फेंसिंग पार 415 कनाल सरकारी जमीन की किसानों के नाम फर्जी ​रजिस्ट्री का मामला, 7 पर केस, पटवारी काबू

शुभेंदु शुक्ला | अमृतसर विजिलेंस ने सरहदी गांव सिंघोके में फेंसिंग पार 415 कनाल की फर्जी रजिस्ट्री मामले में पटवारी जोबनजीत समेत 7 के खिलाफ केस दर्ज किया है। विजिलेंस ने मामले में आरोपी पटवारी जोबनजीत को काबू कर लिया जबकि बाकी आरोपी अभी फरार हैं। नायब तहसीलदार का फर्जी आर्डर और रिकार्ड में हेराफेरी करके इस फर्जीवाड़े को अंजाम दिया गया। इस खेल का मास्टरमाइंड पटवारी ही है। आरोपियों में जोबनजीत सिंह पटवारी निवासी फोकल प्वाइंट के अलावा सुरिंदरपाल सिंह निवासी अजनाला, शेर सिंह निवासी गांव अवाण रमदास, सतनाम सिंह वासी गांव अवाण, रणजीत सिंह वासी गांव अवाण, गुरमेज सिंह वासी गांव अवाण, रेशम सिंह वासी गांव शामिल हैं। विजिलेंस जांच में सामने आया है कि रेवेन्यू रिकॉर्ड के मुताबिक, गिरदावरी वर्ष 1998 में पुरुषोत्तम लाल को 35 कनाल 7 मरला का काश्तकार बनाया गया। जबकि इस गिरदावरी की दुरुस्ती के संबंध में रोजनामचा में कोई रिपोर्ट दर्ज नहीं है। पटवारी ने पुरुषोत्तम लाल व अन्य के साथ मिलीभगत करके पंजाब सरकार की जमीन पर उसे काश्तकार बनाकर निजी लाभ पहुंचाया। इसी आधार पर पुरुषोत्तम ने फायदा उठाकर सरकार की पॉलिसी के तहत 24 अक्टूबर 2008 को जमीन अपने नाम ट्रांसफर करा ली। वहीं, पुरुषोत्तम की 4 सितंबर 2015 को मौत हो गई। साल 2012-13 की जमाबंदी में तत्कालीन पटवारी ने अलॉटमेंट रद्द करते हुए जमीन वापस सरकार के नाम करने संबंधी रिपोर्ट 29 दिसंबर 2015 को दर्ज की थी। रिपोर्ट पर साल 2017-18 की जमाबंदी में अमल होना था लेकिन पटवारी जोबनजीत ने सुरिंदरपाल सिंह के साथ मिलीभगत कर रिपोर्ट को नजरअंदाज किया और जगह सरकार के नाम नहीं की। जबकि कानूनगो जगतार सिंह ने पड़ताल के दौरान खेवट नंबर 91, 92, 93 में अलॉटमेंट रद्द होने के कारण मालिकों के नाम काटकर पंजाब सरकार के नाम से दर्ज करने को लिखा था। जोबनजीत सिंह ने कानूनगो की रिपोर्ट को दरकिनार कर मलकीयत मृतक पुरुषोत्तम लाल के नाम बहाल रखी, जिसके बाद 2020 में सुरिंदरपाल सिंह और अन्यों के नाम पर विरासत इंतकाल नंबर 726 मंजूर करवा लिया गया। इसी तरह दूसरा फर्जीवाड़ा अंजाम देने के लिए जमाबंदी साल 1998-99 (खाता खतौनी 89/176, रकबा 235 कनाल 19 मरले) में पंजाब सरकार का नाम था। लेकिन जमाबंदी साल 2002-03 में खाना काश्त में शेर सिंह, सतनाम सिंह, गुरमीत सिंह और कश्मीर सिंह का नाम दर्ज कर दिया गया। इसके लिए रोजनामचा में रिपोर्ट नंबर 158 14 दिसंबर 2001 को दर्ज की गई। जिसमें नायब तहसीलदार अजनाला के फर्जी आदेश तैयार कराकर लगाया गया। वहीं, जांच के दौरान नायब तहसीलदार कार्यालय ने पुष्टि की कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई गिरदावरी दुरुस्ती केस दर्ज ही नहीं है। साल 1998 में पटवारी ने पुरुषोत्तम लाल को सरकारी जमीन (35 कनाल 7 मरले) का काश्तकार (खेती करने वाला) बना दिया। .गड़बड़ी की शुरुआत साल 2001 से 2008 के दौरान हुई। सरकारी जमीन के कुछ हिस्से को अलग-अलग कन्वेयन्स डीड के जरिए निजी किसानों के नाम पर ट्रांसफर कर दिया गया। राजस्व नियमों के अनुसार गिरदावरी में बदलाव के लिए तहसीलदार या कोर्ट का लिखित आदेश ज़रूरी होता है लेकिन कोई आदेश मौजूद नहीं था और न ही रोजनामचा (सरकारी डायरी) में कोई रिपोर्ट दर्ज थी। .अवैध गिरदावरी के आधार पर पुरुषोतम लाल ने सरकारी नीति का फायदा उठाकर 24 अक्टूबर 2008 को जमीन की मालिकी अपने नाम करवा ली। . साल 2015 में पुरुषोतम लाल की मौत हो गई थी। जिसके बाद उसके नाम से जगह का मलकीयत रद्द कर वापस सरकार के नाम करने का आदेश दिया गया था । लेकिन साल 2017-18 की नई जमाबंदी तैयार हुई, तो पटवारी जोबनजीत ने कानूनगो की रिपोर्ट के बावजूद सरकार के नाम दर्ज नहीं किया। साल 2020 में जमीन पुरषोत्तम के बेटों सुरिंदरपाल सिंह व अन्य के नाम ट्रांसफर हो गई। जोबनजीत से पहले तत्कालीन पटवारी जोगिंदर सिंह (मृतक) ने साल 2001-02 के दौरान नायब तहसीलदार अजनाला के फर्जी केस नंबरों का हवाला देकर रोजनामचा में रिपोर्ट नंबर 158 और 160 दर्ज की थी। उसने इन फर्जी रिपोर्टों के जरिए ही शेर सिंह, सतनाम सिंह, गुरमेज सिंह और अन्य लोगों को सरकारी जमीन पर ‘काश्तकार’ (खेती करने वाला) के रूप में दर्ज किया था। डाली गई फर्जी रिपोर्टों के आधार पर बाद में इन परिवारों ने पंजाब सरकार की पॉलिसी का फायदा उठाकर जाली कनवेन्स डीड (मालिकाना हक) हासिल की और करोड़ों की जमीन हड़प ली। 2001 में वह फर्जी रिपोर्टें न डाली गई होती तो आगे फर्जीवाड़ा को अंजाम नहीं दिया जाता। फिलहाल विजिलेंस ने मामले में आरोपी पटवारी जोबनजीत को गिरफ्तार करके अन्य आरोपियों की गिरफ्तारी के लिए कार्रवाई शुरू कर दी है।

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