पूर्व विधायक की अफसर को धमकी:सदन में वैक्सीन की बात मेंटल हॉस्पिटल तक पहुंची, बुजुर्ग दोस्तों का झूला ‘कॉम्पिटिशन’

नमस्कार राजस्थान विधानसभा में माननीय विधायक ने वैक्सीन से हार्ट अटैक आने की बात कहते हुए मुद्दा उठा दिया। दौसा में पूर्व विधायक ने नगर पालिका के ईओ को जमकर धमकाया, कहा-मुंह से खाया नाक से निकाल लूंगा। श्रीगंगानगर में एक महीने पहले बने नेशनल हाईवे के ‘फेफड़े’ बाहर आ गए। राजनीति और ब्यूरोक्रेसी की ऐसी ही खरी-खरी बातें पढ़िए, आज के इस एपिसोड में.. 1. ‘वैक्सीन’ से बात निकली ‘मेंटल हॉस्पिटल’ तक पहुंची जब माननीय विधायक ने सदन में उठकर कहा कि- देश प्रदेश में हार्ट अटैक के मामले बढ़ रहे हैं। ये गंभीर मामला है। तो सचमुच लगा कि अब गंभीरता से चर्चा होगी। सदन किसी परिणाम पर पहुंचेगा। मामला हेल्थ का है और वाकई गंभीर है। माननीय ने बात आगे बढ़ाई- 20-25 साल के युवाओं को अटैक आ रहे हैं। सदन शांत। वे आगे बोले- कोरोना के बाद दो तरह की वैक्सीन लगी, एक कोवैक्सीन और दूसरी कोविशील्ड। लोग समझ रहे हैं कि कोविशील्ड लगवाने वालों को अटैक आ रहे हैं। बस यहीं से मुद्दे की गाड़ी गंभीरता के ट्रैक से उतर गई। माननीय से सत्ता पक्ष के सदस्य ने पूछा- आपने कौन सी वैक्सीन लगवाई थी। विधायकजी ने कहा- मुझे तो पता नहीं कौन सी लगवाई थी, सरकार ने जो लगाई, वही लगवा ली। इस पर सदन में हंसी का फव्वारा फूट पड़ा। अपनी बात में व्यवधान पड़ते देख महोदय संभले और हमलावर हुए। कहा- मुझे लगता है चुनावी चंदा लेकर नकली वैक्सीन लग गई। इलेक्टोरल बॉन्ड लेकर वैक्सीन लगा दी। इस पर हो-हंगामा हो गया। वैक्सीन से निकली बात मेंटल हॉस्पिटल तक पहुंच गई। विधायक जी ने सत्ता पक्ष के सदस्य से कहा- सरकार मेंटल हॉस्पिटल खोलने जा रही है, एक अपने यहां भी खुलवा लो। 2. ‘मुंह से खाया, नाक से निकलवा लूंगा..’ सरकार का आधा कार्यकाल निकल गया है। दौसा में नेतागण में तगड़ा कॉम्पिटिशन है। ऐसे में आने वाले चुनावों को साधने के लिए जनता जनार्दन के सामने खुद की जनहितैषी-जनसेवक की तस्वीर रखनी ही पड़ेगी। पूर्व विधायक यह बात अच्छी तरह जानते हैं। वे विधायक के आगे लिखा ‘पूर्व’ हटाना चाहते हैं। ऐसे में उन्हें जनता की बहुत याद आई। वे जनता का कल्याण करने कार से निकल पड़े। उन्हें ज्यादा दूर नहीं जाना पड़ा। एक नगर पालिका के अधिकारी महोदय 4 महीने बाद भी महिला सफाईकर्मी को वेतन नहीं दे रहे थे। महिला ने पूर्व विधायक जी से शिकायत की- नपूता तनख्वाह नहीं दे रहा। पूर्व विधायक के कानों में गूंजा- ‘मौका-मौका’। वे कार से निकल कर आरोपी अधिकारी की तरफ बढ़े जो मौके से फरार होने के लिए बाइक पर बैठ चुका था। बाइक पर किक मारना बाकी था। ऐसे अहम मौके को कैप्चर करने के लिए पूर्व विधायक ने अपने अधीनस्थ को आदेश दिया- वीडियो बनाओ। वीडियो बनना शुरू हो गया। इसके बाद पूर्व विधायक ने अधिकारी को ‘शब्दों’ से धोया। लताड़ते हुए कहा- तुमने लूट मचा रखी है। जो कुछ मुंह से खाया है, वह नाक से निकलवा लूंगा। अधिकारी पहले भड़भडाया, फिर फड़फड़ाया, फिर थरथराते हुए जमीन पर आ गया। बोला-तनखा दे देंगे, मना थोड़े कर रहे हैं। 