बेटे के इंतजार में पिता चल बसे…मां होश-हवास खो चुकी:बहन बोली-नौकरी नहीं लगी, डिप्रेशन में था फार्मासिस्ट भाई, पाकिस्तान जेल से लौटा तो लिपटकर रोई

‘खुशी तो है कि भाई वर्षों बाद घर आ गया। इस बीच, हमने बहुत कुछ खो दिया। पिताजी गुजर गए। इंतजार करते-करते मां होश-हवास खो चुकी हैं। जब वह घर आया, विश्वास नहीं हुआ। उससे लिपटकर रोती रही।’ यह कहते हुए संघमित्रा खोब्रागड़े की आंखों से आंसू निकल आते हैं। ये आंसू खुशी के हैं। वजह उसका भाई प्रसन्नजीत रंगारी सात साल बाद 6 फरवरी को घर आया है। वह पाकिस्तान की जेल में बंद था। 31 जनवरी को भारतीय कैदियों की रिहाई में उसका भी नाम शामिल था। इससे पहले प्रसन्नजीत के जीजा राजेश खोब्रागड़े, मैहकेपार रोजगार सहायक योगेंद्र चौधरी, मोहगांव रोजगार सहायक आशीष वासिनी और कॉन्स्टेबल लक्ष्मीप्रसाद बघेल, उन्हें लेने बालाघाट से अमृतसर गए थे। दैनिक भास्कर की टीम जिला मुख्यालय से 100 किलोमीटर दूर कटंगी क्षेत्र के मैहकेपार गांव पहुंची। प्रसन्नजीत की बहन संघमित्रा ने भाई के लापता होने और उसे वापस लाने के संघर्ष के बारे में बताया। भाई के लिए बनाऊंगी गाजर का हलवा मैहकेपार गांव के इस घर के सामने लोगों की भीड़ है। सरकारी स्कूल के बच्चे घर जाने से पहले झुंड में जमा है। कई लोग बाहर से भी आए हैं। बरामदे में हट्टा-कट्टा सा युवक बैठा है, पर उसके चेहरे पर न तो खुशी है और न ही दुख। ये प्रसन्नजीत रंगारी है। खामोशी से बैठे प्रसन्नजीत से जब कोई कुछ पूछता है, तो वो कुछ कहता है। लेकिन, जब यही बात उससे दूसरा शख्स पूछता है, तो वो कुछ और जवाब देता है। उसकी ये बात सुन घर के बाहर खड़े स्कूली बच्चे हंसने लगते हैं। इतने में युवक की बगल की कुर्सी पर बैठी संघमित्रा कहती हैं- इसमें हंसने की क्या बात है। इसकी तबीयत ठीक नहीं है। संघमित्रा प्रसन्नजीत की बहन हैं। पाकिस्तान से अपने भाई की रिहाई के लिए ऐड़ी-चोटी का जोर इन्होंने ही लगाया। वह कहती हैं कि भाई को गाजर का हलवा बहुत पसंद है, वही बनाऊंगी। फिर पंजाब से आए कॉल ने जगाई उम्मीद संघमित्रा कहती हैं कि प्रसन्नजीत पढ़ा-लिखा है। 2011 में भोपाल की आरजीपीवी से फर्स्ट डिवीजन में बी-फार्मा किया था। उसी साल बतौर फार्मासिस्ट उसका रजिस्ट्रेशन भी हो गया था। शुरुआत में सब कुछ ठीक चल रहा था। वह नौकरी के लिए प्रयास कर रहा था, लेकिन उसे अच्छी नौकरी नहीं मिल पा रही थी। इसी कारण वह डिप्रेशन में रहने लगा। उसकी तबीयत खराब रहने लगी। कई बार वह घर से कई-कई दिनों के लिए चला जाता, फिर वापस लौट आता। करीब 11 साल पहले जब कई साल तक उसका कोई पता नहीं चला, तो हम लोग मान बैठे थे कि वह मर गया है, फिर अचानक एक दिन पंजाब से आए एक फोन कॉल ने उम्मीद जगा दी। वर्षों बाद भाई घर लौट