पुलिस की 4 SIT नहीं ढूंढ सकी नाबालिग को:7 साल से लापता बच्ची को तलाशेगी CBI, पिता बेच चुका 14 बीघा जमीन

जब से मेरी बेटी गुम हुई है, तभी से मैंने खेती-बाड़ी छोड़ दी है। उसी की तलाश में समय बीत रहा है। मेरे पास 20 बीघा जमीन थी, उसमें से 14 बीघा जमीन बिक चुकी है। जो 6 बीघा बची है वो बटाई पर दे दी है। ये कहना है गजेंद्र चंदेल का, जो पिछले 7 साल से अपनी बेटी गीता की तलाश कर रहे हैं। गुना जिले के सिरसी गांव में रहने वाली गीता 1 अगस्त 2017 को अचानक लापता हो गई थी। तब उसकी उम्र 17 साल थी। पिता गजेंद्र ने इस मामले में आरोन के तत्कालीन टीआई अभय सिंह परमार की भूमिका पर सवाल खड़े किए थे। इसी के साथ ग्वालियर हाईकोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका भी दायर की थी। 17 दिसंबर को ग्वालियर हाईकोर्ट ने इस केस की सुनवाई करते हुए गीता की तलाश का जिम्मा सीबीआई को सौंप दिया है। कोर्ट ने अपने फैसले में पुलिस के रवैये पर सख्त टिप्पणी भी की है। कोर्ट ने कहा- इस केस के इन्वेस्टिगेशन में एमपी पुलिस का रवैया बेहद अन प्रोफेशनल रहा है। पिछले सात साल में कोर्ट ने कई बार ऑर्डर दिए, मगर पुलिस ने अपनी गैरजिम्मेदार वर्किंग स्टाइल में कोई बदलाव नहीं किया। यदि नाबालिग मप्र में सुरक्षित नहीं है और पुलिस उसे ढूंढ नहीं पा रही है तो सीबीआई को केस ट्रांसफर करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। कोर्ट ने गुना एसपी को 15 दिन के भीतर केस से जुड़े सारे दस्तावेज सीबीआई को सौंपने के लिए कहा है। कोर्ट के इस फैसले के बाद दैनिक भास्कर ने आरोन के सिरसी गांव पहुंचकर समझा कि आखिर गीता कैसे लापता हुई थी? पुलिस की जांच में क्या लापरवाही रही, गीता के पिता से भी बात की। पढ़िए पूरी रिपोर्ट पिता बोले- सात महीने में जन्मी, मुश्किल से पाला
भास्कर की टीम गुना जिले से 45 किमी दूर सिरसी गांव पहुंची। गांव के सबसे आखिर में गीता के पिता गजेंद्र चंदेल अकेले मिट्टी की झोपड़ी में रहते हैं। गीता के जन्म की कहानी बताते हुए गजेंद्र ने कहा कि गीता का जन्म सातवें महीने में हुआ था। जब वह पैदा हुई तो वह काफी नाजुक थी। डॉक्टर ने उसे दो महीने तक रूई की खोल में रखने के लिए कहा था। उसकी मां दूध नहीं पिला सकती थी, तो मैंने उसे बकरी का दूध दिया। गजेंद्र कहते हैं गीता की मां ने उसे बस जन्म दिया था, लेकिन मैंने उसकी पूरी देखभाल की। गीता की देखभाल ठीक तरीके से हो, इसलिए पूरे पांच साल तक मैं खेत पर नहीं गया। साल 2013 में गीता की मां भी गुजर गई। गजेंद्र बताते हैं कि गीता ने गांव के स्कूल में आठवीं तक की पढ़ाई की है। नौवीं के लिए उसका आरोन के स्कूल में एडमिशन कराया। उसे रोज आरोन छोड़ने जाता था। रोज-रोज उसे लाना ले जाना कठिन हो रहा था इसलिए उसने पढ़ाई छोड़ दी। वह घर पर ही रहती थी, मैं उसे अकेला नहीं छोड़ता था। जिस दिन गीता गायब हुई उस दिन को याद कर गजेंद्र कहते हैं कि मैं खाना बना रहा था। जब वो नहीं मिली तो उसकी हर जगह तलाश की। मैंने 14 दिनों तक अन्न का एक दाना नहीं खाया। अब जानिए क्या रहा पुलिस का रवैया
गजेंद्र ने बताया कि बेटी को ढूंढने के लिए मैने दिन-रात एक कर दिया। बार-बार थाने गया, मगर पुलिस ने कोई सुनवाई नहीं। इसके बाद गुना के तत्कालीन एसपी से मिला। मेरे सामने ही उन्होंने आरोन थाने के तत्कालीन टीआई अभय सिंह परमार को फोन किया और बोला- ‘तुम्हारे सिरसी का यह गजेंद्र चंदेल मेरे पास खड़ा है। ये बार- बार मेरे पास आ रहा है इसकी गुमशुदा बेटी गीता को ढूंढो।’ इसके बाद मैं आरोन थाने पहुंचा तो टीआई ने मुझसे कहा- ‘तेरी बेटी तेरे साथ नहीं रहना चाहती वो जितेंद्र प्रजापति के साथ शादी करना चाहती है इसलिए तू राजीनामा कर ले।’ मैंने कहा कि हां साहब मैं राजीनामा कर लूंगा। वो मिल जाए तो मैं उसकी शादी भी उसी से करने के लिए तैयार हूं। टीआई ने मुझ पर राजीनामे का दबाव बनाया, लेकिन मैंने कहा कि जब बेटी मिलेगी तभी राजीनाम करूंगा। पुलिस ने जीतेंद्र प्रजापति का नाम क्यों लिया? ये पूछने पर गजेंद्र ने बताया कि पुलिस ने मुझे कहा कि जीतेंद्र और गीता की आपस में बातचीत थी। जितेंद्र ने गीता को एक मोबाइल दिलाया था। वो मोबाइल मैंने पुलिस को दे दिया। एक दिन जीतेंद्र की बहन सविता मेरे घर आई थी। उसने कहा कि गीता का आधार कार्ड और डॉक्यूमेंट दे दो मैं अपने भाई की शादी गीता से करा दूंगी। 4 एसआईटी बनी, एक भी गीता को ढूंढ नहीं सकी
