भास्कर न्यूज | गिरिडीह जिले के विभिन्न क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर आम की बागवानी की जाती है। मंजर आने का मौसम शुरू होते ही आम के पेड़ों में कई प्रकार के रोगों का प्रकोप बढ़ने लगता है। प्रमुख रोगों में एन्थ्रेक्नोज (पर्ण एवं फल झुलसा), बौर का गुच्छा रोग (विकृति रोग), चूर्णिल आसिता, डाइबैक (टहनी सूखना) तथा काली नोक रोग शामिल हैं। एन्थ्रेक्नोज रोग में पत्तियों, टहनियों और फलों पर काले-भूरे धब्बे दिखाई देते हैं, जिससे फल सड़ने लगते हैं। बौर का गुच्छा रोग होने पर बौर और टहनियों की असामान्य वृद्धि हो जाती है और बौर गुच्छेदार हो जाते हैं। चूर्णिल आसिता में बौर पर सफेद चूर्ण जैसी परत जम जाती है, जिससे बौर झड़ जाते हैं। डाइबैक रोग में टहनियां ऊपर से नीचे की ओर सूखने लगती हैं, जबकि काली नोक रोग ईंट-भट्टों के धुएं के कारण फलों के सिरे काले पड़ने से होता है। विशेषज्ञों ने किसानों को समय रहते बचाव के उपाय अपनाने की सलाह दी है। बौर आने से पहले कार्बेन्डाजिम (एक ग्राम प्रति लीटर पानी) या कॉपर ऑक्सीक्लोराइड का छिड़काव करना लाभकारी है। बौर आने पर एजोक्सीस्ट्रोबिन 18.2 प्रतिशत तथा डिफेनोकोनाजोल 11.4 प्रतिशत एससी (एक मिलीलीटर प्रति लीटर पानी) का प्रयोग प्रभावी माना गया है। कृषि वैज्ञानिक मधुकर कुमार ने बताया कि रोगग्रस्त टहनियों की छंटाई कर उन्हें जला देना चाहिए तथा गिरे हुए पत्तों और फलों को हटाकर बाग की स्वच्छता बनाए रखनी चाहिए। उन्होंने संतुलित पोषण और उचित सिंचाई प्रबंधन पर जोर देते हुए कहा कि पोटाश की कमी होने पर पांच प्रतिशत पोटेशियम सल्फेट का छिड़काव करें तथा जलभराव से बचें। समय पर पहचान और उपचार से आम की फसल को बड़े नुकसान से बचाया जा सकता है। आप खेती-किसानी से जुड़े किस विषय पर जानकारी चाहते हैं, वॉट्सएप नंबर 7 004690495 पर सिर्फ मैसेज करें।


