बेटियों को बचाने के लिए लगाए पेड़, वहां अवैध भट्टियां:बोले–हमारे ऊपर कोई नहीं,कंटेनर भरकर गिली लकड़ियां गुजरात तक सप्लाई

राजसमंद की पहचान है, यहां बेटियों के जन्म पर गांव में पौधे लगाए जाते हैं। लेकिन, पिछले कुछ महीने में राजसमंद में अवैध तरीके से लकड़ियों को काटकर उन्हें राजस्थान के बाहर भेजा जा रहा है। इसके अलावा यहां रेलमगरा, कुंवारिया व राजसमंद उपखण्ड क्षेत्र में अवैध कोयले की भट्टियां चल रही है। हाल ही में बागोटा, बलियों का गुडा, बड़ारड़ा में अवैध लकडिय़ों का स्टॉक पकड़ा गया था। पता चला कि जिले में बड़े स्तर पर अवैध तरीके से लकड़ियों की कटाई कर कोयले की भट्टियां बनाई जा रही है। इन भट्टियों पर मुंह मांगे दाम पर ​जिस लकड़ी का कोयला चाहिए वह मिल जाएगा। मामले की पड़ताल की तो सामने आया कि अकेले राजसमंद में 50 से 60 किलोमीटर के एरिया में 250 से ज्यादा अवैध भट्टियां हैं। दैनिक भास्कर की टीम इन भट्टियों पर पहुंची। यहां काम करने वालों से बात की तो पता चला कि अलग–अलग ग्रुप में इन भट्टियों पर अवैध कोयला बनाने का काम किया जा रहा है। टीम जिले के जूणदा गांव में पहुंची। यहां भट्टी पर काम करने वाले युवक से बातचीत की तो उसका कहना था कि हमारे ऊपर कोई नहीं हैं। यहां ऐसी कई भट्टियां है। उसने बताया कि यहां कच्चा माल सप्लाई करने से लेकर कोयला बेचने तक के अलग–अलग गिरोह है। भास्कर ने इस दौरान 194 भट्टियों को अपने कैमरे में कैद किया। फोटो में देखिए अवैध भट्टियों का कारोबार कैसे चल रहा है पढि़ए ये खास रिपोर्ट…कैसे राजसमंदर के जंगलों में चल रहे है कोयला की अवैध भट्टियां… जूणदा गांव में आमीर नाम के युवक से बातचीत… – यहां कौन–कौन सी लकड़ियों के कोयले मिल जाएंगे ? युवक: नीम, खेजड़ा, सिरस,पलास के अलाव जो भी बोलेंगे उस लकड़ी का कोयला बनाकर पहुंचा देंगे। – यहां भट्टियां लगाने के लिए परमिशन लेनी पड़ती है क्या, तुमने भी परमिशन लेकर लगाई है ? युवक: नहीं…। – तो यहां भट्टियों के लिए क्या करना पड़ता है ? युवक: 20 हजार रुपए सालाना गांव के एक व्यक्ति से किराए पर जमीन ली है। 4 महीने से काम कर रहे हैं। यहां लोकल ठेकेदार लकड़ी पहुंचाते है। – क्या सारा काम ठेकेदार ही करता है क्या ? युवक: नहीं 2 रुपए किलो के भाव से लकड़ियां खरीद ते है। इसके बाद कोयला तैयार कर 17 से 18 रुपए किलो में बेचते है। यहां से दूसरा सेलर माल उठाता, जो आगे बेच देता है। अलग–अलग काम के अलग–अलग ठेकेदार है। – तुम लोगों के अलावा यहां और भी कोई काम करना है क्या ? युवक: यहां हमारे ऊपर कोई नहीं है। हम ही कोयला बनाते है और बेच देते है। हम लोग भीलवाड़ा से आए है। रोजाना दो से तीन ट्रॉली कोयला बनाकर बेचते है। संचालक बोला– कंटेनर में गुजरात जाती है लकड़ियां टीम जाणुदा के पास कुरज में एक भट्टी पर पहुंची। यहां लकड़ी बनाने का काम चल रहा था। यहां संचालक गोरु खान मिला। उससे जब कोयले के बारे में पूछा तो बोला– हम लोग तो भट्टी बंद करने वाले है। उसने बताया कि यहां कोयला बनाने के का अलावा पेड़ों को काटकर बड़े माफिया कंटेनर से इन्हें गुजरात भेज रहे है। भट्टी पर काम करने वाला मजदूर बोला– सालों से काम चल रहा है,कोई रोकने वाला नहीं टीम कुरज के पास पहुंची। यहां एक जगह अवैध डिपो चल रहा था। यहां काम करने वाले सावर सिंह ने बताया कि 8 सालों से इस एरिया में अवैध कोयला बनाने का काम चल रहा है। ट्रकों में कोयला भर बाहर पहुंचाया जाता है। कोई रोकने–टोकने वाला नहीं। कोई रोक लेता है तो भीलवाड़ा या दूसरी जगह चले जाते है। खेत और जंगलों में बना रखे है लकड़ी के अवैध डिपो दरअसल, कोयला माफियाओं ने ये डिपो गांव से दूर खेतों या फिर जंगलों में बना