बांसवाड़ा में बकरी के दूध से बन रहा हर्बल साबुन:बड़े ब्रांड्स को चुनौती, राजीविका से जुड़ी महिलाएं लिख रहीं आत्मनिर्भरता की नई कहानी

कभी रसोई और खेत तक सीमित रहने वाली हाथों की मेहनत आज खुशबू बनकर बाजार तक पहुंच रही है। बांसवाड़ा जिले के गढ़ी क्षेत्र में महिलाएं बकरी के दूध से हर्बल साबुन तैयार कर आत्मनिर्भरता की नई कहानी लिख रही हैं। राजीविका से जुड़ी ये ‘लखपति दीदियां’ अब केवल परिवार का सहारा नहीं, बल्कि अपने हुनर से बड़े ब्रांड्स को भी चुनौती दे रही हैं। महिलाओं का समूह 9 तरह के हर्बल साबुन बना रहा हैं, जिसमें बकरी के दूध से बना साबुन की सबसे ज्यादा डिमांड है। प्राकृतिक तत्वों से तैयार यह साबुन किफायती दाम में उपलब्ध है और बाजार में तेजी से अपनी पहचान बना रहा है। 20 दिन की ट्रेनिंग ने बदली जिंदगी गढ़ी क्षेत्र के पंचवटी ओजरिया गांव की रूपकांता डामोर बताती हैं कि उन्हें राजीविका के भारत माता वन धन केंद्र के माध्यम से 20 दिन का प्रशिक्षण मिला। इसके बाद 12 महिलाओं का समूह संगठित हुआ और पिछले दो वर्षों से लगातार उत्पादन कर रहा है। प्रशिक्षण ने न केवल तकनीक सिखाई, बल्कि आत्मविश्वास भी बढ़ाया। केमिकल फ्री, त्वचा के लिए लाभकारी राजीविका के जिला परियोजना प्रबंधक धनपत सिंह के अनुसार, इन साबुनों में तुलसी, नीम, फूल-पत्तियां और बकरी का दूध जैसे प्राकृतिक तत्वों का उपयोग किया जाता है। बकरी के दूध से बना साबुन प्रोटीन से भरपूर और त्वचा के लिए अच्छा माना जाता है। किफायती दाम, बेहतर गुणवत्ता जहां बाजार में बड़े ब्रांड्स के हर्बल साबुन ऊंची कीमत पर मिलते हैं, वहीं गढ़ी की महिलाएं इसे मात्र 100 रुपए में उपलब्ध करा रही हैं। एक साबुन तैयार करने में लगभग 70 रुपए की लागत आती है। समूह ने उत्पाद के विक्रय के लिए विधिवत रजिस्ट्रेशन और लाइसेंस भी प्राप्त कर रखा है। बढ़ती मांग, नए अवसर राज्यभर में आयोजित राजसखी मेलों में इन उत्पादों की स्टॉल लगाई जाती है, जहां अच्छी बिक्री हो रही है। जनजातीय समाज की इन महिलाओं की मेहनत अब रंग ला रही है। उनकी मांग है कि उत्पादों का व्यापक प्रचार-प्रसार किया जाए, ताकि उन्हें बड़ा बाजार मिल सके। राजीविका के माध्यम से अन्य ग्रामीण क्षेत्रों की महिलाओं को भी प्रशिक्षण दिया जा रहा है। विभागीय अधिकारी भी इन उत्पादों का उपयोग कर उनकी गुणवत्ता की सराहना कर रहे हैं। बांसवाड़ा की ये महिलाएं साबित कर रही हैं कि यदि अवसर और प्रशिक्षण मिले, तो गांव की शक्ति बड़े ब्रांड्स को भी टक्कर दे सकती है।

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