पंजाब में भूजल स्तर को बचाने के लिए सरकार पिछले 15 सालों से मक्के की खेती को बढ़ावा देने के दावे तो कर रही है, लेकिन जब फसल खरीद की बारी आती है, तो केंद्र की एजेंसियों से मिलकर काम का प्रयास नहीं होता। ताजा मामला को-ऑपरेटिव विभाग का है, जहां केंद्र सरकार की एजेंसी नेशनल कोआर्पेटिव कंज्युमर फेडरेशन ऑफ इंडिया (एनसीसीएफ) की ओर से मक्का खरीदने की सहमति के बावजूद पंजाब की स्टेट एजेंसी मार्कफेड ने जिम्मेदारी लेने से इनकार कर दिया। मार्कफेड ने करीब चार दिन से एक सप्ताह तक होने वाले खर्च की जिम्मेदारी लेने से इनकार दिया जबकि एनसीसीएफ के पास कुल फसल का 30 फीसदी तक किसी भी राज्य से खरीदने का अधिकार रहता है। जहां पंजाब हिचकिचा रहा है, वहीं पड़ोसी राज्य हरियाणा मिसाल पेश कर रहा है। हरियाणा पिछले दो सालों से एनसीसीएफ के जरिए सूरजमुखी व सरसों की खरीद कर रहा है। इसके बदले में हरियाणा को केंद्र से 2% कमीशन के रूप में लगभग 20 करोड़ रुपए का लाभ मिला है। खास बात यह है कि इस खरीद में स्टाफ और ऑब्जर्वर से लेकर तमाम खर्च और जिम्मेदारी केंद्रीय एजेंसी एनसीसीएफ की रहती है। दो दिन पहले एक बार फिर केंद्रीय एजेंसी ने एग्रीकल्चर डिपार्टमेंट के अधिकारियों से मक्का व सरसों की खरीद को लेकर मीटिंग की है और उन्हें इसकी संभावना तलाशने को कहा है। पंजाब में पठानकोट, संगरूर, बठिंडा, जालंधर, कपूरथला और गुरदासपुर में मक्की का सबसे ज्यादा एरिया है। फसल के क्वालिटी स्टैंडर्ड को लेकर नहीं बनी बात: एमडी विभाग से प्राप्त जानकारी के अनुसार केंद्र सरकार की प्राइस सपोर्ट स्कीम (पीएसएस) के तहत एनसीसीएफ के साथ मक्का खरीद हो लेकर मीटिंग हुई थी और इस बारे में लंबी डिसकशन हुईं थी। केंद्र की योजना के अनुसार प्रति किसान एक दिन में 25 क्विंटल तक ही खरीद हो सकती है। मार्कफेड द्वारा मक्की खरीद ना करने का बड़ा कारण केंद्र सरकार की मक्की की फसल के क्वालिटी स्टैंडर्ड को लेकर थी। -गिरीश दयालन, एमडी, मार्कफेड मीटिंग के बावजूद मार्कफेड खरीद में पैसा नहीं लगा रहा हमारी तीन बार इस बारे में मीटिंग हुई है लेकिन मार्कफेड खरीद में पैसा नहीं लगाना चाह रहा था। हमारी पॉलिसी है और हम पड़ोसी राज्यों में खरीद कर रहे हैं तो पंजाब से क्यों नहीं। अब एक बार फिर एग्रीकल्चरल डिपार्टमेंट से भी हमने कहा कि वह इस बारे में संभावनाएं तलाशें। -रेखा मिश्रा, रीजनल मैनेजर, एनसीसीएफ पंजाब में विकेंद्रीयकरण की जरूरत के बावजूद खरीद न होना शर्मनाक जब केंद्र सरकार की पॉलिसी के अनुसार खरीद हो सकती है और पंजाब में विकेंद्रीयकरण की बेहद जरूरत है तो इस दिशा में काम न होना शर्मनाक स्थिति है। इस साल मक्की का रेट भी काफी डाउन है इसलिए इस बार स्टेट एजेंसीज को इस दिशा में कोशिश करनी चाहिए ताकि किसानों का नुकसान न हो। इसमें स्टेट एजेंसीज को भी तो आर्थिक लाभ होना है। -हरमीत सिंह कादियां, भारतीय किसान यूनियन बीते साल मक्की का करीब 95 हजार एकड़ रकबा रहा। इसमें से ज्यादातर मक्की डिजिटलरी को देने की योजना था। इस बीच एनसीसीएफ से भी बात की गई कि यदि किसी वजह से खरीद नहीं होती है तो किसानों का नुकसान न हो। एनसीसीएफ ने इसे सहर्ष स्वीकार किया और कहा कि पंजाब इस बारे में प्रोसेस शुरू करे। वह हरियाणा से हर साल सरसों की खरीद कर रहे हैं और मक्का भी खरीदा जा सकता है। वह न सिर्फ उपभोक्ता मंत्रालय को विभिन्न राज्यों के लिए खरीद करके देते हैं बल्कि खरीद के बाद ओपन मार्केट में बेचने व एक्सपोर्ट का काम भी रहता है। इस बारे में तीन मीटिंग हुईं। एनसीसीएफ या केंद्रीय एजेंसियां स्टेट एजेंसी के साथ मिल कर ही खरीद करती हैं। किसानों से खरीद के बाद 48 घंटे में पैसा देना होता है और केंद्र से ये रकम स्टेट एजेंसी को चार से लेकर सात दिन के अंदर मिल जाती है। इस पूरे प्रक्रिया का खर्च केंद्रीय एजेंसी ही वहन करती है। खरीद में सहयोग के लिए स्टेट एजेंसी को दो फीसदी कमीशन मिलता है। जैसे कि हरियाणा की एजेंसीज को सरसों के लिए 19 करोड़ रुपए से अधिक और सूरजमुखी के लिए 64 लाख रूपए से अधिक की रकम कमीशन के तौर पर मिली।


