जैसलमेर की सरहद पर बसे खुहड़ी के शांत और मखमली धोरों ने रविवार की रात एक नया इतिहास रच दिया। मौका था चार दिवसीय विश्व-विख्यात मरू महोत्सव-2026 के भव्य समापन का। वैसे तो रेगिस्तान के इस महाकुंभ में चार दिनों तक कई रंग बिखरे, लेकिन समापन की शाम पूरी तरह से अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त लोक गायक मामे खान के नाम रही। मरुधरा के इस लाल ने अपनी गायकी से रेतीले टीलों पर ऐसी ऊर्जा भरी कि कड़ाके की ठंड में भी देशी-विदेशी सैलानी खुद को थिरकने से नहीं रोक पाए। मामे खान: जब धोरों पर गूंजा ‘गोविन्द बोलो हरी गोपाल बोलो’ कार्यक्रम के अंतिम चरण में जैसे ही मामे खान मंच पर आए, पूरा खुहड़ी ‘मामे-मामे’ के नारों से गूंज उठा। अपने सिग्नेचर राजस्थानी साफे और पारंपरिक लिबास में सजे मामे खान ने कार्यक्रम की शुरुआत आध्यात्मिक ऊंचाइयों के साथ की। जब उन्होंने “गोविन्द बोलो हरी गोपाल बोलो” भजन का आलाप लिया, तो टीलों पर सन्नाटा छा गया और दर्शक भक्ति के रस में डूब गए। मामे खान ने अपने ‘फॉक ओर्केस्ट्रा ऑफ राजस्थान’ के साथ लोक संगीत और फ्यूजन का ऐसा तड़का लगाया कि माहौल पूरी तरह बदल गया। उनके सुपर-हिट गीत ‘चौधरी’ की पहली धुन बजते ही हजारों की संख्या में मौजूद भीड़ अपनी जगह पर खड़े होकर नाचने लगी। बॉलीवुड के गीतों को राजस्थानी पुट के साथ पेश करने की उनकी कला ने विदेशी पर्यटकों को भी मंत्रमुग्ध कर दिया। विदेशों से आए सैलानी राजस्थानी धुन पर थिरकते हुए मरुधरा की मेहमाननवाजी और संस्कृति के कायल नजर आए। पियूष पंवार की ‘सुरमयी’ शुरुआत: ‘मेरी चौखट पे चलके…’ इससे पूर्व, शाम की शुरुआत इंडियन आइडल फेम सेलिब्रिटी गायक पियूष पंवार ने की। पियूष ने अपनी सशक्त और भावनात्मक आवाज से समां बांध दिया। उन्होंने अपनी प्रस्तुति का आगाज “मेरी चौखट पे चलके आज चारों धाम आए हैं…” से किया, जिसने उपस्थित जनसमूह को भावविभोर कर दिया। पियूष ने बॉलीवुड के लोकप्रिय गीतों की झड़ी लगा दी। दीवाना, मितवा, केसरिया, हम्मा-हम्मा और संदेसे आते हैं जैसे गीतों पर युवाओं का जोश देखते ही बनता था। जब उन्होंने ‘सुनो गौर से दुनिया वालों’ गाया, तो पूरा रेगिस्तान देशभक्ति के जज्बे से भर गया। पियूष की बहुमुखी प्रतिभा ने शास्त्रीय संगीत और आधुनिक गानों के बीच एक बेहतरीन सेतु का काम किया। पद्मश्री तगाराम भील की अलगोजा ने फूंकी जान राजस्थानी लोक वाद्ययंत्रों की महत्ता को दर्शाते हुए पद्मश्री सम्मानित तगाराम भील ने अलगोजा वादन की प्रस्तुति दी। दो बांसुरियों को एक साथ फूंककर निकाली गई उनकी मधुर धुनों ने दर्शकों को यह अहसास कराया कि क्यों राजस्थानी लोक संगीत आज भी दुनिया में अद्वितीय है। पूर्व प्रधान तनसिंह सोढ़ा ने उन्हें शाल और साफा पहनाकर सम्मानित किया, जो लोक कलाकारों के प्रति प्रशासन के सम्मान को दर्शाता है। मंच का संचालन विजय बल्लानी ने किया, जिन्होंने अपनी वाकपटुता से दर्शकों को बांधे रखा। पर्यटकों की जुबानी: “ऐसी रात पहले कभी नहीं देखी” इटली से आई पर्यटक मारिया ने बताया, “मैंने दुनिया के कई म्यूजिक फेस्टिवल देखे हैं, लेकिन खुले आसमान के नीचे, ठंडी रेत पर बैठकर मामे खान को सुनना एक रूहानी अनुभव है। राजस्थान की संस्कृति में जो अपनापन है, वो दुनिया में कहीं नहीं।” वहीं स्थानीय ग्रामीण गजेन्द्र सिंह ने कहा कि खुहड़ी के विकास के लिए यह महोत्सव एक मील का पत्थर साबित होगा। खुहड़ी के गजेंद्र सिंह सोढा ने बताया- मरू महोत्सव केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि राजस्थान की गौरवशाली परंपराओं का जीवंत प्रदर्शन है। मामे खान जैसे कलाकारों ने यह सिद्ध कर दिया है कि लोक संगीत की जड़ें आज भी बहुत गहरी हैं और यह युवा पीढ़ी के साथ-साथ सात समंदर पार के लोगों को भी जोड़ने की ताकत रखती है।
रेतीले समंदर में दौड़े ‘रेगिस्तान के जहाज’, सवाई सिंह का ऊंट रहा अव्वल विश्वविख्यात मरू महोत्सव-2026 के तहत खुहड़ी के मखमली धोरों पर लोक संस्कृति और रोमांच का अनूठा संगम देखने को मिला। आयोजन का मुख्य आकर्षण ऊंट दौड़ रही, जिसमें सवाई सिंह के ऊंट ने अपनी रफ्तार का लोहा मनवाते हुए प्रथम स्थान हासिल किया। हाथी सिंह और दामा राम के ऊंट दूसरे और तीसरे स्थान पर रहे। सिर्फ दौड़ ही नहीं, बल्कि ऊंटों के मनोहारी नृत्य और हैरतअंगेज करतबों ने भी दर्शकों को दांतों तले उंगली दबाने पर मजबूर कर दिया। थार के इस उत्सव में देशी ही नहीं, बल्कि विदेशी सैलानियों का उत्साह भी देखते ही बनता था। खुहड़ी रिसॉर्ट एसोसिएशन के पदाधिकारियों ने अतिथियों का पारंपरिक राजस्थानी साफा पहनाकर स्वागत किया। यह आयोजन मरू प्रदेश की समृद्ध विरासत को वैश्विक मंच पर मजबूती से पेश करता नजर आया। सम्मान: नकद पुरस्कार और ट्रॉफी से नवाजे गए विजेता ऊंट दौड़ और श्रृंगार प्रतियोगिता के विजेताओं को नकद राशि व ट्रॉफी देकर सम्मानित किया गया। पारंपरिक स्वागत: तन सिंह सोढ़ा और गजेन्द्र सिंह सोढ़ा ने की आगवानी। पर्यटन: बड़ी संख्या में विदेशी सैलानियों ने कैमरों में कैद किए पल। सांस्कृतिक विरासत: ऊंट पालकों की कला और मेहनत का प्रदर्शन।


