प्री-प्राइमरी स्कूल की स्थिति को लेकर शुक्रवार को दैनिक भास्कर अॉफिस में टॉक शो का आयोजन किया गया। इसमें शहर के प्रमुख प्ले स्कूल के प्रिंसिपल और डायरेक्टर पहुंचे और अपनी बातें रखीं। उन्होंने प्ले स्कूल के विजन और दर्शन पर अपने विचार रखते हुए बताया कि प्ले स्कूल में पढ़ कर निकलने वाले बच्चे और जो बच्चे प्ले स्कूल में नहीं पढ़ते है उनमें बेसिक क्या अंतर होता है। प्ले स्कूलों में सिलेबस व करिकुलम पर चिंता जताते हुए कहा कि प्ले स्कूलों में भी एक पॉलिसी होनी चाहिए जिसे सारे स्कूल फॉलो करे। अभी तक प्ले स्कूल के लिए कोई गाइडलाइन तय नहीं है। ऐसे में बच्चों को क्या और कितना पढ़ाना है, यह तय नहीं होता है। स्कूल यह खुद तय करते हैं। अगर एक पॉलिसी या गाइडलाइन होगी तो सारे प्ले स्कूल उसे फॉलो करेंगे, इससे स्कूलों को एक दिशा मिलेगी। इसके अलावा मेट्रो सिटी में और रांची के प्ले स्कूल में क्या अंतर है इसपर भी सभी ने अपने विचार रखे। बताया कि मेट्रो सिटी के स्कूलों में बच्चों की पर्सनालिटी पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है लेकिन यहां प्रेप में एडमिशन के लिए हम बच्चों को तैयार करते हैं। प्ले स्कूल को लेकर नजरिया बदलने की जरूरत है। प्ले स्कूल बेहतर होगा अगर हम नेक्स्ट लेवल पर क्वालिटी एजुकेशन और पर्सनालिटी डेवलप करें।
सरकार को पॉलिसी लानी चाहिए मेट्रो सिटी के प्ले स्कूलों में बच्चों की पर्सनालिटी पर ज्यादा काम किया जाता है। लेकिन, रांची में देखें तो हमें एकेडमिक पर भी ध्यान देना पड़ता है। क्योंकि, प्ले स्कूल से निकलने के बाद जब बच्चे किसी दूसरे स्कूल में क्लास एक में एडमिशन लेते हैं, तब उन्हें रिटन एग्जाम देना पड़ता है। हमें बच्चों को दूसरों स्कूलों में एडमिशन ले सकें इसके लिए तैयार करना पड़ता है। बड़े स्कूलों की यही डिमांड है, इसलिए हमें भी बच्चों को उसी तरह से तैयार करना पड़ता है। प्ले स्कूल और बड़े स्कूलों के बीच कोई भी ब्रिज नहीं है। प्ले स्कूल के पास ना सिलेबस है और ना करिकुलम इससे बच्चों को क्या पढ़ाना है, यह तय करने में स्कूल को परेशानी होती है। सरकार को ऐसी कोई पॉलिसी लानी चाहिए, जिससे प्ले स्कूल और बड़े स्कूलों के बीच संपर्क बनाया जा सके। -विभा सिंह, मेरे नन्हे कदम एनईपी गाइडलाइन फॉलो नहीं कर रहे हैं प्री-प्राइमरी स्कूल में कई स्कूल एनईपी की गाइडलाइन को फॉलो करते हैं। लेकिन, ऐसे भी कई स्कूल हैं जो इसे पूरी तरह फॉलो नहीं करते हैं। सीबीएसई स्कूल गाइडलाइन को मान रही है, लेकिन अभी भी आईसीएसई बोर्ड के स्कूल इस गाइडलाइन नहीं मानते हैं। इससे क्लास 1 में बच्चों के एडमिशन के समय परेशानी होती है। पेरेंट्स को बच्चों के जन्म तिथि में बदलाव करना पड़ता है। -गरिमा जयंत, यूरो किड्स स्कूल स्कूल में बच्चे ‘सर्व धर्म सम भाव’ सीखते हैं स्कूलों में बच्चों को पढ़ाई के साथ भारत की संस्कृति के बारे में भी सिखाया जाता है। स्कूल में बच्चे हर धर्म के पर्व-त्योहार मनाते हैं। इससे उन्हें देश की संस्कृति का पता चलता है और वे उसका आदर करना सीखते हैं। रक्षाबंधन में खुद से राखी बनाते हैं, राम-सीता बनकर फैंसी ड्रेस कंपीटिशन में हिस्सा लेते हैं। हर कार्यक्रम में सहभागी होते हैं। इसके अलावा जितने भी नेशनल डे होता है, सभी मनाते हैं। -मनीष मिशाल, आदर्श किड्स स्कूल बच्चों का आत्मबल अपने आप बढ़ने लगता है स्कूल में हम पेरेंट्स की काउंसलिंग भी करते हैं। उन्हें सिखाते हैं कि बच्चों को क्वांटिटी टाइम नहीं क्वालिटी टाइम दें। उनके काम को सराहें। इससे बच्चे जो भी कुछ सीखते हैं उसे घर में जाकर दुहराते हैं और जब पेरेंट्स उस काम को सराहते हैं तो बच्चों का आत्मबल अपने आप बढ़ने लगता है। हम पेरेंट्स को बताते हैं कि आप बच्चों को आधा घंटा का ही समय दें, लेकिन पूरा समय दें। -मिंत्रा पांडेय, चिरंजीवी प्ले स्कूल, बैंक कॉलोनी ब्रांच
