ठाकुरराम यादव/प्रशांत गुप्ता/अमिताभ अरुण दुबे की रिपोर्ट शहर से मंदिर हसौद तक कार से आने-जाने में करीब 500 रुपए खर्च हो रहे हैं। प्राइवेट टैक्सी या ऑटो-रिक्शा में यह खर्च 200 से 250 रुपए तक पहुंच जाता है, जबकि यही सफर सिटी बस से सिर्फ 40 रुपए में पूरा हो सकता है। सवाल सीधा है-कोई 210 से 460 रुपए ज्यादा क्यों खर्च करेगा? जवाब भी उतना ही कड़वा है। लोग खर्च करना नहीं चाहते, उन्हें मजबूरी में करना पड़ता है। वजह है रायपुर का बदहाल पब्लिक ट्रांसपोर्ट सिस्टम।
सबसे बड़ी समस्या सिटी बसों की जर्जर हालत है। शहर में चल रही ज्यादातर बसें इतनी कंडम हैं कि अंदर बैठते ही सीट से लेकर पूरा ढांचा हिलता नजर आता है। बाहर उड़ती धूल सीधे बस के भीतर घुसकर यात्रियों के कपड़ों और चेहरे पर जम जाती है। अच्छे कपड़े पहनकर दफ्तर या किसी जरूरी काम से निकलने वाला व्यक्ति इन बसों में सफर करने से कतराता है। नतीजा यह है कि सिटी बसें आज भी निम्न और मध्यम वर्ग की मजबूरी बनकर रह गई हैं। दूसरी बड़ी समस्या अनियमित टाइमिंग है। एक बस जाने के बाद दूसरी बस आने में इतना लंबा अंतर होता है कि लोगों के पास इंतजार करने का समय नहीं बचता। तीसरी समस्या सुविधायुक्त बस स्टैंड का अभाव है। दैनिक भास्कर की टीम ने दो दिनों तक शहर के अलग-अलग रूट्स में सिटी बसों में सफर करके आने वाली दिक्कतों को नजदीक से समझा और हकीकत जानी। रेलवे स्टेशन से मंदिर हसौद: इंतजार, पंचर और धूल की मार
सुबह 10.30 बजे रायपुर रेलवे स्टेशन से मंदिर हसौद जाने वाली सिटी बस करीब आधे घंटे बाद पहुंची। बस लगभग खाली थी। कुछ सवारियां चढ़ने के बाद बस चली, लेकिन शास्त्री चौक जाने के बजाय ड्राइवर ने जेल रोड से पंडरी रोड की तरफ मोड़ते हुए बस को सीधे पुराने पंडरी बस स्टैंड स्थित ऑपरेटर के डिपो में घुसा दिया। वजह निकली-बस का टायर पंचर। यात्रियों को करीब 20 मिनट टायर बदलने का इंतजार करना पड़ा। खजाना चौक के पास दर्जनभर लोग धूप में खड़े मिले, जिनमें महिलाएं और बच्चे भी थे। न कोई बस स्टैंड, न छांव। लोग पसीना पोंछते हुए बस में चढ़े और कहते रहे कि बस तय समय से आधे घंटे लेट आई है। पूरे रूट में कहीं भी ढंग का बस स्टैंड नहीं मिला। बस के अंदर पंखा नहीं था। चलने पर थोड़ी हवा आई, लेकिन साथ ही सड़क की धूल भी अंदर भरती रही। पसीने से भीगे चेहरे पर धूल पाउडर की तरह चिपकती रही। करीब साढ़े 12 बजे बस मंदिर हसौद पहुंची। वापसी में भी हाल वही रहा। मंदिर हसौद में बस स्टैंड न होने से लोग सड़क किनारे इंतजार करते मिले। समय पर बस न आने पर कई महिलाएं मजबूरी में प्राइवेट ऑटो लेने को तैयार हो गईं। ऑटोवाले ने 50 रुपए मांगे, मोलभाव के बाद 40 रुपए पर राजी हुआ। सवाल साफ है-अगर समय पर बस और बस स्टैंड होता, तो 20 रुपए की जगह 40 रुपए क्यों देने पड़ते? राज टॉकीज से सिलतरा: 15 किमी के सफर में 37 बार रुकी बस, यात्री भी कम मिले
