राजस्थान प्रशासनिक सेवा (RAS) से प्रमोट होकर IAS-IPS बने अफसरों को जिलों की कमान संभालने का मौका नहीं मिल पा रहा है। ज्यादातर जिलों और संभाग स्तर पर डायरेक्ट आईएएस-आईपीएस अफसरों को ही तैनात किया गया है। अशोक गहलोत और वसुंधरा राजे सरकार के दौर में प्रमोटी अफसर ही पहली पसंद हुआ करते थे। गहलोत सरकार के पिछले कार्यकाल में तो एक समय 18 जिलों की कमान प्रमोटी IAS संभाल रहे थे। यह स्थिति तो तब थी, जब प्रदेश में जिलों की संख्या 33 ही थी। अब जिलों की संख्या 41 हो चुकी है। आखिर क्या कारण हैं, लंबा अनुभव रखने वाले प्रमोटी अफसरों को जिलों में मौका नहीं मिल पा रहा। भास्कर ने एक्सपर्ट के जरिए इसका एनालिसिस किया। मंडे स्पेशल स्टोरी में पढ़िए… घूसकांड में फंसते रहे अफसर, इसलिए
ब्यूरोक्रेसी के एक्सपर्ट की मानें तो 33 प्रतिशत प्रमोशन कोटा होने के बावजूद प्रमोटी आईएएस-आईपीएस को जिलों की कमान नहीं मिलने के पीछे असली वजह विवादों में नाम सामने आना है। पूर्व की सरकारों में प्रमोटी आईएएस के बीते कुछ सालों में कई घूसकांड में नाम सामने आए थे, जिससे सरकार की छवि खराब हुई। राजेन्द्र विजय : 2020 में प्रमोट होकर आईएएस बने राजेंद्र विजय को कोटा में संभागीय आयुक्त के पद पर जिम्मेदारी दी गई थी। वर्ष 2024 में एसीबी ने आईएएस राजेंद्र विजय के आवास पर रेड डाली थी। उन्हें आय से अधिक संपत्ति के मामले में एपीओ कर दिया था। गंभीर आरोपों के बावजूद राजेंद्र विजय फिलहाल सचिवालय में विभागीय जांच आयुक्त के पद पर हैं। हनुमान मल ढाका : 2023 में प्रमोट होकर आईएएस बने हनुमान मल ढाका को गहलोत सरकार में बनाए गए नए जिले दूदू (अब जिला निरस्त) में कलेक्टर बनाया गया था। भू-रूपांतरण (जमीनों के कन्वर्जन) मामले में 25 लाख रुपए रिश्वत मांगने के आरोप में ढाका को एपीओ कर दिया था। तब से वह एपीओ ही चल रहे हैं। इंद्रजीत सिंह राव : 2020 में प्रमोट कर इंद्रजीत सिंह राव को आईएएस बनाया गया था। उन्हें बारां में जिला कलेक्टर की जिम्मेदारी दी गई थी। पेट्रोल पंप संचालन की NOC जारी करने के मामले में उनका निजी (प्राइवेट) सचिव महावीर नागर 1.40 लाख रुपए की रिश्वत लेते पकड़ा गया था। इस कांड में सीधे तौर पर तत्कालीन कलेक्टर इंद्रजीत सिंह राव के भी शामिल होने के आरोप थे। इसके बाद एसीबी ने उन्हें भी गिरफ्तार किया था। इंद्रजीत वर्तमान में रिटायर हो चुके हैं। प्रेमसुख बिश्नोई : वर्ष 2021 में प्रमोट होकर आईएएस बने प्रेमसुख बिश्नोई को मत्स्य विभाग का डायरेक्टर बनाया गया था। एसीबी की टीम ने 19 जनवरी 2024 को प्रेमसुख बिश्नोई को 35 हजार रुपए की रिश्वत लेते गिरफ्तार किया था। प्रेम सुख बिश्नोई अब रिटायर हो चुके हैं। राजस्थान को चाहिए 380 आईएएस, स्वीकृत 332, उनमें से 278 ही काम कर रहे
राजस्थान में आईएएस के 332 अफसरों का कैडर स्वीकृत है। पिछले कई सालों से कैडर रिव्यू नहीं हुआ है। जिलों की संख्या के हिसाब से प्रदेश को 380 से ज्यादा आईएएस की जरूरत है। महज 278 अफसर ही सेवाएं दे रहे हैं। राजस्थान में कुल कैडर स्ट्रेंथ के हिसाब से 33 प्रतिशत पद प्रमोशन से भरे जाते हैं। पहले 33 जिले हुआ करते थे, लेकिन अब 41 हैं। इनमें से 11 की कमान बतौर कलेक्टर प्रमोटी आईएएस संभाल रहे हैं। हालांकि, यह आंकड़ा गहलोत और वसुंधरा राजे सरकार की तुलना में बेहद कम है। प्रदेश में आईपीएस का 222 अधिकारियों का कैडर है, जबकि 206 कार्यरत हैं। महज 14 प्रमोटी आईपीएस जिलों की कमान संभाल रहे हैं। गहलोत-वसुंधरा से समय 18 जिलों की कमान प्रमोटी IAS के हाथ
