भरतपुर में मंदिर की जमीन पर दानदाता का बोर्ड लगाने को लेकर 2 गांव के ग्रामीणों का आपस में विवाद हो गया। दोनों गांव आमने-सामने हो गए और एक दूसरे पर जमीन पर कब्जा करने का आरोप लगाने लगे। एक पक्ष का आरोप है कि मंदिर की जमीन बाबा खड़ेश्वरी ने खरीदी है। इस पर दानदाता का बोर्ड नहीं लगना चाहिए। ग्रामीणों ने ही मिलकर मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया है। वहीं दूसरे पक्ष का कहना था कि जमीन 3 भाइयों की है। सामने वाले पक्ष के लोग जमीन पर कब्जा करने के लिए इकट्ठा हुए थे। ऐसे में दोनों गांवों के बीच तनाव की स्थिति हो गई और पुलिस ने दोनों पक्षों को वहां से हटाया। 1 घंटे तनाव की स्थिति के बाद मौके पर शांति है और पुलिस बल तैनात किया गया है। मामला भरतपुर के सेवर थाना इलाके का शनिवार सुबह 11 बजे का है। बोर्ड को लेकर हुआ विवाद दरअसल, घसोला और बरसो के गांव के पास महा सिद्देश्वर श्री आत्मा प्रकाश जी खड़ेश्वरी बाबा का आश्रम और धर्मशाला है। जिस पर आज घसोला गांव के लोगों ने एक बोर्ड लगाया। जिस पर लिखा था ‘दानदाता (भामाशाह) प्रताप सिंह, ग्यासी राम, जगन सिंह’ इस पर बरसो गांव के लोगों ने आपत्ति जताई। कहा- ये जमीन खरीदी हुई है दान में नहीं दी गई। इस पर बोर्ड नहीं लगना चाहिए। इसके बाद दोनों पक्षों के लोग मंदिर के बाहर इकट्ठा हो गए। सीओ ग्रामीण कन्हैया लाल चौधरी ने कहा कि मंदिर में घसोला और बरसो के ग्रामीण पूजा पाठ करते हैं। घसोला गांव के लोगों ने मंदिर पर कोई बोर्ड लगाने का प्रयास किया था। इस बात को लेकर दोनों गांव के लोग आमने सामने हो गए थे। दोनों से समझाइश कर भेज दिया गया है। मंदिर पर बोर्ड दोनों पक्षों की सहमति से लगा था। तस्वीरों में समझें पूरा विवाद… मंदिर की जमीन दान दी गई घसोला निवासी ब्रज विहार ने बताया- 27 जुलाई 1963 को ग्यासी निवासी घसोला गांव और उसके परिजनों ने मंदिर की जमीन दान दी थी। इस जमीन पर बरसो के लोगों का कोई हक नहीं है। इसलिए मंदिर के बोर्ड पर दानदाता का नाम लिखा है। बरसो गांव के लोग जमीन पर कब्जा करना चाहते हैं। बोले- दान नहीं ये खरीदी हुई भूमि बरसो निवासी रमेश ने बताया- बरसो गांव के लोगों ने इस मंदिर का जीर्णोद्धार कर मंदिर बनाया है। अब घसोला के लोग मंदिर पर अपने नाम का बोर्ड लगा रहे हैं। जबकि इस जमीन को किसी ने दान में नहीं दिया है। घसोला के लोग मंदिर की जमीन को दान में दिखाकर मंदिर पर कब्जा करना चाहते हैं। बाबा खड़ेश्वरी ने घसोला के लोगों से जमीन खरीदी थी। इसकी रजिस्ट्री भी है। इस जमीन में कोई दानदाता नहीं है।


