मध्यप्रदेश में पिछले आठ वर्षों में शिशु मृत्यु दर (IMR) में 20 से 25 प्रतिशत तक की कमी आई है, जो एक सकारात्मक संकेत है। हालांकि, इसमें सबसे अधिक मौतें नवजात अंडरवेट (एक माह तक के) बच्चों की हो रही हैं, जो चिंता का विषय है। इसके बावजूद, मध्यप्रदेश देश में शिशु मृत्यु दर के मामले में पहले स्थान पर है, जो गंभीर समस्या को दर्शाता है। यह जानकारी नेशनल फैमिली सर्वे (NFS) की 2015-16 और 2020-21 की रिपोर्ट्स से मिली है। हाल ही में डॉ. मोहन यादव के एक साल के कार्यकाल पूरा होने पर मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने बयान दिया था कि मप्र की शिशु मृत्यु दर में पिछले 20 सालों से कोई खास कमी नहीं आई है। उनके अनुसार, उमा भारती के मुख्यमंत्री कार्यकाल (2003-04) के बाद से आंकड़े लगभग समान हैं। ‘दैनिक भास्कर’ ने मप्र की शिशु मृत्यु दर पर स्थिति का विश्लेषण किया और पाया कि शिशु मृत्यु दर में कमी आई है, लेकिन नवजात अंडर वेट बच्चों की मौत का आंकड़ा बढ़ा हुआ है। सुधार की आवश्यकता नेशनल फैमिली सर्वे (NFS) के मुताबिक, शिशु मृत्यु दर को तीन श्रेणियों में बांटा गया है: देशभर में शिशु मृत्यु दर पर हर पांच साल में सर्वे किया जाता है, जिसमें सरकार के प्रतिनिधि, एनजीओ, यूनिसेफ और डब्ल्युएचओ की सहभागिता होती है। ये सभी एजेंसियां डाटा तैयार करती हैं। शिशु मृत्यु दर में कमी NFS की 2012-2016 की रिपोर्ट के अनुसार, 2015-16 में देश में 1,000 बच्चों में से 50 बच्चों की मौत होती थी, जो अब घटकर 40 हो गई है। यह आंकड़ा पांच वर्ष तक के बच्चों का है। इसी तरह, 1 वर्ष तक के बच्चों की मृत्यु दर 41 से घटकर 35 हो गई है, और एक माह तक के बच्चों की मृत्यु दर 30 से घटकर 25 हो गई है। हालांकि शिशु मृत्यु दर में सुधार देखा गया है, लेकिन यह आंकड़ा अभी भी चिंताजनक है और सुधार की आवश्यकता है। सुधार की गति धीमी 2020-2021 की रिपोर्ट के अनुसार, मध्य प्रदेश में शिशु मृत्यु दर कम हुई है, लेकिन इसमें सुधार की गति उतनी तेज नहीं है जितनी होनी चाहिए थी। पिछले सात सालों में इसमें 20 से 26% की कमी आई है। हालांकि मृत्यु दर में कमी आई है, लेकिन इसकी गति अभी भी चिंता का विषय बनी हुई है।
ये हैं मौत के कारण
डॉ. वीपी गोस्वामी (नेशनल नियोटोलॉजी फोरम के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष) के मुताबिक तीन कैटेगरी की कुल मौत से से 80% न्यू बोर्न बेबी की मौतें होती है। इसमें से भी इसमें से भी 30 से 40% बच्चे प्रीमैच्योर या अंडरवेट होते हैं। इसका कारण उनका अंडर वेट और कमजोर होना होता है। इसके अलावा तापमान कम होना, इन्फेक्शन, हाइपोग्लाइसीमिया (खून में ग्लूकोज की कमी) के कारण होती है। मृत्यु दर कम करने के प्रयास डॉ. गोस्वामी के अनुसार, मध्य प्रदेश सरकार ने शिशु मृत्यु दर को कम करने के लिए इसे प्राथमिकता दी है, लेकिन अभी और प्रयासों की आवश्यकता है। इस दिशा में सरकार, समुदाय और डॉक्टरों द्वारा मिलकर काम किया जा रहा है। सरकार द्वारा स्वास्थ्य कर्मियों को स्किल-आधारित ट्रेनिंग दी जा रही है, जिससे यह समस्या और कम की जा सकती है। देश में 2030 तक नवजात शिशु मृत्यु दर को प्रति हजार 12 तक लाने का लक्ष्य रखा गया है। ऐसे ही 5 वर्ष तक की उम्र के बच्चों की मृत्यु दर 18 तक लाने का लक्ष्य है। इसके लिए इंडियन एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स, नेशनल नियोनेटोलॉजी फोरम, अन्य एनजीओ, यूनिसेफ, WHO आदि द्वारा स्किल ट्रेनिंग कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। डिप्टी सीएम राजेंद्र शुक्ला के मुताबिक, ब्लॉक स्तर पर स्वास्थ्य की स्थिति को सुधारने के लिए अस्पतालों में सुधार किए जा रहे हैं। एनआईसीयू में मां की भूमिका डॉ. सुषमा नांगिया (नेशनल नियोनेटोलॉजी फोरम की प्रेसिडेंट) के अनुसार, नवजात शिशु के इलाज में एनआईसीयू (नियोनेटल इंटेंसिव केयर यूनिट) में मां की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है। उनका कहना है कि यहां 50% काम डॉक्टर और नर्सिंग स्टाफ का होता है, जबकि बाकी 50% काम मां का होता है। अगर मां को इलाज में शामिल किया जाए, तो अंडरवेट बच्चों की रिकवरी तेज होती है, क्योंकि मां की कंगारू केयर से बच्चों को काफी फायदा होता है। अब दोनों सरकारी और प्राइवेट एनआईसीयू में मां को अंदर जाने की अनुमति दी जा रही है। हाल ही में, फोरम ने डब्ल्यूएचओ के साथ मिलकर सिक और स्मॉल बेबी एनआईसीयू के लिए एक गाइडलाइन भी बनाई है। नवजात मृत्यु दर में बदलाव मध्य प्रदेश में नवजात शिशु मृत्यु दर अन्य राज्यों की तुलना में ज्यादा है। इसे कम करने के लिए कई बदलाव किए जा रहे हैं। 20 साल पहले जब नवजात बच्चा सांस नहीं लेता था, तो उसे तुरंत ऑक्सीजन दी जाती थी। अब, नई तकनीक और उपचार के तरीकों के कारण, ऐसे बच्चों को रूम एयर में रखकर ही बचाया जा सकता है। विशेषज्ञों के मुताबिक, मां का दूध बच्चों के लिए सबसे बेहतरीन है, और यदि बच्चा मां के संपर्क में रहता है, तो मां का दूध बढ़ने की संभावना होती है।