आया, लेकिन तब तक हम बहुत कुछ खो चुके हैं। प्रसन्नजीत के लापता होने के बाद पिताजी की तबीयत लगातार बिगड़ती चली गई। जब पाकिस्तान की जेल से रिहाई से जुड़े कागजात तैयार हो रहे थे, तभी उनकी मौत हो गई। मां तो पहले ही इंतजार करते-करते होश-हवास खो चुकी है। संघमित्रा कहती हैं मैं अपने ससुराल वालों के साथ रहती हूं। मेरी मां यहीं गांव में रहती हैं। गांव वाले उन्हें खाना देते हैं। इसी तरह उनका गुजारा होता है। मैंने उनसे कई बार मेरे साथ आकर रहने को कहा, लेकिन वह हर सुबह बरामदे में बैठ जाती हैं। जैसे अपने बेटे का इंतजार कर रही हों।
पहले भी हो चुका था लापता संघमित्रा बताती हैं कि घर आने के बाद भाई ज्यादा बात नहीं कर रहा। पहचान जरूर रहा है, लेकिन ज्यादा कुछ बताया नहीं है। उसकी मानसिक स्थिति कमजोर है। खैर, कुछ भी हो, भाई तो सुरक्षित आंखों के सामने है। जब पूछा- ये पाकिस्तान कैसे पहुंच गया? वह कहती हैं- इसके साथ थोड़ी दिमागी दिक्कत, तो पहले से थी। मैं दो दिन से उससे पुरानी बातें कर रही हूं, लेकिन उसे तो कुछ याद ही नहीं आ रहा। करीब आठ साल पहले 2015 में ये पहली बार घर से बिना कुछ कहे कहीं चला गया। हमने थाने में रिपोर्ट लिखाई थी। कुछ महीने बाद अपने-आप वापस आ गया। महीने-दो महीने बाद फिर कहीं चला गया। थाने में रिपोर्ट करने पहुंचे, तो उन्होंने कहा- पहले भी गया है, आ जाएगा। कुछ दिन बाद उसका बिहार से फोन आया। इसके बाद हम इंतजार करते रहे। कई साल बीत गए, खबर नहीं मिल रही थी। मैंने और पति राजेश खोब्रागड़े ने बहुत तलाश किया। जब उम्मीद टूट गई, तो मान बैठे कि प्रसन्नजीत मर गया है। वो साल का आखिरी दिन हमेशा याद रहेगा संघमित्रा कहती हैं – 31 दिसंबर 2021 को नहीं भूल सकती। था तो ये साल का आखिरी दिन, लेकिन ये मेरे लिए खुशी का था। उस दिन पाकिस्तान की जेल में 29 साल से बंद कुलजीत सिंह कछवाहा अपने वतन आए थे। उनका फोन आया, बताया कि आपका भाई जिंदा है। वह पाकिस्तान की जेल में बंद है। मुझे विश्वास ही नहीं हुआ कि प्रसन्नजीत पाकिस्तान में है। समझ नहीं आ रहा था, क्या करें। मैंने फिर से कुलजीत सिंह को फोन लगाया, तो उन्होंने प्रसन्नजीत के जिंदा होने का भरोसा दिलाया। उन्होंने बताया कि वहां की सेना ने उसे 1 अक्टूबर 2019 को पाकिस्तान के बाटापुर से हिरासत में लिया था। उस पर किसी तरह के आरोप तय नहीं हुए थे। पाकिस्तान में उस पर सुनील अदे के नाम से केस है। जो भी कागजी कार्रवाई करो, वो सुनील के नाम से ही करना। डेढ़ साल तक चक्कर लगाते रहे संघमित्रा बताती हैं कि इसके बाद करीब डेढ़ साल तक कलेक्टोरेट और भोपाल तक के चक्कर लगाते रहे। पड़ोसी वकील कपिल फुले ने मदद की। उन्होंने पंजाब के कुलजीत कछवाहा से बात कर तथ्य जुटाए। 