महाशिवरात्रि पर देश की पहली किन्नर शंकराचार्य का पट्टाभिषेक:सम्मेलन में 4 जगद्गुरु और 5 महामंडलेश्वरों की घोषणा; भोपाल में 60 धर्मांतरित किन्नरों की घर वापसी

महाशिवरात्रि के अवसर पर रविवार को राजधानी भोपाल में किन्नर धर्म सम्मेलन आयोजित हुआ। आयोजन में देश की पहली किन्नर शंकराचार्य के रूप में हिमांगी सखी का पट्टाभिषेक किया गया। आयोजकों के अनुसार राजस्थान के पुष्कर पीठ का चयन देश की पहली किन्नर शंकराचार्य पीठ के रूप में किया गया है। कार्यक्रम में किन्नर अखाड़े के संस्थापक ऋषि अजय दास की उपस्थिति में वैदिक मंत्रोच्चार के बीच यह घोषणा की गई। आयोजन के दौरान बड़ी संख्या में किन्नर समुदाय के प्रतिनिधि, संत-महात्मा और विभिन्न राज्यों से आए अनुयायी मौजूद रहे। 60 धर्मांतरित किन्नरों की ‘घर वापसी’ का दावा आयोजकों ने सम्मेलन के दौरान धर्म परिवर्तन कर चुके 60 किन्नरों की ‘घर वापसी’ कराए जाने का भी दावा किया। मंच से कहा गया कि मुस्लिम बने कुछ किन्नरों ने शुद्धिकरण की प्रक्रिया के साथ पुनः हिंदू धर्म स्वीकार किया। हालांकि प्रशासनिक स्तर पर इस दावे की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है। देखिए तस्वीरें… 4 जगद्गुरु और 5 महामंडलेश्वर घोषित सम्मेलन में किन्नर परंपरा के अंतर्गत 4 जगद्गुरुओं और 5 महामंडलेश्वरों की घोषणा भी की गई। किन्नर शंकराचार्य का का पुष्कर पीठ होगा देश की पहली किन्नर शंकराचार्य हिमांगी सखी मां वैष्णो किन्नर अखाड़ा की प्रमुख हैं और किन्नर समाज की धार्मिक नेतृत्वकर्ता के रूप में जानी जाती हैं। वे पहली किन्नर भागवत कथा वाचक भी हैं। मूल रूप से मुंबई से संबंध रखने वाली हिमांगी सखी मां का वर्तमान पीठ पुष्कर होगा। वे इसके पहले महामंडलेश्वर और जगतगुरु के पद पर भी रह चुकी हैं। इसके पश्चात उन्हें शंकराचार्य की उपाधि प्रदान की गई, वे देश की पहली किन्नर शंकराचार्य बनीं। कार्यक्रम में घोषित जगद्गुरु कार्यक्रम में घोषित महामंडलेश्वर ये था विवाद गौरतलब है कि हाल के दिनों में भोपाल में किन्नर समुदाय के भीतर धर्म परिवर्तन और गद्दी विवाद को लेकर आरोप-प्रत्यारोप का दौर चला है। इसी क्रम में महाशिवरात्रि पर आयोजित इस सम्मेलन और पट्टाभिषेक को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। ‘किन्नर समाज के लिए टीम गठित होगी’ पट्टाभिषेक समारोह के बाद देश की पहली किन्नर शंकराचार्य घोषित की गई हिमांगी सखी ने कहा, “जो सनातन धर्म को नहीं अपनाता, उसके लिए पाकिस्तान बना है… वे वहां जा सकते हैं।” उनके इस बयान के बाद कार्यक्रम राजनीतिक और धार्मिक रूप से चर्चा में आ गया है। किन्नर वैष्णव अखाड़ा की ओर से आयोजित समारोह में हिमांगी सखी को शंकराचार्य पद पर अभिषिक्त किया गया। उन्होंने कहा कि शंकराचार्य होने के नाते वे एक टीम गठित करेंगी, जो देशभर में किन्नर समाज से जुड़े सही-गलत मामलों की जानकारी देगी। “पुष्कर पहली पीठ, देशभर में होंगी और स्थापना”
