प्रखंड मुख्यालय से कुछ ही दूरी पर स्थित लोगा गांव आज भी एक ऐतिहासिक पहेली और अटूट आस्था का केंद्र बना हुआ है। यहां भगवान शंकर का एक विशाल मंदिर स्थित है, जिसके बारे में कहा जाता है कि इसका निर्माण लगभग 500 वर्ष पूर्व जगन्नाथ पुरी के मंदिर की तर्ज पर किया गया था। अपनी अद्भुत वास्तुकला और प्राचीनता के कारण यह मंदिर पूरे बसिया अनुमंडल में चर्चा का विषय रहता है। इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता इसके मुख्य द्वार पर खुदी हुई प्राचीन लिपि है। ताज्जुब की बात यह है कि आज के आधुनिक दौर में भी इस लिपि को पढ़ने में कोई सक्षम नहीं हो सका है। यहाँ तक कि गांव के सबसे बुजुर्ग व्यक्ति भी यह बताने में असमर्थ हैं कि यह मंदिर कब और किसके द्वारा बनवाया गया था। कुछ ग्रामीणों का अनुमान है कि इसे तत्कालीन जमींदार परिवार ने बनवाया होगा, लेकिन स्वयं जमींदार वंशज भी इस पर कोई स्पष्ट जानकारी नहीं दे पा रहे हैं।
सनातन संस्कृति का संरक्षण : स्थानीय निवासी सतीश साहू का कहना है कि यह मंदिर सनातनियों की धरोहर है जिसे ग्रामीणों ने बड़े जतन से संभाल कर रखा है। उनके अनुसार हमारे पूर्वजों के पास भी इसके निर्माण से जुड़ी कोई ठोस जानकारी नहीं थी। मंदिर के पत्थरों और लिपि से इसकी प्राचीनता स्पष्ट होती है। पूर्व विधानसभा अध्यक्ष डॉ. दिनेश उराँव द्वारा मंदिर परिसर में एक सामुदायिक भवन भी बनवाया गया है, जिससे यहाँ आने वाले श्रद्धालुओं को सुविधा होती है। मान्यता है कि यहाँ जो भी भक्त सच्चे मन से अपनी मुराद लेकर आता है, उसे मनचाहा फल प्राप्त होता है। प्रत्येक वर्ष महाशिवरात्रि के अवसर पर यहां विशेष पूजा-अर्चना और भव्य भंडारे का आयोजन किया जाता है। उस समय न केवल लोगा गांव, बल्कि दूर-दराज के इलाकों से भी हजारों की संख्या में श्रद्धालु यहां मत्था टेकने पहुंचते हैं। पुरातत्व विभाग और सरकार की अनदेखी के बावजूद, ग्रामीणों ने इस धरोहर को जीवित रखा है। यदि इस प्राचीन लिपि और मंदिर के इतिहास पर शोध किया जाए, तो बसिया के इतिहास के कई नए पन्ने खुल सकते हैं।


