फसल बीमा के 2.21 लाख आवेदन फर्जी:प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के तहत 3 जिलों में 30 करोड़ से अधिक की सब्सिडी रुकी

खेतीबाड़ी में अब मौसम से लेकर रोग लगने की आशंका और अनुमान एआई बताने लगी है। इसी तरह प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना में बीमा करने वाली कंपनियां भी अब एआई का इस्तेमाल बीमा पॉलिसी के लिए कर रही हैं। इससे कई जगह फर्जीवाड़े का खुलासा हो रहा है। श्रीगंगानगर, अलवर और बूंदी जिले में बीमा कंपनी क्षेमा ने एआई और सैटेलाइट इमेज की मदद से करीब सवा दो लाख फर्जी बीमा क्लेम पकड़े हैं। इन क्लेम में खेतों में बताई गई फसल की जगह खाली मिली या दूसरी फसलें थीं। कंपनी ने श्रीगंगानगर, अलवर और बूंदी में प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के दावों में किसानों को 423 करोड़ रुपए का भुगतान भी किया मगर इस दौरान आवेदनों की जांच में केवल खरीफ 2025 सीजन में ही 221661 आवेदन फर्जी पाए। इन सभी आवेदनों के दावों को कंपनी ने अस्वीकार कर दिया है। इतने आवेदनों पर केंद्र और राज्य सरकार से दी जाने वाली सब्सिडी के रूप में 30.17 करोड़ रुपए खर्च होते। वहीं, रबी 2024-25 सीज़न के लिए स्मार्ट सैंपलिंग तकनीक पर आधारित क्रॉप कटिंग प्रयोग के गलत क्रियान्वयन को चुनौती दी है। क्रॉप कटिंग प्रक्रिया में सरकारी दिशा-निर्देशों का पालन नहीं किया गया। चीफ रिस्क ऑफिसर कुमार सौरभ ने बताया कि तकनीक का उपयोग वास्तविक किसानों को लाभ पहुंचाना है। हमने श्रीगंगानगर जिले की करणपुर तहसील में 79 करोड़ के बीमा दावों का भुगतान किया है। मगर एआई के विश्लेषण में फर्जी पाए गए आवेदन स्वीकार नहीं कर सकते। सैटेलाइट चित्रों और एआई इनपुट्स के उपयोग से ऐसी गड़बड़ियों पर रोक लगाई है। जांच में यह सामने आया है कि जहां खेत में फसल बोई ही नहीं गई हो, वहां भी बीमा आवेदन किए या आवेदन पत्र में दर्ज फसल और वास्तविक बोई गई फसल में अंतर मिला। एआई हर तस्वीर को स्कैन करती है। रंग, आकार, बनावट और पैटर्न में अंतर देखकर भूमि की श्रेणी के अनुसार चिह्नित करती है। खेती की जमीन, पानी, पेड़, मकान, सड़क हो या अन्य निर्माण एआई से मैपिंग हो जाती है। इसके बाद सैटेलाइट इमेज एक्स्पर्ट और कृषि विशेषज्ञ इसकी समीक्षा करते हैं।

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