गीता के पिता गजेंद्र चौहान कहते हैं कि तत्कालीन आरोन थाना प्रभारी अभय सिंह और जीतेंद्र प्रजापति ने मेरी बेटी को गायब किया है या कहीं बेच दिया है। मैंने डीआईजी को इस बारे में बताया था। ये भी कहा था कि जब तक ठीक तरीके से जांच नहीं होती तब तक उसका पता नहीं चलेगा, क्योंकि दोनों को पता है कि मेरी बेटी कहां है। गजेंद्र चंदेल ने अक्टूबर 2017 में ही गीता को ढूंढने के लिए बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दाखिल की थी। कोर्ट ने इस मामले में एसआईटी का गठन कर गीता को तलाश करने के निर्देश दिए थे। साथ ही डीजीपी का शपथ पत्र मांगा था। उस दौरान पीएचक्यू ने तत्कालीन एसपी राहुल कुमार लोढ़ा के नेतृत्व में एसआईटी का गठन किया था। इसकी मॉनिटरिंग का जिम्मा तत्कालीन ग्वालियर डीआईजी एके पांडे को सौंपा था। एसआईटी ने 150 से ज्यादा लोगों से पूछताछ की थी। इस दौरान सोनू कलावत नाम के युवक ने बताया था कि वह जानता है कि गीता की डेडबॉडी कहां छिपाई गई है। पुलिस ने सोनू कलावत की निशानदेही पर ही ढिमरयाई नाले के बगल से खुदाई भी कराई, लेकिन पुलिस को कुछ नहीं मिला। चार लोगों का नार्को टेस्ट हुआ, विभागीय जांच भी हुई
पुलिस की इस लापरवाही को लेकर तत्कालीन आरोन थाना प्रभारी अभय प्रताप सिंह, एसआई जॉर्ज क्रिस्टो और एसआई सुल्तान सिंह रावत के खिलाफ विभागीय जांच भी की गई थी। जॉर्ज क्रिस्टो ने तो गीता की तलाश किए बगैर कोर्ट में चालान पेश कर दिया था। एसआई सुल्तान सिंह ने जीतेंद्र प्रजापति को 55 दिन बाद गिरफ्तार किया था। लेकिन बाद में उसे छोड़ दिया। विभागीय जांच के बाद तीनों की एक-एक वेतन वृद्धि रोकी गई थी। इसके अलावा गीता के पिता गजेंद्र, जीतेंद्र प्रजापति, उसकी बहन सविता और सोनू कलावत का नार्को टेस्ट हुआ था। इस टेस्ट के दौरान सविता ने किसी पुलिस अधिकारी का जिक्र किया था, मगर नाम नहीं बताया था। पुलिस ने इसे लेकर कोई कार्रवाई नहीं की। एमपी पुलिस अकुशल और गैरजिम्मेदार: हाईकोर्ट
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में पुलिस के रवैये पर सख्त टिप्पणी की है। गजेंद्र की तरफ से कोर्ट में पैरवी करने वाले एडवोकेट अनिल श्रीवास्तव के मुताबिक कोर्ट ने अपने फैसले में लिखा कि ये याचिका मप्र पुलिस की अकुशलता और उसके गैरजिम्मेदाराना रवैये को दिखाती है। कोर्ट ने कई बार पुलिस की कार्यप्रणाली पर टिप्पणी की इसके बाद भी पुलिस ने केस के इन्वेस्टिगेशन में लापरवाही बरतना नहीं छोड़ा। कोर्ट ने एसडीओपी दीपा डोडवे को लेकर भी टिप्पणी की, कहा- वे कई बार कोर्ट के सामने पेश हुईं, मगर उन्होंने इन्वेस्टिगेशन को लेकर अपना ढुलमुल रवैया नहीं बदला। पुलिस केवल कागजी कार्रवाई कर कीमती समय बर्बाद करती रही। कोर्ट ने ये भी कहा कि पुलिस को आज तक ये तक पता नहीं चला कि बच्ची जिंदा है या नहीं। केस से जुड़े अधिकारी बोले- मामला अब सीबीआई के पास
इस केस को लेकर भास्कर ने आरोन के तत्कालीन टीआई अभय प्रताप सिंह से बात की तो वे बोले- मैंने गीता को ढूंढने की हरसंभव कोशिश की थी। खुद पर लगे आरोपों को लेकर बोले कि मैं ज्यादा कुछ नहीं कहना चाहता। विभागीय जांच में निर्दोष साबित हुआ हूं। वहीं, एसडीओपी दीपा डोडवे भी सफाई में कुछ कहने से इनकार कर दिया।

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