वर्षों में मात्र 53 पुरुष ही नसबंदी के लिए आगे आए हैं। हम चालू वर्ष 2024 में 142 पुरुष नसबंदी का टार्गेट की बात करें तो इस लक्ष्य के मुकाबले केवल 12 पुरुषों ने ही परिवार नियोजन ऑपरेशन करवाया। शासन द्वारा जनसंख्या नियंत्रण के लिए तमाम अभियान चलाए जा रहे हैं, साथ ही पुरुषों को परिवार नियोजन ऑपरेशन के लिए 3 हजार प्रोत्साहन राशि दी जाती है, लेकिन नतीजा सिफर है। जिले के मेडिकल ऑफिसर कमलेश गौड़ ने बताया कि पुरुषों को किसी प्रकार की तकलीफ नहीं होती, उसके बाद भी पुरुष वर्ग परिवार नियोजन के लिए आगे नहीं आ रहा, वहीं एक ग्रामीण पुरुष ने बताया कि इससे कमजोरी आती हैं इसलिए पुरुष परिवार नियोजन नहीं अपनाते हैं। जबकि परिवार नियोजन अपनाने में ना ही पुरुषों और ना ही महिलाओं को किसी तरह की कमजोरी आती है। नसबंदी ऑपरेशन के बाद अस्पताल या घर में सात दिन के अंदर मौत होने पर आश्रित को चार लाख रुपए मुआवजा मिलता है। इसमें 50 प्रतिशत अंश केंद्र सरकार का और 50 प्रतिशत अंश राज्य सरकार का होता है। नसबंदी ऑपरेशन के बाद 8 से 30 दिन के अंदर मौत होने पर एक लाख रुपए की क्षतिपूर्ति राशि दी जाती है।