पेरेंट्स की भी काउंसलिंग की जाती है स्कूल में बच्चों को अलग-अलग मुद्दों को लेकर जागरूक किया जाता है। जैसे मोबाइल फोन का प्रयोग कम करें, खाने में क्या खाएं और उन्हें जागरूक करने के लिए स्टोरी टेलिंग, ड्रामा, रोल प्ले कराया जाता है। किसी चीज के लिए मना कर रहे है तो क्यों मना कर रहे हैं बताते हैं। इससे बच्चे चीजों को समझते हैं और मानते हैं। पेरेंट्स की भी काउंसलिंग की जाती है कि बच्चे के लिए क्या सही- गलत है। -वंदना कुमार, क्रेयोन्स मोंटेसरी स्कूल
प्ले स्कूल से बच्चे जिम्मेदार बनते हैं प्ले स्कूल बच्चों की नींव को मजबूत करता है। जब बच्चा घर पर होता है तो उसे स्कूल में दोस्त मिलते हैं जिसे देखकर वह कैसे व्यवहार करना है, सीखता है। जब बच्चा घर से स्कूल आता है तो स्कूल में कई टास्क कराए जाते हैं जिससे वह जिम्मेदार बनता है। कहानियों के माध्यम से चीजों की कीमत समझना सिखता है। बच्चों को स्कूल में बताया जाता है कि अगर चीजें करनी है तो क्यों करनी है और अगर नहीं करना है तो क्यों नहीं करना है, उन्हें क्यों का जवाब मिलता है। प्ले स्कूल में हर 10 बच्चे पर एक टीचर और एक दीदी होती है, जो उन्हें हर तरह से गाइड करती है। जो बच्चें प्ले स्कूल जाते है उन्हें खेल-खेल में सिखाया जाता है इससे उनका बचपना जिंदा रहता है। उन्हें घर जैसा माहौल मिलता है। और जो बच्चे प्ले स्कूल से ट्रेंड होकर निकलते है उन्हें एडजस्ट करने में परेशानी नहीं होती है। -वंदना बहल, संत माइकल प्ले स्कूल
छोटे बच्चे अब टेक्नोलॉजी सीख रहे हैं दैनिक भास्कर के कार्यालय में आयोजित शिक्षा संवाद में भाग लेते शहर के प्ले और प्री-प्राइमरी स्कूल के प्रिंसिपल और डायरेक्टर। टीचर का ट्रेंड होना सबसे जरूरी है प्री-प्राइमरी स्तर पर टेक्नोलॉजी का प्रयोग हो रहा है। बच्चों को स्मार्ट बोर्ड पर बढ़ाया जाता है। बच्चे पढ़ने से ज्यादा देखकर सीखते हैं इसलिए उन्हें विजुअल क्लास भी दिया जाता है। बच्चों के साथ टीचर भी सोशल मीडिया और बाकी एप्स की मदद से बच्चों को टेक्नोलॉजी के बारे में बता रहे हैं और उससे सीखकर बच्चों को सीखा रहे हैं। टीचरों को अब हर समय करिकुलम ट्रेनर की जरूरत नहीं पड़ती है, वे सोशल मीडिया या चैट जीपीटी से देखकर सीख रहे हैं। थ्री-डी का इस्तेमाल हो रहा है। -संगीता राज, लिटिल चैंप प्ले स्कूल
प्ले स्कूल में समय-समय पर टीचरों की ट्रेनिंग होती है, ताकि वे बच्चों को हमेशा नया सीखा पाएं। छोटे बच्चों को पढ़ाने के लिए उन्हें संभालने के लिए ट्रेंड टीचर की जरूरत होती है। प्ले स्कूल में टीचर वैसे चाहिए जो एनर्जेटिक हो, एक्टिव हो और जिसकी चार्मिंग पर्सनालिटी हो। मैच्योर होना बहुत जरूरी है, ताकि बच्चों के पेरेंट्स से बात कर सकें। 23-24 साल के टीचर प्ले स्कूल के लिए सही होते है। नर्सरी टीचर ट्रेनिंग शिक्षकों के लिए बहुत जरूरी है । -डॉ. अर्चना सिन्हा, चिरंजीवी प्ले स्कूल, कुसुम विहार ब्रांच
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