बाड़मेर जिले में स्वास्थ्य सेवा भगवान भरोसे है। कहीं भवन नहीं है तो कहीं डॉक्टर गायब है। हाल ये है कि ग्रामीण इलाकों की स्वास्थ्य सेवाएं वेंटिलेटर पर है। ये तस्वीरें किसी झोलाछाप क्लिनिक की नहीं है, बल्कि सरकारी सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र की है। सरकार सीएचसी पर 30 बेड के अस्पताल का दावा करती है, लेकिन सरकार के इन दावों में यहां ग्रामीण इलाकों में पोल खुल रही है। बामणोर का उप स्वास्थ्य केंद्र 2013 में पीएचसी में क्रमोन्नत हुआ था। करीब 10 साल तक बिल्डिंग ही नहीं बनी। 2023 में बिना पीएचसी बिल्डिंग के सीएचसी में क्रमोन्नत हो गया। अब करीब ढाई साल हो चुके है, लेकिन अब भी बिल्डिंग तैयार नहीं है। हाल ये है कि यहां स्वास्थ्य सेवाएं खाट पर चल रही है। मरीजों के चेकअप के लिए ओपीडी का कमरा इतना छोटा है कि अंदर मरीज नहीं आ सकते है। ऐसे में डॉक्टर खिड़की के अंदर से मरीजों की जांच करते है। अब सरकार ने 5 करोड़ रुपए की सीएचसी के लिए बिल्डिंग का काम शुरू करवाया है, लेकिन काम अधूरा है। बाड़मेर. यह आधुनिक भारत की खिड़की नहीं, सिस्टम की लाचारी का सुराख है। यह तस्वीर सीएचसी बामणोर की है, टिन शेड के टूटी खाट पर मरीजो को ड्रिप चढ़ाई जा रही है। फोटो: नरपत रामावत > सीएचसी पर सर्जन, स्त्री एवं प्रसूति रोग, फिजिशियन, शिशु रोग विशेषज्ञ होने चाहिए। > CHC में सामान्यत 30 बेड की सुविधा होनी चाहिए ताकि मरीजों को भर्ती किया जा सके। > इनडोर वार्ड (पुरुष और महिला अलग-अलग) की व्यवस्था होनी चाहिए। > आपातकालीन एवं ऑपरेशन सुविधाएं, 24 घंटे इमरजेंसी रूम की सुविधा। > ऑपरेशन के लिए सिजेरियन सेक्शन और सामान्य सर्जरी रूम। > प्रसव के लिए लैबर रूम। > खून, पेशाब की जांच, एक्स-रे समेत 37 तरह की जांच। > मरीजों को जिला अस्पताल रेफर करने के लिए 108 या 104 एम्बुलेंस की सुविधा। ^बामणोर में भवन का अभाव है। उप स्वास्थ्य केंद्र की बिल्डिंग में ही सीएचसी चल रहा है। 5 करोड़ से नई बिल्डिंग तैयार हो रही है, उसे जल्दी काम पूरा करने को बोला है। दो-ढाई महीने में बिल्डिंग तैयार हो जाएगी। – विष्णुराम विश्नोई, CMHO बामणोर सीएचसी है, लेकिन लैबर रूम नहीं होने से यहां प्रसुताओं के प्रसव की सुविधा ही नहीं है। निशुल्क दवा काउंटर के लिए एक छोटा सा कमरा है। करीब 15 लोगों का स्टाफ है, लेकिन अधिकांश नर्सिंग स्टाफ को अस्पताल के बाहर बने टिन शेड में ही लगी चारपाई पर मरीजों का इलाज करना पड़ रहा है। आधुनिक मेडिकल बेड की जगह यहां खाट पर इलाज होता है। देसी जुगाड़ से लोहे के पोल को ड्रिप चढ़ाने के स्टैंड के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है। हाल ये है कि यहां स्वास्थ्य सेवाओं से ज्यादा जरूरी, चुनावी घोषणाएं है। क्योंकि 2013 के चुनावी साल में उप स्वास्थ्य से पीएचसी बनी, 10 साल तक बिल्डिंग हीं नहीं बनी। 2023 के चुनावी साल में फिर पीएचसी को सीएचसी में क्रमोन्नत कर दिया। बामणोर उप स्वास्थ्य केंद्र के टिन शेड में 10 साल तक पीएचसी, इसके बाद दो साल से सीएचसी चल रही है। यहां रोज 150 से ज्यादा ओपीडी है, लेकिन ओपीडी देखने के लिए कमरा नहीं है। जहां डॉक्टर खिड़की पर अपनी कुर्सी लगाकर बाहर कतार में खड़े मरीजों को की जांच करते है। यह तस्वीर आधुनिक भारत में ऐसे ग्रामीण इलाकों की है, जहां आधुनिक डिजिटल स्वास्थ्य सेवाओं के दावे किए जा रहे है। भास्कर टीम बामणोर पहुंची तो डॉ. राजेश कुमार मरीजों की जांच कर रहे थे। यहां दो डॉक्टर कार्यरत है, जिसमें दिनेश विश्नोई छुट्टी पर थे। डिजिटल इंडिया की चमक इन टिन शेड के नीचे दम तोड़ रही है। सीमावर्ती गांवों में स्वास्थ्य सेवाओं के बुरे हाल है।


