बीकानेर में महिला बनकर पहुंचा कॉमेडियन:रात ढलते ही सड़कों पर निकले अघोरी; भस्म, त्रिशूल और डमरू हाथ में लेकर स्वांग रचा

बीकानेर की होली सिर्फ रंगों और रम्मतों तक सीमित नहीं है। रात ढलते ही परकोटे की गलियों में तरह-तरह के स्वांग रचकर युवा पारंपरिक उत्सव को अनोखा रूप दे रहे हैं। जटाजूट, भस्म, त्रिशूल और डमरू के साथ उनका लुक लोगों का ध्यान खींच रहा है। जोधपुर से आए युवा ने महिला का वेश धरा, मेक अप आर्टिस्ट से पूरा खुद को सजवाया। इसके बाद आयोजन में शामिल हुआ। कॉमेडियन और डिजिटल क्रिएटर प्रतीक मूथा ने ब्यूटिशियन आरती आचार्य से प्रोफेशनल मेकअप करवा कर दाढ़ी-मूंछ हटाई और महिला का स्वांग रचा। वे शहर के विभिन्न कार्यक्रमों और रम्मतों में नजर आए। उनके साथ फोटो खिंचवाने के लिए युवाओं में होड़ लगी रही। अगोरी, शिवाजी और अन्य ऐतिहासिक रूप होली के इस उत्सव में कई युवक अगोरी का स्वांग धारण किए दिख रहे हैं, जो महादेव के रूप में आए युवकों के साथ रम्मत स्थलों पर पहुंचते हैं। एक युवक ने स्वयं को छत्रपति शिवाजी के रूप में सजाया—विशेष टोपी और दाढ़ी के साथ उनका ऐतिहासिक लुक भी लोगों के आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। कन्नू रंगा फिर बने चर्चा का विषय हर साल की तरह इस बार भी कन्नू रंगा महिला वेष में नजर आए। चाहे बिस्सों की रम्मत हो या कीकाणी व्यासों के चौक की रम्मत—वे जहां भी पहुंचे, चर्चा का विषय बने रहे। कई बार इन स्वांगधारियों का रूप इतना वास्तविक होता है कि राह चलते लोग उन्हें सचमुच महिला समझकर दूरी बनाए रखते हैं। उनकी कॉमिक हरकतों से ही स्पष्ट होता है कि वे युवक हैं। बच्चों के लिए नए आकर्षक मुखोटे शहर में बच्चों के बीच भी होली का उत्साह कम नहीं है। कार्टून किरदारों के नए और आकर्षक मुखौटे बाजार में दिखाई दे रहे हैं। इन्हें पहनकर बच्चे देर रात तक मोहल्लों में घूमते और उत्सव का आनंद लेते नजर आते हैं। बीकानेर की होली में स्वांग, हास्य और लोक परंपरा का यह संगम शहर की सांस्कृतिक जीवंतता को नई ऊंचाई देता है। स्वांग परंपरा का सांस्कृतिक महत्व बीकानेर में स्वांग की परंपरा दशकों पुरानी है। फागुन के दिनों में हास्य, व्यंग्य और सामाजिक संदेश देने का यह पारंपरिक माध्यम रहा है। लोकजीवन की घटनाओं, पात्रों और देवी-देवताओं के रूप धरकर युवा न केवल मनोरंजन करते हैं, बल्कि समाज को आईना भी दिखाते हैं। समय के साथ इसमें आधुनिक मेकअप और तकनीक जुड़ गई है, लेकिन इसका मूल भाव आज भी वही है—रंग, हंसी और लोकसंस्कृति का उत्सव।

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