बांग्लादेश चुनाव सीरीज पार्ट-3:बांग्लादेश में 35 साल तक शेख हसीना और खालिदा जिया की जंग, नाम पड़ा- बैटल्स ऑफ बेगम्स

तारीख- 21 अगस्त 2004
जगह- बंगबंधु एवेन्यू, ढाका शेख हसीना की पार्टी अवामी लीग की एक जनसभा चल रही थी। हसीना भाषण खत्म कर लौट ही रही थीं, तभी हमलावरों ने उनके काफिले की ओर कई ग्रेनेड फेंके। कुछ ही सेकंड में पूरा इलाका धमाकों और चीख-पुकार से गूंज उठा। सड़क खून से लाल हो गई। 24 लोग मारे गए, 500 से ज्यादा घायल हुए। शेख हसीना बाल-बाल बच गईं, लेकिन उनका बायां कान हमेशा के लिए खराब हो गया। यह हमला बांग्लादेश की राजनीति का टर्निंग पॉइंट साबित हुआ। इसके बाद शेख हसीना और खालिदा जिया के बीच जो नफरत पनपी, वह खालिदा जिया की मौत तक खत्म नहीं हुई। दोनों नेताओं की इस जंग को मीडिया ने नाम दिया- बैटल्स ऑफ द बेगम्स। पार्ट-3 में हसीना और खालिदा जिया के ‘बैटल ऑफ द बेगम्स’ के अंत की कहानी पढ़िए… 5 साल पूरे करने वाली पहली PM हसीना 1996 से 2001 तक शेख हसीना की सरकार चली। यह कार्यकाल कई मायनों में ऐतिहासिक रहा। इससे पहले बांग्लादेश में सरकारें अक्सर बीच में ही गिर जाती थीं, लेकिन शेख हसीना की सरकार ने पांच साल पूरे किए। इस दौरान खालिदा जिया ने संसद में ज्यादातर समय बहिष्कार किया। नतीजा यह हुआ कि संसद अक्सर बिना मजबूत विपक्ष के चलती रही। जब सत्ता में शेख हसीना रहतीं, तब विपक्ष की अगुवाई कर रहीं खालिदा जिया और उनकी पार्टी सदन से बाहर रहतीं। वहीं, जब खालिदा जिया प्रधानमंत्री बनीं, तो शेख हसीना की पार्टी ने संसद का बहिष्कार शुरू कर दिया। नतीजा यह हुआ कि बांग्लादेश की संसद कई साल तक मुख्य विपक्ष की गैरमौजूदगी में चलती रही। बार-बार के वॉकआउट और लंबे बहिष्कारों के कारण कई अहम विधेयक बिना प्रभावी चर्चा के पास होते रहे। आठवां चुनाव- 2001 कट्टरपंथियों की मदद से पीएम बनीं खालिदा जिया शेख हसीना को इस बात का पूरा यकीन था कि वह अगला चुनाव जीत रही हैं। लेकिन संसद के बाहर कहानी बिल्कुल अलग थी। इन पांच साल में देश ने लगातार बम धमाकों, राजनीतिक हिंसा और आतंक की घटनाएं देखीं। इसी दौर में भ्रष्टाचार को उजागर करने वाली एजेंसी ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल ने बांग्लादेश को पहली बार दुनिया का सबसे भ्रष्ट देश घोषित किया। इसे देश की छवि को बहुत नुकसान पहुंचा। कई सांसदों आपराधिक मामलों में लिप्त होने के आरोप लगे। पत्रकारों पर हमले हुए। जनता की नजर में सरकार की छवि खराब बन चुकी थी। 19 अगस्त को चुनाव हुए। इसमें अवामी लीग अकेले मैदान में थी, जबकि BNP, जमात-ए-इस्लामी और अन्य दलों के साथ उतरी। BNP के गठबंधन ने दो-तिहाई बहुमत हासिल कर लिया। शेख हसीना ने नतीजों को मानने से इनकार किया और धांधली का आरोप लगाया। 10 अक्टूबर 2001 को खालिदा जिया ने दूसरी बार प्रधानमंत्री पद की शपथ ली। 