21 फरवरी 2024 को मानव अधिकार आयोग में याचिका दायर करवाई। इसमें तीन आधार थे। जैसे, चार साल से प्रसन्नजीत पाकिस्तान की जेल में बिना ट्रायल और कानूनी मदद के बंद है। वो मानसिक रूप से बीमार है। भेदभाव की आशंका जताई और इसे मानव अधिकार का उल्लंघन बताया। इंतजार करते-करते पिता ने तोड़ा दम 2 फरवरी 2024 को याचिका लगाई। आठ दिन में आयोग ने मामला रजिस्टर्ड किया। 4 मार्च से भाई की घर वापसी कार्रवाई शुरू हो गई। हम प्रसन्नजीत के कागजात तैयार करवा रहे थे। बहुत भागदौड़ करनी पड़ रही थी। इधर, पिताजी लोपचंद रंगारी की तबीयत बहुत ज्यादा खराब रहने लगी। उन्हें उम्मीद बंधाते रहे कि भाई आने वाला है। जिस दिन प्रसन्नजीत के दस्तावेज वेरिफिकेशन के लिए आए, उसी दिन उनका निधन हो गया। मां तो पहले ही दिमागी संतुलन खो चुकी थीं। भाई के भारत आने की खबर पर नहीं हुआ भरोसा संघमित्रा कहती हैं कि हमें तो उस दिन भरोसा ही नहीं हुआ, जब यहां के थाने से 1 फरवरी को फोन आया कि प्रसन्नजीत को दूसरे भारतीय कैदियों के साथ रिहा कर दिया गया है। वो अमृतसर पहुंच गया है। ये बात कलेक्टर-एसपी को भी बताई गई। कलेक्टर ने भाई को लाने के लिए व्यवस्था की। हमारे साथ दो पुलिसवाले और दो पंचायतकर्मी सरकारी गाड़ी से भेजे। वहां चौकी में पांच साल बाद प्रसन्नजीत मिला। मेरे तो आंसू नहीं रुक रहे थे। उसे गले से लगाया। बहुत देर तक लिपट कर रोती रही। फिर खुद को संभाला। पुलिस की कार्रवाई पूरी होने में एक दिन लग गया। पाकिस्तान कैसे पहुंचा प्रसन्नजीत प्रसन्नजीत की रिहाई में अहम किरदार निभाने वाले वकील कपिल फुले कहते हैं कि संघमित्रा ने उसके बारे में जो बातें बताई थीं, तो पहले तो मुझे भी भरोसा नहीं हुआ था। मैंने पंजाब के कुलजीत सिंह कछवाहा का फोन नंबर लिया। उसने प्रसन्नजीत के पाकिस्तान की जेल में बंद होने के बारे में बताया था। वे खुद 29 साल बाद पाकिस्तान के जेल से रिहा होकर आए थे। उनसे बात कर मामला समझा। मैंने उनसे ये भी पूछा की आखिर प्रसन्नजीत गांव से लापता होने के बाद कैसे पाकिस्तान पहुंच गया। कुलजीत ने मुझे बताया कि प्रसन्नजीत पाकिस्तानी सेना को बेहोशी की हालत में मिला था। अवैध रूप से बॉर्डर पार करने पर उसे जेल में डाल दिया गया। उसे वहां वकील भी नहीं मिला। यह भी पढ़ें – पाकिस्तानी जेल में 7 साल बिताकर बालाघाट लौटे प्रसन्नजीत
पाकिस्तान की जेल से सात साल बाद निकल पाए प्रसन्नजीत रंगारी शुक्रवार देर शाम करीब 7 बजे बालाघाट के कटंगी पहुंचे। यहां बीजेपी विधायक गौरव पारधी ने प्रसन्नजीत का शॉल और माला पहनाकर स्वागत किया। कटंगी के बाद रात करीब सवा नौ बजे प्रसन्नजीत अपने जीजा राजेश खोब्रागड़े के साथ उनके घर मैहकेपार आए। पढ़ें पूरी खबर

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