मंदिर और तीर्थ क्षेत्र में अंतर

अजीत सिंह चौधरी | बांसवाड़ा जैन समाज का सबसे बड़ा और संभाग का पहला ह्रींमकार तीर्थ क्षेत्र बांसवाड़ा में बन रहा है। धार्मिक पर्यटन को ध्यान में रखते हुए इस तीर्थ क्षेत्र का विकास भव्यता और सुविधा सम्पन्नता के साथ किया जाएगा। यह तीर्थ क्षेत्र उदयपुर रोड पर टिंबा गामड़ी के पास बन रहा है। इसमें एक ही पत्थर से बने ह्रीं में 24 तीर्थंकरों की प्रतिमाएं बनाईं जाएंगी। फिलहाल 10 बीघा परिसर में लगभग 500 छोटे-बड़े मंदिर बनेंगे, जिनमें 9-9 इंच की मूर्तियां स्थापित की जाएंगी। इन मूर्तियों को अलग-अलग रत्नों, पत्थरों और धातुओं से बनवाया है। प्राण प्रतिष्ठा महोत्सव 19 फरवरी से शुरू होगा, जो 24 फरवरी तक चलेगा। सात दिवसीय यह कार्यक्रम बाहुबली कॉलोनी स्थित संत भवन के पास होगा। इसमें देशभर से हजारों श्रद्धालुओं के साथ 30 जैन संत-साध्वियां शामिल होंगे। दिगंबर जैन मंदिर का निर्माण वात्सल्य सेवार्थ फाउंडेशन, आर्यिका विकाम्याश्री के सानिध्य और साध्वी विगुंजनश्री के मार्गदर्शन में किया जा रहा है। पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव में मुनि आदित्य सागर, मुनि अप्रतिम सागर, मुनि सहज सागर, आर्यिका सम्मेद शिखर, आर्यिका विशिष्टश्री ससंघ 10 पिच्छी, आर्यिका विविक्तश्री ससंघ 4 पिच्छी, आर्यिका विश्वासश्री 2 पिच्छी, आर्यिका विकुंदनश्री और आर्यिका सिद्धश्री 3 पिच्छी भी शामिल होंगे। लोग एक साथ पांडाल में बैठ सकेंगे फीट ऊंचा बना रहे हैं मंच झूमर लगाए गए हैं पांडाल में जैन संत-साध्वियां शामिल होंगे। प्राण प्रतिष्ठा महोत्सव 19 फरवरी से शुरू होगा, जो 24 फरवरी तक चलेगा। {19-20 फरवरी : गर्भ कल्याणक, घटयात्रा, भूमि शुद्धि, मंडप उद्घाटन, श्रीजी स्थापना। { 21 फरवरी : जन्मकल्याणक, 1008 कलशों से बाल तीर्थंकर का जन्माभिषेक। { 22 फरवरी : तप कल्याणक, राज्याभिषेक, वैराग्य दर्शन और दीक्षा विधि संस्कार। { 23 फरवरी : केवल्यज्ञान कल्याणक, वेदी व शिखर शुद्धि विधान, केवल्यज्ञान संस्कार। { 24 फरवरी : मोक्ष कल्याणक, अग्निदेव संस्कार, विश्व शांति यज्ञ एवं पूर्णाहुति। { 25 फरवरी : वेदी प्रतिष्ठा, शोभायात्रा, शिखर कलश व ध्वज दंडारोहण होगा। मुनि आदित्य सागर ने बताया कि मंदिर में भगवान की उपासना होती है। जबकि तीर्थ क्षेत्र में सेवा, समर्पण और सहायता का भाव रहता है। पहले प्रत्येक 5-10 किलोमीटर की परिधि में तीर्थ क्षेत्र हुआ करता था, जहां साधु-संतों का आगमन होता रहता था। यहां उनकी सेवा और सहायता की जाती थी।

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