हिमांगी सखी ने कहा, “अभी प्रथम पीठ पुष्कर पीठ है। इसके बाद देश के अलग-अलग स्थानों पर पीठ स्थापित की जाएंगी। जो भी हमारे पद पर आपत्ति जताता है, वह शास्त्रार्थ के लिए हमारे पास आ सकता है।” उन्होंने कहा कि किन्नर समाज को संगठित कर सनातन परंपरा के तहत संरक्षित करना उनका दायित्व है। कार्यक्रम में सुरैया को भी आने का न्योता दिए जाने का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि वे उपस्थित नहीं हुईं। “हम विचार-विमर्श के लिए तैयार हैं। यदि वे घर वापसी करती हैं तो उनका भी स्वागत है। स्वयं किन्नर शंकराचार्य उनका तिलक और पट्टाभिषेक करेगी। हिमांगी सखी ने कहा, “सनातन ही धर्म है, बाकी सब पंथ हैं। धर्म की छत के नीचे सबको आना चाहिए। जो नहीं आते, उनके लिए दुनिया खुली है।” उन्होंने पाकिस्तान के गठन का संदर्भ देते हुए कहा कि जो सनातन को स्वीकार नहीं करते, वे वहां जा सकते हैं। उन्होंने अपने वक्तव्य के अंत में वैदिक श्लोकों का उच्चारण करते हुए कहा कि यह संदेश उन लोगों के लिए है जो किन्नर शंकराचार्य पद पर आपत्ति जता रहे हैं। धार्मिक विद्वान की आपत्ति, पांचवां पीठ हो ही नहीं सकता गौरतलब है कि सनातन परंपरा में आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित चार मूल पीठ—उत्तर में ज्योतिर्मठ (उत्तराखंड), दक्षिण में श्रृंगेरी शारदा पीठ (कर्नाटक), पूर्व में गोवर्धन मठ (ओडिशा) और पश्चिम में द्वारका शारदा पीठ (गुजरात)—का ही उल्लेख मिलता है। भोपाल में घोषित पहली किन्नर शंकराचार्य पीठ को लेकर ज्योतिष मठ संस्थान, भोपाल के पंडित विनोद गौतम ने स्पष्ट आपत्ति दर्ज की है। उन्होंने कहा, सबसे पहले तो पांचवा पीठ हो ही नहीं सकता। चार पीठ की ही व्यवस्थाएं हमारे संविधान ने दी हैं। जो मठ का संविधान होता है, उसके अनुसार चार पीठ का ही शंकराचार्य हो सकते हैं। पांचवा शंकराचार्य स्वीकार नहीं है। अखाड़ा व्यवस्था पर उन्होंने कहा, जहां तक अखाड़े का सवाल है, तो किन्नर अखाड़ा 13वें अखाड़े में शामिल है। 13 अखाड़ों के अंतर्गत उप-अखाड़ा किन्नर अखाड़े को बनाया गया है। बाकी हमारे अखाड़े तो 13 ही रहेंगे। 14 अखाड़े का कोई प्रश्न ही नहीं उठता है। जब अखाड़े में ही नहीं लिया गया है इनको, तो शंकराचार्य कैसे मान्य करेंगे उसके किसी भी व्यक्ति को? वो शंकराचार्य हो ही नहीं सकते हैं।” ‘अनावश्यक रेवड़ी की तरह शंकराचार्य का पद बांटना’ पंडित गौतम ने कहा, “ये अनावश्यक रेवड़ी की तरह शंकराचार्य का पद बांटना है। पद की गरिमा और प्रतिष्ठा के साथ खिलवाड़ है। सोची-समझी साजिश है नए-नए शंकराचार्य पैदा करना, ताकि शंकराचार्य के पद को कमजोर किया जा सके। इससे शंकराचार्य की प्रतिष्ठा कम होती है। शंकराचार्य पद की योग्यता पर पंडित गौतम ने कहा, शंकराचार्य के लिए वेद-वेदांत का ज्ञानी होना चाहिए। काल-संध्या होना चाहिए। ब्राह्मण होना चाहिए। अंग-भंग वाला व्यक्ति शंकराचार्य नहीं बन सकता है। लंगड़ा, लूला, काना, किन्नर—ये शंकराचार्य की श्रेणी में कभी नहीं बन सकते हैं। ना ही ये दंडी बन सकते हैं। उन्होंने दंडी परंपरा स्पष्ट करते हुए कहा, जब कोई शंकराचार्य का प्रत्याशी होता है, तो पहले दंड धारण करता है। दंड धारण करने के बाद ही चारों पीठ के शंकराचार्य मिलकर उसको शंकराचार्य बना सकते हैं। तीन पीठ भी मान्यता दें तब प्रक्रिया आगे बढ़ती है। जो दंड होता है, वही लाठी जिसे लाल कपड़ा बांधकर धारण किया जाता है।

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