60 जिलों में एक साथ धमाके हुए खालिदा जिया की सरकार में अब कट्टरपंथी जमात भी सत्ता की हिस्सेदार थी। ऐसे में अवामी लीग समर्थकों और अल्पसंख्यक हिंदू पर बड़े पैमाने पर हमले हुए। गांवों में घर जलाए गए, महिलाओं के साथ हिंसा हुई और हजारों लोग पलायन को मजबूर हुए। 17 अगस्त 2005 को देश के 63 में से 60 जिलों में आधे घंटे के भीतर एक साथ 200 से ज्यादा बम धमाके हुए। हमलावरों ने अदालतों, सरकारी दफ्तरों, बस स्टैंड और बाजारों जैसे सार्वजनिक स्थानों को निशाना बनाया और पर्चे छोड़कर ‘इस्लामी शासन’ की मांग की। मकसद बड़े पैमाने पर जान-माल का नुकसान नहीं, बल्कि पूरे देश में डर का माहौल पैदा करना था। बाद की जांच में सामने आया कि इसके पीछे एक प्रतिबंधित इस्लामी संगठन जमातुल मुजाहिद्दीन बांग्लादेश (JMB) का हाथ था। शेख हसीना ने इन घटनाओं को लेकर अभियान चलाया। जिस तरह पिछले कार्यकाल में खालिदा जिया ने संसद का बहिष्कार किया था, ठीक उसी तरह शेख हसीना ने भी लगातार सदन से दूरी बनाई। नतीजा यह हुआ कि संसद महीनों तक बिना मुख्य विपक्ष के चलती रही। कानून पास होते रहे, लेकिन बहस और निगरानी लगभग खत्म हो गई। यही वह समय था जब बांग्लादेश की संसद दुनिया की सबसे लंबे बहिष्कारों वाली संसदों में गिनी जाने लगी। केयरटेकर सरकार को लेकर विवाद गहराया 2006 आते-आते केयरटेकर सरकार को लेकर विवाद गहरा गया। अवामी लीग ने आरोप लगाया कि BNP अपने करीबी लोगों को केयरटेकर सरकार और चुनाव प्रशासन में बैठाना चाहती है। विपक्ष ने यह भी आरोप लगाया कि वोटर लिस्ट में फर्जी नाम जोड़वाए जा रहे हैं और प्रशासन और पुलिस का इस्तेमाल विपक्ष को दबाने में किया जा रहा है। इसके खिलाफ बड़े आंदोलन हुए और कई जगह हिंसा भड़क गई। हालात इतने बिगड़ गए कि साल के आखिर तक बांग्लादेश गंभीर राजनीतिक संकट में फंस गया था। संसद ठप हो चुकी थी और प्रशासन के कामकाज पर असर पड़ने लगा था। इसके बाद साल 2007 में सेना समर्थित सरकार बनी। हालात संभालने के लिए केयरटेकर सरकार ने पूरे देश में आपातकाल लगा दिया। इमरजेंसी लगते ही राजनीतिक गतिविधियों पर रोक दी गई। रैलियां और प्रदर्शन बंद करा दिए गए। केयरटेकर सरकार ने हसीना-जिया दोनों को जेल भेजा इस समय दोनों महिलाएं शायद ही कभी आमने-सामने मिली हों। जब भी सरकारी कामकाज में आमना-सामना होता, तो अतीत का गुस्सा बीच में आ जाता। सेना के जनरल इस टकराव से इतने परेशान हो गए कि उन्होंने भ्रष्टाचार के आरोप में दोनों को जेल में डाल दिया। सेना-समर्थित केयरटेकर सरकार ने पहले खालिदा जिया को भ्रष्टाचार के मामलों में गिरफ्तार किया, फिर कुछ समय बाद शेख हसीना को भी जेल भेज दिया गया। इसे ‘माइनस टू सॉल्यूशन’ कहा गया। दोनों पर ट्रस्ट फंड, सरकारी ठेकों और सत्ता के दुरुपयोग से जुड़े केस डाले गए। परदे के पीछे यह कोशिश भी थी कि दोनों को राजनीति से बाहर कर नई लीडरशिप लाई जाए। हालांकि ऐसा हो नहीं पाया। शुरुआत में जनता को केयरटेकर सरकार की सख्ती पसंद आई और उन्हें लगा कि