गहलोत सरकार आने के बाद कोरोना काल में 18 से ज्यादा जिलों की कमान प्रमोटी आईएएस अधिकारियों के हाथ में थी। इसमें 15 आईएएस थे, जो आरएएस सेवा से प्रमोट हुए। 3 अधिकारी ऐसे थे, जो दूसरी सर्विस से प्रमोट होकर IAS बने और कलेक्टर लगाए गए। 2013 में वसुंधरा सरकार आने के बाद से साल 2021 तक गहलोत सरकार के समय तक 17-18 जिलों तक की कमान प्रमोटी अफसरों के हाथ में रही। साल 2008 से 2012 के बीच तो ज्ञान प्रकाश शुक्ला (भरतपुर), शिव कुमार अग्रवाल (बूंदी), गिरधारी लाल गुप्ता (कोटा), केके गुप्ता (जालोर) को RAS रहते हुए कलेक्टर बनाया गया था। हालांकि, एक्सपर्ट का कहना है कि ऐसा कोई कोटा तय नहीं है कि प्रमोटी अफसर को कितने जिलों में डीएम बनाया जाएगा। प्रमोटी अफसर काबिलियत में किसी से कम नहीं होते हैं। इन जिलों में प्रमोटी आईएएस को मिलती है पोस्टिंग
आमतौर पर आरएएस से आईएएस में प्रमोशन पाने वाले अफसरों को पिछड़े जिलों में पोस्टिंग मिलती रही है। हालांकि, कई बार बड़े जिलों में भी पोस्टिंग दी जाती है। गहलोत के शासन ने प्रमोटी आईएएस जगरूप सिंह यादव को राजधानी जयपुर की कमान सौंपी गई थी। इसके बाद प्रमोटी आईएएस अंतर सिंह नेहरा भी जयपुर में कलेक्टर बनाए गए थे। गहलोत और वसुंधरा राजे के समय अफसरों की तैनाती लगभग एक जैसी रही है। अधिकांश प्रमोटी आईएएस-आईपीएस को झालावाड़, झुंझुनूं, सीकर, बाड़मेर, जैसलमेर, अलवर, चूरू और सिरोही में की कमान सौंपी गई। भजनलाल सरकार ने भी इस परिपाटी को जारी रखा है। आखिर क्यों प्रमोटी अफसरों पर भरोसा ज्यादा?
रिटायर्ड आईजी सत्यवीर सिंह कहते हैं- प्रमोटी आईएएस या आईपीएस अफसरों का स्थानीय नेताओं से तालमेल बेहतर होता है। इस कारण नेता प्रमोटी अफसरों को अपने जिले में ले जाना अधिक पसंद करते हैं। लंबे समय तक फील्ड में रहने के कारण उनका नेटवर्क ज्यादा होता है। नेताओं के लिए ज्यादा सहूलियत होती है। एक्सपर्ट की मानें तो आईएएस या आईपीएस के राजनेताओं का ज्यादा तालमेल नहीं बैठ पाता और ज्यादा कानून-कायदों से चलने पर उनकी शिकायतें होने लगती हैं। इसके कारण नए डायरेक्ट वाले आईएएस-आईपीएस नेताओं को पसंद नहीं होते। एक्सपर्ट क्या बोले?
रिटायर्ड आईजी सत्यवीर सिंह ने कहा- मुख्यमंत्री की आस-पास रहने वाले अफसर ज्यादातर डायरेक्ट IAS सेवा के ही होते हैं। दूसरी वजह यह भी है कि प्रमोटी अफसरों की ऊपर तक पहुंच कम होती है। इसलिए अवसर नहीं मिल पाते हैं। मुख्य सचिव और डीजीपी भी सीधी भर्ती वाले अफसर ही बनते हैं। ऐसे में प्रमोटी अफसरों के साथ भेदभाव भी होता है। आरएएस एसोसिएशन के अध्यक्ष महावीर खराड़ी ने कहा- जो पद प्रमोटी आईएएस के लिए आरक्षित हैं, सरकार उन्हें वहां भी नहीं लगाती है। ऐसे में कामकाज प्रभावित होता है। अफसरों के साथ भेदभाव नहीं करना चाहिए। राजस्थान में प्रमोशन का कोटा 101 पहुंचा
कार्मिक विभाग के अनुसार, आईएएस अधिकारी तीन तरीके से बन सकते हैं। इनमें 66.5% यूपीएससी के जरिए सीधी भर्ती से और 33.5% राज्य सेवा के अफसरों का चयन से होता है। इनमें अधिकतम 15% पद अन्य सेवा से होते हैं। राज्य सरकार विशेष परिस्थितियों में अन्य सेवा के अफसरों को आईएएस बना सकती है। पिछले कैडर रिव्यू के बाद प्रदेश में आईएएस का कोटा 319 से 332 कर दिया गया था। इससे स्टेट सेवा से आईएएस बनाए जाने वाले अफसरों का कोटा भी 6 बढ़ाकर 101 कर दिया। इसमें आरएएस के प्रमोशन से भरे जाने वाले पद 81 से 86 और अन्य सेवा से आईएएस बनाए जाने वाले पद 14 से बढ़ाकर 15 कर दिए गए हैं। वर्ष 2024 में राज्य सेवा के 11 RAS अधिकारियों को IAS में प्रमोट किया गया था।


