बुंदेलखंड मेडिकल कॉलेज के एक प्रोफेसर ने कैंपस में कुत्तों की बढ़ती तादाद से तंग आकर केंद्रीय वन मंत्री भूपेंद्र यादव को चिट्ठी लिखी है। प्रोफेसर ने चिट्ठी में कहा है कि कॉलेज को डॉग सेंचुरी बना दीजिए। यहां इंसानों से ज्यादा कुत्तों की आबादी हो गई है। इस मामले को उठाने वाले प्रोफेसर एमटीए मेडिकल टीचर एसोसिएशन के अध्यक्ष डॉ. सर्वेश जैन हैं। गुरुवार को यह चिट्ठी लिखी गई है। फिलहाल केंद्रीय मंत्री का जवाब नहीं आया है। आखिर बुंदेलखंड मेडिकल कॉलेज में कुत्तों का आतंक इतना कैसे बढ़ गया कि प्रोफेसर को केंद्रीय मंत्री को चिट्ठी लिखनी पड़ी, पढ़िए पूरी रिपोर्ट… सबसे पहले वो लेटर जिससे ये पूरा मामला शुरू हुआ… बुंदेलखंड मेडिकल कॉलेज कैम्पस में आवारा हिंसक कुत्तों की संख्या संभवत: मानव आबादी से ज्यादा हो चुकी है।
मरीज, विद्यार्थी, अध्यापक, परिजन सभी को काटने की घटनाएं हो चुकी हैं, लेकिन सागर नगर निगम किंकर्तव्यविमूढ़ बना हुआ है।
अत: महोदय हम लोगों का एक सुझाव है कि क्यों ना इस कैम्पस को श्वान अभयारण्य घोषित कर दिया जाए और बुंदेलखंड मेडिकल कॉलेज को अन्य जगह पुर्नवासित किया जाए।
यही शासन के संकल्प अनुसार श्वान हित में होगा। (पत्र में जैसा लिखा गया है।) कॉलेज से गुजरना खतरे से खाली नहीं
वृंदावन मालवीय बुंदेलखंड मेडिकल कॉलेज में काम करते हैं। वे बताते हैं कि कॉलेज कैंपस में बच्चों का निकलना मुश्किल हो गया है और यह किसी खतरे से खाली नहीं है। मेरी बेटी 12वीं क्लास में पढ़ती है। कोचिंग जाते वक्त उसे कुत्ते ने काट लिया था। चार माह पहले कैंडल मार्च निकाल चुके हैं डॉक्टर्स कुत्तों की समस्या से परेशान होकर मेडिकल कॉलेज के डॉक्टर्स कैंडल मार्च निकाल चुके हैं। मामले में केंद्रीय मंत्री को चिट्ठी लिखने वाले डॉ. जैन कहते हैं कि नगर निगम से लेकर स्थानीय प्रशासन के सभी जवाबदार अफसरों से शिकायत की जा चुकी है, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई। इसलिए इस बार पत्र जनहित में नहीं बल्कि श्वानहित में लिखना पड़ा। नगर निगम कमिश्नर बोले- नियम सख्त, जहां से पकड़ते हैं, वहीं छोड़ते हैं सागर नगर निगम के कमिश्नर राजकुमार खत्री से जब भास्कर ने कहा कि बार– बार शिकायत के बाद भी मेडिकल कॉलेज से कुत्तों को नहीं पकड़ा जा रहा है, तो कमिश्नर ने कहा कि कुत्तों को पकड़ने का सख्त नियम है। नियमानुसार कुत्तों को पकड़ने के लिए जल्द टेंडर जारी कर रहे हैं। कुत्तों की आबादी रोकने के लिए जब उन्हें पकड़कर नसबंदी की जाती है तो नसबंदी के बाद उन्हें वहीं छोड़ा जाता है जहां से पकड़ा हो। हमने पहले भी सागर मेडिकल कॉलेज से कुत्तों को पकड़ा है, लेकिन नियमानुसार नसबंदी के बाद उन्हें छोड़ा भी गया है। जब भास्कर ने पूछा कि क्या मेडिकल कॉलेज से पकड़े कुत्ते भी वहीं छोड़े गए? इसके जवाब में बोले कि जो भी हुआ होगा नियम के अनुसार ही हुआ होगा। कॉलेज से गुजरना खतरे से खाली नहीं है। डॉग की नसबंदी हो रही तो फिर संख्या कैसे बढ़ रही? एनिमल एक्सपर्ट अयान सिद्दीकी कहते हैं- केवल एक कारण नजर आता है कि जिन संस्थाओं के पास कुत्तों की नसबंदी करने की जिम्मेदारी है वे ठीक तरह से अपने काम को अंजाम नहीं दे रही हैं। अयान का कहना है कि 2001 में देश में एनिमल बर्थ कंट्रोल के नियम बने थे। इनके मुताबिक सेंट्रल, स्टेट और डिस्ट्रिक्ट लेवल पर एनिमल वेलफेयर बोर्ड के गठन का प्रावधान है। नगर निगम कमिश्नर को डिस्ट्रिक्ट कमेटी का तो राज्य स्तर पर नगरीय प्रशासन विभाग के प्रमुख सचिव को चेयरमैन नियुक्त किया जाता है। अयान के मुताबिक मार्च 2023 में इस नियम में संशोधन के साथ कुत्तों को पकड़ने, उनकी नसबंदी और छोड़ने के बारे में दिशा निर्देश जारी हुए थे इसमें कहा गया कि- -डॉग पकड़ने वाले स्क्वायड में 3 प्रशिक्षित कर्मचारी होने जरूरी है। -डॉग को जालीदार नेट की मदद से पकड़ना है। -डॉग को री-लोकेट नहीं कर सकते यानी जिस जगह से उसे पकड़ा गया है, वहीं उसे छोड़ना होगा। अयान कहते हैं कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद ये भी तय किया गया कि जिस कुत्ते की नसबंदी होगी, उसकी पहचान के लिए स्टरलाइजेशन के बाद कान पर वी शेप मार्किग होना चाहिए, ताकि उसे पहचाना जा सके कि नसबंदी हो चुकी है। इस समय ये पूरे प्रदेश की समस्या है एनिमल एक्सपर्ट इशिता कहती हैं कि फिलहाल ये मामला सागर मेडिकल कॉलेज में सामने आया है, लेकिन ऐसा नहीं है कि ये समस्या सीमित है। इस समय ये पूरे प्रदेश की समस्या है। इसका कारण ये है कि अगस्त से अक्टूबर तक कुत्तों का ब्रीडिंग पीरियड चलता है। इसके बाद उनके व्यवहार में थोड़ा एग्रेशन बढ़ जाता है।


