सुप्रीम कोर्ट ने हल्द्वानी के बनभूलपुरा क्षेत्र में रेलवे भूमि पर अतिक्रमण को लेकर सख्त अंतरिम आदेश देते हुए कहा- वहां रहने वाले लोग उस जमीन पर बने रहने का अधिकार दावा नहीं कर सकते। कोर्ट ने प्रभावित परिवारों की पहचान करने और 19 मार्च यानी रमजान के बाद प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत आवेदन प्रक्रिया को सुगम बनाने के लिए शिविर आयोजित करने के निर्देश दिए हैं। अदालत ने यह भी कहा कि पात्र विस्थापित परिवारों को छह महीने तक प्रति माह 2,000 रुपये की आर्थिक सहायता दी जाएगी। हालांकि, अगली सुनवाई अप्रैल में होने तक किसी प्रकार की बेदखली नहीं की जाएगी। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने मामले में सुनवाई करते हुए कहा कि प्रभावित परिवारों की आवास योजना के तहत पात्रता का निर्णय डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट (DM) करेंगे। रेलवे करीब 30 हेक्टेयर क्षेत्र में सुविधाओं का विस्तार करना चाहता है। इसमें कुछ भूमि रेलवे की है और कुछ राज्य सरकार की। राज्य सरकार भूमि देने को तैयार है, लेकिन दोनों तरह की जमीन पर अतिक्रमण के कारण परियोजना अटकी हुई थी। मामले की अगली सुनवाई अप्रैल में होगी। CJI की सख्त टिप्पणी सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा, “जब बेहतर सुविधाओं वाली दूसरी जगह उपलब्ध हो सकती है, तो लोगों को वहीं रहने पर क्यों जोर देना चाहिए? किसी भी महत्वाकांक्षी रेलवे परियोजना के लिए दोनों ओर जमीन की आवश्यकता होती है। वहां रहने वाले यह तय नहीं कर सकते कि रेलवे लाइन कहां बिछेगी।” उन्होंने स्पष्ट किया कि अपीलकर्ताओं को उसी स्थान पर पुनर्वास की जिद करने का अधिकार नहीं है, क्योंकि भूमि परियोजना के लिए आवश्यक है। उन्होंने कहा कि प्रभावित लोग प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत आवेदन करें, जिनमें से अधिकांश आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) में आते हैं। साथ ही, यह सुनिश्चित किया जाए कि उनकी आजीविका प्रभावित न हो। सुनवाई के बाद अधिवक्ता रऊफ रहीम ने कहा, “मुख्य सवाल यह है कि इस योजना के तहत कितने फ्लैट उपलब्ध हैं, क्योंकि लोगों की संख्या फ्लैटों से ज्यादा है। कलेक्टर 20 तारीख से यहां मौजूद रहेंगे। शिविर 10 दिनों तक चलेगा। जरूरत पड़ने पर सामाजिक कार्यकर्ता भी मौजूद रहेंगे। हर परिवार का मुखिया आवेदन करेगा और यह विवरण देगा कि परिवार में कितने सदस्य हैं, वे यहां कितने समय से रह रहे हैं, तथा सभी संबंधित दस्तावेज जैसे बिजली बिल, आधार कार्ड आदि प्रस्तुत करेगा।” जस्टिस बागची की टिप्पणी न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची ने कहा कि भूमि राज्य सरकार की है और उसके उपयोग का निर्णय करना उसका अधिकार है। मुख्य प्रश्न केवल यह है कि वहां रह रहे लोगों का पुनर्वास कैसे किया जाए, ताकि उन्हें राहत मिल सके। पीठ की प्रारंभिक राय है कि यह मामला अधिकार से अधिक सहायता का है। पीएम आवास योजना पर सुझाव सीजेआई ने एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी से कहा कि राज्य सरकार विचार करे कि क्या प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत भूमि अधिग्रहित कर मुआवजे के बजाय प्रभावितों को मकान बनाकर दिए जा सकते हैं। उन्होंने कहा कि इस निर्णय में आने वाली पीढ़ियों के हितों को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए। केंद्र और रेलवे का पक्ष सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने बताया कि रेलवे रियलाइन्मेंट के लिए 30.5 हेक्टेयर भूमि आवश्यक है। अदालत के पूर्व आदेश के अनुसार रेलवे अनुग्रह राशि (एक्स-ग्रेशिया) का भुगतान करेगा। इस दौरान अपीलकर्ताओं ने रेलवे की योजना और नई पुनर्वास नीति 2019 पर सवाल उठाए हैं, जिसमें पेड़ों की कटाई रोकने जैसे मुद्दे भी शामिल हैं। हल्द्वानी बेदखली मुद्दे पर कांग्रेस विधायक सुमित हृदयेश ने कहा, “आज राज्य ने जिस दिशा में कदम उठाया है, उस पर मुझे पूरा विश्वास है। हमारे सभी लोगों और वकीलों ने अपने तर्क बेहद प्रभावी ढंग से रखे और अदालत ने करीब एक घंटे तक धैर्यपूर्वक उन्हें सुना।” 