अब भ्रष्टाचार रुकेगा। लेकिन धीरे-धीरे लोगों को लंबा आपातकाल खलने लगा। वहीं, अंतरराष्ट्रीय दबाव भी बढ़ने लगा और चुनाव कराने और नेताओं को रिहा करने की मांग तेज हुई। जेल में बीमार हुईं हसीना-जिया, सरकार ने रिहा किया द न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक कहा जाता है कि उस दौर में दोनों नेताओं को एक-दूसरे के पास ही नजरबंदी में रखा गया था और शेख हसीना ने अपना खाना खालिदा जिया के साथ शेयर किया था। हालांकि शेख हसीना ने बाद में एक इंटरव्यू में इससे इनकार किया और कहा कि खालिदा जिया को बेहतर घर और सुविधाएं दी गई थीं। जेल में रहने के दौरान हसीना के कान का दर्द बढ़ गया। यह चोट उन्हें ग्रेनेड हमले के दौरान 2004 में लगी थी। अमेरिका में इलाज के बहाने वे 11 जून को जेल से रिहा हो गईं। हालांकि बीमार खालिदा जिया भी थीं, लेकिन तब उनकी रिहाई नहीं हुई। उन्हें रीढ़ की परेशानी पहले से थी, लिवर की समस्या भी बढ़ गई। सही इलाज नहीं मिलने से उनकी हालत और खराब हो गई। इंटरनेशनल प्रेशर की वजह से 11 सितंबर को खालिदा जिया रिहा हो गईं। नौवां चुनाव- 2008 हसीना ने दूसरी बार चुनाव जीता बांग्लादेश में लंबे राजनीतिक संकट के बाद दिसंबर 2008 में आम चुनाव हुए। भ्रष्टाचार के ज्यादा आरोप खालिदा जिया पर लगाए गए थे। ऐसे में उनकी छवि ज्यादा खराब हुई थी। खालिदा जिया की पार्टी, तीन और सहयोगी पार्टियों के साथ उतरी। वहीं, 2001 के चुनाव से सीख ले चुकी हसीना की अवामी लीग ने इस बार 14 पार्टियों के साथ ग्रैंड अलायंस बनाया। इन चुनाव में अवामी लीग ने 300 में से करीब 230 सीटें जीतीं, जबकि BNP सिर्फ 30 के आसपास सीटों पर सिमट गई। भारी जनादेश के साथ जनवरी 2009 में शेख हसीना प्रधानमंत्री बनीं। स्पेशल कोर्ट बनाकर विरोधियों को सजा दिलाई हसीना 1996 में पहली बार सत्ता में आईं, तब उनकी सरकार कमजोर गठबंधन पर टिकी हुई थी। संसद में उनका बहुमत बहुत मजबूत नहीं था और हर बड़े फैसले के लिए सहयोगी दलों पर निर्भर रहना पड़ता था। इस बार उनके पास बंपर बहुमत था। हसीना ने 1971 के मुक्ति संग्राम के दौरान हुए अपराधों पर कार्रवाई शुरू की। इसके लिए इंटरनेशनल क्राइम्स ट्रिब्यूनल (ICT) नाम की स्पेशल कोर्ट को एक्टिव किया। इसके बाद BNP और जमात के नेताओं को चुन-चुनकर निशाना बनाया गया। विपक्ष और जमात-ए-इस्लामी ने आरोप लगाया कि ट्रिब्यूनल का इस्तेमाल राजनीतिक विरोधियों को दबाने के लिए हो रहा है। इसके बाद देशभर में विरोध प्रदर्शन, हिंसा और राजनीतिक तनाव बढ़ गया। हसीना ने खालिदा जिया का घर छीना सत्ता में आने के 1 साल बाद 2009 में हसीना ने खालिदा जिया से वह सरकारी आवास खाली करवा लिया, जिसमें उनका परिवार करीब तीन दशक से रह रहा था। यह वही घर था जो पहले राष्ट्रपति रहे जियाउर रहमान को आवंटित किया गया था और बाद में खालिदा जिया वहीं रहती रहीं। सरकार का तर्क था कि वह घर देश की संपत्ति है, निजी नहीं। जिस