राजधानी राजधानी रायपुर के राज टॉकीज स्टैंड से सिलतरा के लिए सिटी बस के रवाना होने का निर्धारित समय दोपहर 1.15 बजे है। भास्कर टीम जब बस में पहुंची, तब 1.10 बज चुके थे, लेकिन पूरी बस खाली थी। सवारियां नहीं मिलने पर कंडक्टर और ड्राइवर ने दोपहर 1.25 बजे तक इंतजार किया। इसी दौरान रेलवे स्टेशन से कंडक्टर के पास फोन आया—सवारी है, जल्दी आओ। इसके बाद ही बस रवाना हुई। कुछ ही दूरी पर घड़ी चौक में पेट्रोल पंप के पास पहला स्टॉप हुआ, जहां बस करीब 3 मिनट तक खड़ी रही। आगे अंबेडकर अस्पताल के स्टॉपेज तक पहुंचते-पहुंचते सवारियों के हाथ देने पर बस तीन बार रुकी। फाफाडीह रेलवे स्टेशन तक आते-आते बस सात बार से ज्यादा रुक चुकी थी। रायपुर से सिलतरा तक सिटी बस का किराया 20 रुपए है, लेकिन एक घंटे से अधिक चले इस सफर में बस कुल 37 बार रुकी। कहीं फल दुकानों के सामने तो कहीं होटलों के पास बस रोकी जाती रही। कई यात्री खरीदारी के लिए उतरते-चढ़ते रहे। हैरानी यह रही कि जहां बाकायदा बस स्टॉप बने हैं, वहां बस नहीं रुकी। अंततः दोपहर 2.30 बजे सिटी बस सिलतरा पहुंची।
बसों की बड़ी खामियां रायपुर से खरोरा: हर जगह अव्यवस्था दिखी, न डिस्प्ले न सूचना बोर्ड, कहीं भी खड़ी कर रहे बस
रेलवे स्टेशन परिसर में सिटी बस स्टैंड सिर्फ नाम भर का रह गया है। यहां न शेड है, न बैठने की व्यवस्था और न ही किसी तरह की सूचना। यात्री खुले आसमान के नीचे एक फीट चौड़ी पट्टी पर बैठकर या खड़े होकर बस का इंतजार करने को मजबूर हैं। मुझे भी यहां करीब एक घंटे तक बस का इंतजार करना पड़ा। इसी दौरान एक व्यक्ति माइक लेकर पहुंचा और खरोरा जाने वाली बस के आने की घोषणा की। कुछ देर बाद बस तो आ गई, लेकिन यह जानकारी नहीं दी गई कि रास्ते में कहां-कहां स्टॉपेज होंगे। न डिजिटल डिस्प्ले था और न ही कोई लिखित सूचना बोर्ड। दोपहर 1.35 बजे बस रवाना हुई और खालसा स्कूल, पंडरी व सड्डू में यात्रियों को बैठाते हुए आगे बढ़ी। रायपुर से खरोरा की 40 किमी की दूरी में बस 12 जगहों पर रुकी, लेकिन इनमें से कोई भी अधिकृत बस स्टॉप नहीं था। जहां हाथ दिया, वहीं बस रुक गई। बस की हालत भी जर्जर थी-फटी सीटें, टूटे कांच, गायब परदे और हैंड ग्रिप तक नहीं। राहत की बात सिर्फ यह रही कि करीब एक घंटे में खरोरा पहुंच गए। यह बस रोजाना इस रूट पर चार ट्रिप लगाती है। ये है सबसे बड़ी कमी


