महिला सशक्तिकरण:घूंघट से ग्लोबल ब्रांड तक; रूमा देवी ने गरीबी झेली, आज बेटियों को बांट रही स्कॉलरशिप

बाड़मेर के रावतसर गांव की रूमा देवी, जिन्होंने कभी गरीबी के कारण स्कूल छोड़ा और 17 साल की उम्र में शादी हो गई। इसके बाद जन्म के 48 घंटे में बच्चे को खो दिया। वह आज राजस्थान की 50 लाख महिलाओं के लिए रोल मॉडल हैं। सुई-धागे से सिली फटी हुई किस्मत रूमा देवी की कहानी किसी चमत्कार से कम नहीं है। बचपन में मां का साया उठा, तो दादी ने उंगली पकड़कर कशीदाकारी सिखाई। उन्होंने गांव की 10 महिलाओं को जोड़ा, सुई-धागे से थार की कला को वैश्विक पहचान दिलाने निकल पड़ीं। महिला सशक्तिकरण के लिए यह काम कर रही रूमादेवी खुद पढ़ नहीं पाई, लेकिन बेटियों की जिंदगी में बदलाव और उन्हें आगे बढ़ाने के लिए पिछले 10 सालों से काम कर रही है। गरीब परिवार जो अपनी बेटियों को पढ़ा नहीं पा रहे हैं, ऐसी बालिकाओं के लिए अक्षरा छात्रवृत्ति 25 हजार से 1 लाख तक दे रही है। सैकड़ों बेटियों को हर साल मदद मिल रही है। अब तक 1 करोड़ की सहायता दी है। रक्षा योजना 100 से अधिक बेटियों को सुकन्या समृद्धि के तहत 25 हजार की एफडी करवाकर खाते खुलवा रही है। खेल में बेटियों को आगे बढ़ाने के लिए चवा में 10 करोड़ की लागत का राष्ट्रीय स्तर का स्टेडियम तैयार कर रही है। स्कूलों में बालिकाओं के खेल मैदानों के लिए 2 करोड़ से ज्यादा राशि दान की है। राष्ट्रपति नारी शक्ति अवार्ड, हार्वर्ड गूंजी आवाज : रूमा देवी 2020 में जब वे अमेरिका की हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में गेस्ट स्पीकर के तौर पर मंच पर पहुंचीं। महिला उत्थान के कार्यों की वजह से ही 2018 में राष्ट्रपति ने उन्हें नारी शक्ति पुरस्कार से सम्मानित किया। “मैंने गरीबी देखी है, अपनों को खोने का दर्द सहा है। गरीबी के कारण 8वीं पढ़ स्कूल छोड़ी, लेकिन अब किसी बेटी को गरीबी के कारण स्कूल नहीं छोड़नी पड़े और महिलाएं खुद आत्मनिर्भर बने इस दिशा में काम कर रही हूं।” – रूमा देवी, निदेशक, ग्रामीण विकास एवं चेतना संस्थान

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