50 हजार लोगों की जिंदगी से जुड़ा मामला सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई से पहले सुरक्षा व्यवस्था चकबंदी की गई है। मामला रेलवे की 29 एकड़ जमीन पर अतिक्रमण से जुड़ा है और 5 हजार परिवार व 50 हजार लोगों की जिंदगी से जुड़ा है। बनभूलपुरा क्षेत्र और हल्द्वानी रेलवे स्टेशन के आसपास भारी संख्या में पुलिस और पीएसी (PAC) की तैनाती की गई है। संवेदनशील इलाकों में आने-जाने वाले हर व्यक्ति पर नजर रखी जा रही है। संदिग्ध गतिविधियों को रोकने के लिए खुफिया एजेंसियां भी सक्रिय हैं। सुरक्षा बलों ने प्रभावित क्षेत्रों में फ्लैग मार्च कर लोगों से शांति बनाए रखने और अफवाहों पर ध्यान न देने की अपील की है। पहले जानिए क्या है मामला… 2007 से मामला कोर्ट में इस मामले की शुरुआत बनभूलपुरा और गफूरबस्ती क्षेत्र में रेलवे भूमि से अतिक्रमण हटाने को लेकर 2007 में हाईकोर्ट के आदेश से हुई थी। तब प्रशासन ने 0.59 एकड़ जमीन को अतिक्रमण मुक्त किया था। 2013 में उन्होंने गौला नदी में हो रहे अवैध खनन और गौला पुल के क्षतिग्रस्त होने के मामले में हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर की। सुनवाई के दौरान रेलवे भूमि के अतिक्रमण का मामला फिर से सामने आ गया। 9 नवंबर 2016 को कोर्ट ने याचिका निस्तारित करते हुए रेलवे को दस हफ्ते के अंदर अतिक्रमण हटाने के निर्देश दिए थे। इसके बाद अतिक्रमणकारियों और प्रदेश सरकार ने हाईकोर्ट में एक शपथ पत्र देकर उक्त जमीन को प्रदेश सरकार की नजूल भूमि (वह सरकारी जमीन है जो ब्रिटिश शासन के दौरान विरोध करने वाले राजाओं या विद्रोहियों से जब्त की गई थी) बताया लेकिन 10 जनवरी 2017 को कोर्ट ने इसे खारिज कर दिया था। पहली बार 2017 में मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में कई याचिकाएं दाखिल की थी। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने अतिक्रमणकारियों और प्रदेश सरकार को निर्देश दिए कि वह अपने व्यक्तिगत प्रार्थना पत्र 13 फरवरी 2017 तक हाईकोर्ट में दाखिल करें और इनका परीक्षण हाईकोर्ट करेगा। इसके लिए तीन महीने का समय दिया गया। 6 मार्च 2017 को कोर्ट ने रेलवे को अप्राधिकृत अधिभोगियों की बेदखली अधिनियम 1971 के तहत कार्रवाई के निर्देश दिए, लेकिन तब भी कोई कार्रवाई नहीं हुई। इस पर याचिकाकर्ता जोशी ने हाईकोर्ट में अवमानना याचिका दाखिल की। सुप्रीम कोर्ट- 50 हजार लोगों को रातों-रात बेघर नहीं किया जा सकता रेलवे और जिला प्रशासन ने हाईकोर्ट में अपना पक्ष रखा। लेकिन कब्जा तब भी नहीं हटा। जोशी ने 21 मार्च 2022 को हाईकोर्ट में एक और जनहित याचिका दायर कर कहा कि रेलवे अपनी भूमि से अतिक्रमण हटाने में नाकाम साबित हुआ है। 18 मई 2022 को कोर्ट ने सभी प्रभावित व्यक्तियों को अपने तथ्य कोर्ट में रखने के निर्देश दिए, लेकिन अतिक्रमणकारी उक्त भूमि पर अपना अधिकार साबित करने में विफल रहे। 20 दिसंबर 2022 को कोर्ट ने फिर से रेलवे को अतिक्रमणकारियों को हफ्ते भर का नोटिस जारी करते हुए अतिक्रमण हटाने संबंधी निर्देश दिए। इस आदेश के खिलाफ स्थानीय निवासियों ने जनवरी 2023 में सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की। इसके बाद 5 जनवरी 2023 को सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि 50 हजार लोगों को रातों-रात बेघर नहीं किया जा सकता। रेलवे को विकास के साथ-साथ इन लोगों के पुनर्वास और अधिकारों के लिए योजना तैयार करनी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने उत्तराखंड सरकार और रेलवे से इस मामले में समाधान निकालने और अपना पक्ष रखने के लिए कहा था। 8 फरवरी 2024 में हिंसा, 6 लोगों की मौत नगर निगम ने इसी इलाके में 8 फरवरी 2024 को एक अवैध मदरसा ढहा दिया। नमाज पढ़ने के लिए बनाई गई एक इमारत पर भी बुलडोजर चला दिया था। इसके बाद वहां हिंसा फैल गई थी। भीड़ ने पुलिस और निगम के अमले पर हमला कर दिया। बनभूलपुरा थाने को घेरा और पथराव किया था। हिंसा में 6 से ज्यादा लोगों की मौत हुई थी। 300 पुलिसकर्मी और निगम कर्मचारी घायल हुए थे। प्रशासन ने कर्फ्यू लगा दिया था और दंगाइयों को देखते ही गोली मारने के आदेश थे।