नियम के मुताबिक यह घर आवंटित किया गया था, वह नियमों के खिलाफ था। हालांकि सच्चाई सभी को मालूम थी कि हसीना 8 साल पुराना बदला ले रही हैं। जब 2001 में खालिदा जिया सत्ता में लौटी थीं, तब उन्होंने भी शेख हसीना को उनका सरकारी आवास छोड़ने के लिए मजबूर किया था। इसलिए 2009 में खालिदा जिया का घर खाली कराया जाना बहुत बड़ा मुद्दा नहीं बन पाया। लोगों ने इसे ‘जैसे को तैसा’ के तौर पर देखा। परिवार की हत्या का दर्द शेख हसीना के भाषणों में बार-बार झलकता था। वह किसी न किसी रूप में जनरल जिया और उनके समर्थकों को अपने पिता की हत्या के लिए जिम्मेदार मानती रहीं। हसीना ने अपने भाषणों में कई बार कहा कि रहमान ने उनके पिता के हत्यारों को संरक्षण दिया। उनके सत्ता में आने के बाद ही हत्यारों को माफी मिली, विदेश भेजा गया और राजनीतिक सुरक्षा दी गई। दसवां चुनाव- 2014 हसीना ने केयरटेकर सिस्टम खत्म किया साल 1996 में हसीना ने केयरटेकर सरकार के मुद्दे पर जिया की सरकार 12 दिनों में गिरा दी थी। लेकिन अब हसीना ने 2011 में संविधान में बदलाव कर केयरटेकर सरकार वाली व्यवस्था ही खत्म कर दी। पहले नियम यह था कि चुनाव से कुछ समय पहले कैबिनेट भंग कर दी जाती थी और एक निष्पक्ष अंतरिम सरकार चुनाव कराती थी। लेकिन हसीना का कहना था कि यह सिस्टम असंवैधानिक है और बार-बार अस्थिरता पैदा करता है। BNP ने इसका कड़ा विरोध किया और निष्पक्ष चुनाव का सवाल उठाया। यही विवाद 2014 के चुनाव तक चला गया। जनवरी 2014 के आम चुनाव में BNP ने बहिष्कार किया। जब यह साफ हो गया कि उनकी प्रतिद्वंद्वी बिना विपक्ष की भागीदारी के ही चुनाव कराने जा रही हैं, तो खालिदा जिया ने देशभर में हड़ताल का आह्वान किया। हड़ताल के दौरान कई जगह प्रदर्शनकारियों ने ट्रकों और बसों में आग लगा दी। कुछ मामलों में यात्रियों को उतारने तक का वक्त नहीं दिया गया, जिससे हालात और ज्यादा भयावह हो गए। चुनाव से जुड़ी इस हिंसा में करीब 100 लोगों की मौत होने की खबरें आईं। पूरे देश में डर और अराजकता का माहौल बन गया। मतदान के दिन खालिदा जिया के समर्थकों को यह निर्देश दिए गए थे कि वे लोगों को वोट डालने से रोकें। चुनाव अवामी लीग ने जीत लिया, लेकिन कम वोटिंग और बिना मुकाबले वाली सीटों को लेकर सवाल खड़े हुए। 2014 तक आते-आते शेख हसीना की सत्ता मजबूत हो चुकी थी, जबकि विपक्ष कमजोर हो चुका था। 15 अगस्त को जन्मदिन मनाने पर विवाद खालिदा जिया पर एक आरोप यह भी था कि उन्होंने अपनी जन्मतिथि गलत बताकर 15 अगस्त, जो शेख हसीना के लिए शोक का दिन है, उसे अपने जन्मदिन के रूप में मनाया। इस दिन हसीना के पिता शेख मुजीब समेत उनके परिवार के 10 लोगों की हत्या कर दी गई थी। खालिदा जिया ने 15 अगस्त को अपना जन्मदिन सार्वजनिक रूप से मनाना 1990 के दशक की शुरुआत में शुरू किया था। खास तौर पर 1991 में प्रधानमंत्री बनने के बाद। अवामी लीग ने आरोप लगाया कि खालिदा ने जानबूझकर