ब्रह्माजी ने शिव को प्रसन्न करने के लिए कठोर तप किया

भास्कर न्यूज | कलंगपुर ग्राम कजराबांधा में चल रहे संगीतमय शिवमहापुराण कथा के तीसरे दिन कथावाचक पं. अमित सरस् भारती झा ने उपस्थित जनसमूह को सृष्टि के प्रारंभ और अर्द्धनारीश्वर रूप के रहस्य के बारे में बताया। कथावाचक ने बताया कि ब्रह्माजी द्वारा प्रारंभिक मानसिक सृष्टि रची गई थी, लेकिन वह अपेक्षित विस्तार नहीं पा सकी। इससे ब्रह्माजी को अत्यंत दुःख हुआ। उसी समय आकाशवाणी हुई, ब्रह्मन्! अब मैथुनी सृष्टि करो। इस आकाशवाणी के बाद ब्रह्माजी ने मैथुनी सृष्टि रचने का निश्चय किया, लेकिन उस समय नारियों की उत्पत्ति न होने के कारण वे अपने उद्देश्य में सफल नहीं हो सके। कथावाचक पं. अमित झा ने बताया कि ब्रह्माजी ने महसूस किया कि परमेश्वर शिव की कृपा के बिना मैथुनी सृष्टि संभव नहीं है। इसलिए उन्होंने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए कठोर तप किया। लंबे समय तक हृदय में प्रेमपूर्वक महेश्वर शिव का ध्यान करने के बाद, ब्रह्माजी के तीव्र तप से प्रसन्न होकर भगवान उमा-महेश्वर ने उन्हें अर्द्धनारीश्वर रूप में दर्शन दिया। शरीर के आधे भाग से उमा देवी को अलग कर दिया महेश्वर शिव ने ब्रह्माजी से कहा, पुत्र ब्रह्मा, तुमने प्रजाओं की वृद्धि हेतु कठिन तप किया है, जिससे मैं अत्यंत प्रसन्न हूं। मैं तुम्हारी इच्छा अवश्य पूरी करूंगा। इसके बाद शिवजी ने अपने शरीर के आधे भाग से उमा देवी को अलग कर दिया। ब्राह्माजी ने कहा कि अब तक वे उचित सृष्टि नहीं कर पाए हैं, इसलिए वे स्त्री-पुरुष के समागम से प्रजाओं का निर्माण करना चाहते हैं। शिवा ने अपनी भौंहों के मध्य भाग से अपनी समान शक्ति प्रकट की। ब्रह्माजी की प्रार्थना के अनुसार यह शक्ति दक्ष की पुत्री के रूप में जन्मी।

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