बीआईटी मेसरा में ‘जड़ों से नवजागरण’ शुरू, एआई से सहेजी जाएगी जनजातीय संस्कृति

बिरला प्रौद्योगिकी संस्थान (BIT), मेसरा में शुक्रवार को तीन दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला ‘जड़ों से नवजागरण : झारखंड में जनजातीय विरासत, नवाचार और डिजिटल उद्यमिता’ का भव्य आगाज हुआ। 8 मार्च तक चलने वाले इस आयोजन का मुख्य उद्देश्य राज्य की समृद्ध जनजातीय परंपराओं को आधुनिक तकनीक और डिजिटल बिजनेस मॉडल से जोड़ना है। कार्यशाला का उद्घाटन मुख्य अतिथि पद्मश्री मधु मंसूरी हंसमुख ने किया। उन्होंने अपने संघर्षों और अनुभवों को साझा करते हुए छात्रों को अपनी सांस्कृतिक पहचान पर गर्व करने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने जब अपना प्रसिद्ध गीत ‘झारखंड कर कोरा’ गाया, तो पूरा सभागार तालियों से गूंज उठा। हंसमुख ने कहा कि युवाओं को अपनी जड़ों से जुड़े बिना सच्ची तरक्की नहीं मिल सकती। विशिष्ट अतिथि कला-संस्कृति निदेशक आसिफ एकराम ने कहा कि आज के दौर में जनजातीय ज्ञान को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस व डिजिटल प्लेटफॉर्म से जोड़ना समय की मांग है। उन्होंने शोधकर्ताओं को ऐसे आइडियाज पर काम करने को कहा जो विरासत और आधुनिकता के बीच सेतु का काम करें।
विशेषज्ञों ने सत्रों में गहन चर्चा की
पारंपरिक खान-पान: डॉ. मनीषा उरांव ने महुआ, दुरैंता और जुहू जैसे पारंपरिक खाद्य पदार्थों के औषधीय और आर्थिक महत्व पर व्याख्यान दिया। डिजिटल संरक्षण: डॉ. सोमनाथ बी. सामंतराय बसु मलिक ने बताया कि कैसे डिजिटल टूल्स के जरिए सदियों पुराने जनजातीय ज्ञान को भविष्य के लिए सुरक्षित रखा जा सकता है। वर्कशॉप में दिखे झारखंड की संस्कृति के रंग
चाक पर मिट्टी की कलाकृति बनाकर प्रदर्शित करते छात्र। कार्यशाला के पहले दिन केवल किताबी बातें नहीं हुईं, बल्कि प्रतिभागियों को व्यावहारिक अनुभव भी मिला। अनुभवी जनजातीय कलाकारों की देखरेख में छात्रों ने कई सत्रों में भाग लिया, जिसमें सोहराई पेंटिंग को कैनवास पर उकेरा गया। मानव चेहरों के पारंपरिक मास्क बनाने की बारीकियां सीखीं। मिट्टी शिल्प में मिट्टी तैयार करने से लेकर बर्तन बनाने की पारंपरिक प्रक्रिया का सजीव प्रदर्शन हुआ। दिन का समापन बेहद ऊर्जावान रहा। राज्य के विभिन्न कोनों से आए कलाकारों ने पारंपरिक झूमर नृत्य प्रस्तुत कर झारखंड की सांस्कृतिक विविधता की जीवंत तस्वीर पेश की।
इनकी रही मुख्य भूमिका: कार्यक्रम को सफल बनाने में विभागाध्यक्ष डॉ. संजय झा, डॉ. निशिकांत दुबे, डॉ. मृणाल पाठक और बड़ी संख्या में छात्र स्वयंसेवकों का योगदान रहा। अगले दो दिनों तक नवाचार पर कई इंटरएक्टिव सत्र आयोजित किए जाएंगे। विरासत और तकनीक का संगम

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