रखे है। यहां पहुंचना भी इतना आसान नहीं है। आस–पास इतनी ऊंची पहाड़ियां और ऊबड़–खाबड़ रास्ते हैं कि इन तक पहुंचने में काफी समय लग जाता है। टीम ने ऐसे 10 अवैध डिपो पकड़े। यहां काम करने वालों से बातचीत की तो पता चला कि गिली लकड़ियों तक का अवैध स्टोरेज इन्होंने कर रखा था। बोले– जो चाहो वो लकड़ियां मिल जाएगी भास्कर टीम सबसे पहले रेलमगरा ब्लॉक के जुणदा गांव पहुंची। यहां चार दीवारी में एक साथ 25 भट्टियां मिली। यहां नीम, बबूल और पलाश की लकड़ियों से कोयला बनाया जा रहा था। यहां काम करने वालों ने बताया कि जिस लकड़ी का चाहेंगे उसका कोयला मिल जाएगा। उन्होने बताया कि 2 रुपए में लकड़ी खरीदते है और कोयला बनाकर 18 रुपए प्रति किलो के हिसाब से बेचा जाता है। डिपो नंबर–2: जुणदा से आगे एक ओर डीपो चल रहा था। यहां बड़ी संख्या में अवैध लकड़ियों का स्टॉक मिला। यहां 20 भट्टियों में कोयला बनाया जा रहा था। खास तौर पर नीम की लकड़ियों का। तस्लीम, शाकिर, शाइन मोहम्मद व मुईनुद्दीन यहां काम कर रहे थे। उन्होंने बताया– वे सभी भीलवाड़ा जिले के रहने वाले है। रोजाना दो से तीन ट्रॉली लकड़ी यहां पहुंचती है। इन्होंने बताया कि यहां पेड़ काटने से लेकर लकड़ी को पहुंचाने वाले अलग–अलग गिरो है। कोयला बनाने वाले अलग है और इसे बेचने वाले अलग है। चार लेवल पर इस गोरखधंधे की चेन बनी हुई है। इसके 2 किमी दायरे में एक और डिपो था, जहां 18 भट्टियां चल रही थी। टीम आगे बढ़ी तो एक और डिपो और नजर आया। यहां एक साथ 42 भट्टियां थी। यहां दिन में कोई नहीं था। आस–पास के लोगों ने बताया कि यहां रात में काम होता है। एक साथ भट्टियों में लकड़ी जलाकर छोड़ दिया जाता है। पांच से सात दिन में जब कोयला तैयार हो जाता है तो कुछ लोग आकर कोयला यहां से ले जाते है। इसके बाद टीम अलग–अलग इलाकों में पहुंची, जहां 14 से 15 भट्टियां मिलीं। मादड़ी में 28 और उसके पास एक डिपो में 11 भट्टियां मिली। मेनिया गांव में 16 भट्टी पर अवैध कोयला बनाने का काम किया जा रहा था। यहां बड़ी मात्रा में लकड़ियों का बड़ा स्टॉक मिला। अवैध रूप से इन लकड़ियों की कटाई कर यहां लाया गया। पद्मश्री श्याम सुंदर पालीवाल बोले–अब तक कार्रवाई नहीं हुई पद्मश्री श्याम सुंदर पालीवाल ने बताया कि पिछले दिनों ग्रामीणों की सहायता से इसी माह पिपलांत्री के पास बागोटा, बलियों का गुडा, बड़ारड़ा में भी अवैध लकडिय़ों के स्टॉक पकड़े थे। इसके बाद सभी से अपील की गई थी कि जहां भी अवैध लकड़ियों की कटाई हो रही है, उसकी जानकारी दे। इसके बाद रेलमगरा में अवैध डिपो के बारे में पता चला। हैरानी की बात है कि इतने बड़े स्तर पर अवैध डिपो और पेड़ों की कटाई हो रही है। इसके बाद भी इन माफियाओं पर कोई कार्रवाई नहीं हो रही है। अधिकारी बोले– सबकुछ ध्यान में है, कार्रवाई भी की थी डीएफओ कस्तूरी प्रशांत सुले ने बताया– नीम, खाखरा, जैसी लकड़ियों को कोयले के उपयोग में नहीं ले सकते है। इसके अलावा भी यदि कोई कोयला बनाता है तो उसको लाइसेंस लेकर नियमों की पालना करनी होती है। इसमें भी अंग्रेजी बबूल जैसी कुछ लकड़ियों ही कोयला बनाने के कम में ले सकते है। उन्होंने बताया गिली लकडी का अवैध परिवहन पाया जाता है तो पेनल्टी का प्रावधान है। अलग अलग वाहन पर अलग पेनल्टी की केलकुलेशन होती है। ट्रक पर करीब 2 लाख तक की पेनल्टी लगती हैं जबकि ट्रेक्टर या छोटे वाहनों पर 25 हजार तक की पेनल्टी लगती है। राजस्व जमीन पर यदि स्टॉक मिलता है तो वहां एसडीएम स्तर पर कार्रवाई की जाती है। यदि कोई व्यक्ति तीन बार अवैध लकडी परिवहन करते हुए पकड़ा जाता है तो सजा का प्रावधान भी है।

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