3. नेशनल हाईवे के ‘फेफड़े’ बाहर देश में अधिकतर सरकारी काम एक खास नियम से होते हैं। वह नियम है-भ्रष्टाचार। लेकिन यह छप्पन भोग में अचार जितना हो तो चल जाता है। लेकिन अचारों का छप्पन भोग छुपता है क्या? बात है श्रीगंगानगर के सूरतगढ़ की। यहां थर्मल पावर प्लांट है। सीमेंट के बहुतेरे कारखाने हैं। सेना की गाड़ियां भी गुजरती हैं। सूरतगढ़ से थर्मल जाने वाले हाईवे पर जनवरी में रेलवे ओवरब्रिज बनकर तैयार हुआ था। महज एक ही महीने में हाईवे की ऊपर की डामर, क्रंकीट, सीमेंट की परत गायब हो गई। यहां तक कि हाईवे बिछाने में इस्तेमाल किए गए सरिये पूरी तरह बाहर आ गए। नेशनल हाईवे की हालत ऐसी हो गई जैसे किसी जिंदा आदमी के फेफड़े दिखने लगे हों। बनाने वाले ठेकेदार भूल गए कि जनसंख्या बढ़ने की दर से ज्यादा इस वक्त देश में यूट्यूबर और रीलमेकर्स की संख्या बढ़ रही है। हाईवे से ऐसे ही कई क्रिएटर भी गुजरे जिन्हें यह फेफड़ों वाली सड़क रील बनाने के लिए उत्तम लगी। अब इस रोड के वीडियो सोशल मीडिया पर घूम रहे हैं। एक क्रिएटर ने पीछे से आते डंपर की परवाह किए बिना ‘फेफड़े’ हिलाकर दिखा दिए। 4. चलते-चलते.. हर चुनाव में जोर-शोर से विकास का नाम लिया जाता है। दावा किया जाता है कि विकास की गंगा बहा देंगे। विकास किसको चाहिए? विकास का एक नमूना अभी-अभी सूरतगढ़ में देख ही चुके हैं। आम नागरिक को खेजड़ी की कीमत पर सौर ऊर्जा नहीं चाहिए। अरावली की कीमत पर इमारतें नहीं चाहिएं। लूणी की कीमत पर बजरी के पहाड़ नहीं चाहिए। ऐसा विकास किस काम का जो फागुन से चंग छीन ले। जहां विकास अभी पूरी तरह नहीं पहुंचा है उस गांव में दो बुजुर्ग दोस्तों पर फागुन की मस्ती चढ़ी। दोनों ने फरवरी की गुनगुनी धूप में नसैनी (सीढ़ी) का इंतजाम किया। फिर खेजड़ी पर चढ़कर हींदा (झूला) डाला। फिर लकड़ी की पाटकड़ी (झूले पर बैठने का पाटा) का इंतजाम किया। इसके बाद झूले पर सवार होकर पींगें मारने लगे। जहां जहां विकास चरम पर है, वहां खेजड़ी नहीं, हींदा नहीं, पाटकड़ी नहीं, फागुन नहीं, दोस्त नहीं, वक्त नहीं और घुटनों में दम भी नहीं… इनपुट सहयोग- प्रेम सुथार (सूरतगढ़, श्रीगंगानगर), राजेंद्र सिंह गुर्जर (महवा, दौसा)। वीडियो देखने के लिए सबसे ऊपर फोटो पर क्लिक करें। अब कल मुलाकात होगी..

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