राजस्थान हाईकोर्ट जोधपुर मुख्यपीठ ने भ्रूण लिंग जांच (सेक्स डिटर्मिनेशन) के एक चर्चित मामले में बांसवाड़ा की स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. अनामिका भारद्वाज को राहत दी है। जस्टिस फरजंद अली की एकलपीठ ने सुनवाई करते हुए सेशन न्यायाधीश, बांसवाड़ा द्वारा तय किए गए आरोपों (चार्ज) को निरस्त कर दिया है। हालांकि, अन्य धाराओं में केस जारी रहेगा। कोर्ट ने अपने रिपोर्टेबल जजमेंट में स्पष्ट किया कि रिकॉर्ड में ऐसी कोई सामग्री नहीं है, जिससे यह साबित हो कि डॉक्टर ने गर्भपात कराने की साजिश रची या भ्रूण हत्या की दिशा में कोई ठोस कदम उठाया हो। डिकॉय ऑपरेशन और 20 हजार रुपये की बरामदगी दरअसल, 18 फरवरी 2017 को जयपुर की पीसीपीएनडीटी ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन में एफआईआर दर्ज की गई थी। आरोप था कि डॉ. अनामिका अपने सेंटर पर एजेंट अनिला के माध्यम से अवैध भ्रूण लिंग जांच कर रही है। इसी आधार पर 17 फरवरी 2017 को एक डिकॉय ऑपरेशन किया गया। जिसमें टीम ने गर्भवती महिला के रूप में जांच करवाई और बाद में छापे के दौरान डॉ. अनामिका से 19 हजार रुपये और सह-आरोपी अनिला से 1 हजार रुपये बरामद किए गए। कार्रवाई के दौरान अनिला की मृत्यु हो जाने पर उसके खिलाफ केस समाप्त हो गया। दूसरी बार हाईकोर्ट पहुंचने पर मिली बड़ी राहत पहला दौर (मई 2023 – दिसंबर 2023): सेशन कोर्ट, बांसवाड़ा ने 8 मई 2023 को पहली बार पीसीपीएनडीटी एक्ट के साथ आईपीसी की धारा 315/511 और 120-B के तहत आरोप तय किए थे। डॉक्टर भारद्वाज ने इसे हाईकोर्ट में चुनौती दी। 14 दिसंबर 2023 को हाईकोर्ट ने निर्देश दिया कि ट्रायल कोर्ट ‘मैकेनिकल’ आदेश के बजाय आरोप तय करते समय अपना तर्क और आधार स्पष्ट लिखते हुए दोबारा विचार करे। हाईकोर्ट के स्पष्ट निर्देश के बावजूद सेशन कोर्ट ने 20 जनवरी 2024 को फिर से लगभग वैसा ही संक्षिप्त आदेश पारित कर दिया और पुराने आरोपों को दोहरा दिया। ट्रायल कोर्ट ने यह स्पष्ट नहीं किया कि ‘लिंग जांच’ की तैयारी को ‘गर्भपात के प्रयास’ का साक्ष्य क्यों माना जा रहा है। दूसरा दौर और ताजा फैसला (जनवरी 2026): ट्रायल कोर्ट के आदेश के खिलाफ डॉ. अनामिका ने दोबारा हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। याचिकाकर्ता की दलील: लिंग जांच का अर्थ ‘अबॉर्शन की मंशा’ नहीं डॉ. अनामिका की ओर से वकील ने तर्क दिया कि केवल लिंग जांच की तैयारी या पैसे लेना, अपने-आप में आईपीसी की धारा 315 (बच्चे के जन्म को रोकने की नीयत से किया गया कार्य) को आकर्षित नहीं करता। उन्होंने दलील दी कि रिकॉर्ड में ऐसी कोई बात नहीं है कि डॉक्टर ने भ्रूण के जन्म को रोकने या उसे मारने की नीयत से कोई मेडिकल प्रक्रिया शुरू की हो। बचाव पक्ष ने यह भी कहा कि चार्ज ऑर्डर पूरी तरह “मैकेनिकल” है और इसमें न्यायिक विवेक का अभाव है। हाईकोर्ट की टिप्पणी: ट्रायल कोर्ट अभियोजन का ‘माउथपीस’ नहीं है जस्टिस फरजंद अली ने अपने फैसले में कहा कि चार्ज तय करते समय कोर्ट सिर्फ औपचारिक भूमिका नहीं निभा सकता। कोर्ट ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा- ट्रायल कोर्ट को ‘पोस्ट ऑफिस या अभियोजन का माउथपीस’ नहीं बनना चाहिए। यदि उपलब्ध सामग्री केवल मामूली संदेह पैदा करती है तो आरोपी को डिस्चार्ज करना अदालत की जिम्मेदारी है। कोर्ट ने कहा- लिंग जांच के लिए हामी भरने मात्र से यह मान लेना कि गर्भपात की तैयारी थी, एक ‘तथ्यों से परे का अनुमान’ है। साजिश और प्रयास के आरोप क्यों रद हुए? भ्रूण हत्या का प्रयास: कोर्ट ने पाया कि न तो किसी प्रकार के गर्भपात के औजार मिले और न ही अबॉर्शन की कोई प्रक्रिया शुरू होने का प्रमाण मिला। केवल लिंग जांच की तत्परता को ‘अपराध का प्रयास’ नहीं माना जा सकता। कोर्ट के अनुसार, महज एजेंट के माध्यम से मरीज लाना और फीस लेना यह साबित नहीं करता कि भ्रूण लड़की निकलने पर उसे समाप्त करने का कोई ‘ठोस समझौता’ हुआ था। नतीजा: पीसीपीएनडीटी केस जारी रहेगा, शेष आरोप रद्द हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि निचली अदालत का आदेश ‘मैकेनिकल एक्सरसाइज’ था। इसमें यह स्पष्ट नहीं था कि कौन-सा साक्ष्य इन धाराओं को साबित करता है। अदालत ने पुनरीक्षण याचिका आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए आईपीसी की धारा 315/511 और 120-B के तहत लगे आरोप रद्द कर दिए हैं। हाईकोर्ट ने मामला वापस ट्रायल कोर्ट को भेजते हुए निर्देश दिया गया है कि वह उपलब्ध सामग्री के आलोक में दोबारा विधि सम्मत आदेश पारित करे। हालांकि, पीसीपीएनडीटी एक्ट के तहत अन्य आरोपों पर सुनवाई स्वतंत्र रूप से जारी रहेगी।


