इस होली बस्तर की ग्रामीण महिलाओं ने बाजार में ऐसा विकल्प उतारा है, जो रंगों के साथ सेहत और आत्मनिर्भरता का संदेश भी दे रहा है। ‘बिहान’ योजना से जुड़ी स्व-सहायता समूहों की महिलाएं पालक, लाल भाजी, चुकंदर और पलाश के फूलों से प्राकृतिक गुलाल तैयार की हैं। प्रशिक्षण के बाद तैयार यह हर्बल गुलाल अब स्थानीय बाजार से निकलकर रायपुर भी पहुंचा।
जिले के क्रांतिकारी डेबरीधूर उद्यानिकी महाविद्यालय और अनुसंधान केंद्र में महिलाओं को प्राकृतिक रंग बनाने का प्रशिक्षण दिया गया। प्रशिक्षण के बाद आड़ावाल, लोहंडीगुड़ा, तोकापाल, दरभा, बास्तानार और बकावंड क्षेत्र के स्व-सहायता समूहों ने उत्पादन शुरू किया था। महिलाएं कॉर्न फ्लावर को आधार बनाकर हल्दी, चंदन और सिंदूर जैसे तत्व मिलाकर रंग तैयार कीं। प्राकृतिक तरीके से हर्बल गुलाल तैयार पत्तियों और फूलों को सीधी धूप के बजाय छाया में सुखाया गया था, ताकि उनका प्राकृतिक गुण बना रहे। इन समूहों में मां दंतेश्वरी, सरस्वती, गौरी, बजरंग, मां संतोषी, रोशनी, दुर्गा, दिशा और मुस्कान स्व-सहायता समूह शामिल हैं। महिलाओं का कहना है कि बाजार में बिकने वाले कई रंगों से त्वचा रोग और एलर्जी की शिकायतें बढ़ती हैं, इसलिए सुरक्षित विकल्प तैयार करने पर जोर दिया गया। सरकारी कार्यालयों और विक्रय केंद्रों में बिक्री हर्बल गुलाल की बिक्री जगदलपुर के शासकीय कार्यालयों में हुई। इसके अलावा रायपुर स्थित इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय के विक्रय केंद्रों में भी इसे रखा गया। इस होली इन हर्बल रंगों की मांग बढ़ने लगी। जिला प्रशासन का कहना है कि इस पहल से महिलाओं की आय में वृद्धि होगी और स्थानीय उत्पाद को बढ़ावा मिलेगा।


