मशरूम उत्पादन ने जुड़े 45 परिवार,सुधर रही आर्थिक स्थिति

भास्कर न्यूज|​गुमला जिले का एक मात्र आकांक्षी प्रखंड डुमरी का सुदूरवर्ती औरापाट गांव आज विकास की एक नई इबारत लिख रहा है। कभी सीमित संसाधनों और अनिश्चित आय के चक्रव्यूह में फंसे विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह (पीवीटीजी) के परिवारों के जीवन में अब मशरूम आजीविका परियोजना खुशहाली की महक लेकर आई है। जिला प्रशासन की इस पहल से न केवल ग्रामीणों की आर्थिक स्थिति सुधर रही है, बल्कि औरापाट एक मॉडल विलेज के रूप में उभर रहा है। औरापाट मशरूम आजीविका परियोजना अब अपने साकार रूप में दिखने लगी है। परियोजना के तहत जिन परिवारों को मशरूम किट व प्रशिक्षण दिया गया था। उनकी इकाइयों में अब ऑयस्टर मशरूम का फलन शुरू हो चुका है। सफेद धवल मशरूम की पैदावार देखकर ग्रामीणों के चेहरों पर आत्मविश्वास और मुस्कान साफ देखी जा सकती है। औरापाट गांव के 45 पीवीटीजी परिवारों को मशरूम किट वितरित कर उन्हें व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया गया। ​प्रशिक्षण का उद्देश्य ग्रामीणों को यह समझाना कि कम लागत, न्यूनतम पानी और सीमित स्थान में भी मशरूम की खेती कर सम्मानजनक आय प्राप्त की जा सकती है। ​परियोजना का क्रियान्वयन जिला योजना शाखा द्वारा एपीपी एग्रीगेट, खूंटी के तकनीकी सहयोग से किया जा रहा है। एक वर्षीय इस योजना की सबसे बड़ी विशेषता इसकी बाय-बैक पॉलिसी है। क्षमता निर्माण कर रही एजेंसी किसानों द्वारा उत्पादित मशरूम को सीधे खरीद लेगी। इससे सुदूर क्षेत्र में रहने वाले इन किसानों को बाजार खोजने की चिंता नहीं रहेगी और उन्हें उपज का सुनिश्चित मूल्य प्राप्त होगा। ​प्रशासन की योजना केवल उत्पादन तक सीमित नहीं है, बल्कि भविष्य के लिए एक पूरा ईको-सिस्टम तैयार किया जा रहा है: ​प्रोसेसिंग यूनिट: गांव में जल्द ही मशरूम प्रोसेसिंग यूनिट स्थापित की जाएगी। ​मूल्य संवर्धन: मशरूम से पाउडर, चिप्स, बड़ी और पापड़ जैसे उत्पाद तैयार किए जाएंगे। ​ब्रांडिंग: स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से उत्पादों की पैकेजिंग और ब्रांडिंग की जाएगी। ​मशरूम मार्ट : जिला मुख्यालय में एक समर्पित मशरूम मार्ट स्थापित करने की योजना है, ताकि इन उत्पादों को शहरी बाजार से सीधे जोड़ा जा सके। ​विशेषज्ञों का मानना है कि औरापाट का यह मॉडल अन्य प्रखंडों के लिए भी प्रेरणा बनेगा। एक्सपोजर विजिट के माध्यम से अन्य ग्रामीणों को भी इस सफलता से रूबरू कराया जाएगा। डीसी की इस पहल ने यह साबित कर दिया है कि यदि सही प्रशिक्षण और बाजार का साथ मिले, तो समाज के अंतिम पायदान पर खड़ा व्यक्ति भी उद्यमी बन सकता है।

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