यही तारीख चुनी थी। हालांकि BNP की दलील थी कि यही खालिदा की असली जन्मतिथि है और इसमें राजनीति घसीटी जा रही है। हालांकि इस दलील से हसीना संतुष्ट नहीं हुई। इस मामले में अदालत ने 2016 में खालिदा जिया के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट भी जारी किया। हालांकि उन्होंने बीमारी का हवाला देकर कोर्ट में पेश होने से इनकार कर दिया। ग्यारहवां चुनाव- 2018 चुनाव से पहले खालिदा जिया के चुनाव लड़ने पर रोक लगी चुनाव से 10 महीने पहले फरवरी 2018 में ढाका की अदालत ने खालिदा जिया को भ्रष्टाचार के दो अलग-अलग मामलों में दोषी ठहराया। आरोप यह था कि प्रधानमंत्री रहते हुए उनके नाम से जुड़े इन ट्रस्टों में विदेशी सहायता और दान की रकम का दुरुपयोग किया गया। पहले (फरवरी 2018) ऑर्फनेज ट्रस्ट केस में उन्हें 5 साल की जेल हुई (बाद में यह बढ़ाकर 10 साल कर दी गई)। फिर चैरिटेबल ट्रस्ट केस में उन्हें 7 साल की सजा सुनाई गई। कुल मिलाकर, अदालतों के फैसलों ने उन्हें लंबे समय के लिए जेल की राह पर डाल दिया। सजा के बाद वे चुनाव लड़ने के योग्य नहीं रहीं। बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी अपनी सबसे बड़ी नेता के बिना मैदान में उतरी। इसका असर चुनाव पर पड़ा। अवामी लीग के गठबंधन ने 300 में से करीब 288 सीटें जीत लीं। बारहवां चुनाव- 2024 शेख हसीना पांचवीं बार PM बनीं BNP ने फिर केयरटेकर व्यवस्था की मांग उठाई और चुनाव बहिष्कार की धमकी दी। सरकार ने संविधान का हवाला देकर उसी ढांचे में चुनाव कराने की बात दोहराई। सड़क पर प्रदर्शन, गिरफ्तारियां और आरोप-प्रत्यारोप बढ़ते गए। माहौल पूरी तरह चुनावी हो गया। हालांकि शेख हसीना ने चुनाव कराना जारी रखा। 2018 में हुए चुनाव में जहां 80% वोटिंग हुई थी, इस बार घटकर सिर्फ 40% रह गया। अवामी लीग और उसके सहयोगी दलों ने संसद की कुल 300 में से करीब 223 सीटें जीत लीं। इसके साथ ही शेख हसीना लगातार चौथी बार और कुल मिलाकर पांचवीं बार प्रधानमंत्री बनीं। हसीना इस बार सिर्फ सात महीने ही प्रधानमंत्री पद पर रह पाईं। सरकार के खिलाफ छात्रों के नेतृत्व में देशभर में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए, जो धीरे-धीरे हिंसक होते चले गए। शेख हसीना को पद छोड़ना पड़ा और उन्हें देश छोड़कर भारत भागनाा पड़ा। 5 अगस्त 2024 से हसीना भारत में रह रही हैं। वहीं, खालिदा जिया का 30 दिसंबर 2025 को लंबी बीमारी के बाद निधन हो गया। इसके साथ ही बांग्लादेश में बैटल्स ऑफ द बेगम्स का अंत हो गया। —————————— ये खबर भी पढ़ें… बांग्लादेश चुनाव सीरीज पार्ट-2: शेख हसीना और खालिदा जिया ने मिलकर राष्ट्रपति को हटाया, फिर जीवनभर दोनों ने दुश्मनी निभाई राष्ट्रपति जियाउर रहमान की हत्या के बाद बांग्लादेश की राजनीति में उथल-पुथल मच गई। 1982 के मार्च में सेना प्रमुख हुसैन मोहम्मद इरशाद ने 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