मेनार में बंदूक, तोपों की होली 4 मार्च को खेलेंगे:जमराबीज पर मेनार बनेगा सैनिक छावनी, युद्ध का परिदृश्य जीवंत हो उठेगा

उदयपुर जिले के मेनार की पटाखे और बारूद की होली इस बार 4 मार्च को खेली जाएगी। आधी रात तक ओंकारेश्वर चौक पर युद्ध का परिदृश्य जीवंत हो उठता है। ग्रामीण पारंपरिक वेशभूषा धोती, कुर्ता, पगड़ी पहने ग्रामीणों की टोली और गरजती तोपें, हवा में लहराती बंदूकें, हाथों में तलवारें और भव्य आतिशबाजी का नजारा रहेगा। इस खास आयोजन को देखने के लिए मध्यप्रदेश तक से लोग आते है। होली के बाद मनाए जाने वाला जमराबीज इस बार 4 मार्च को मनाया जाएगा, जिसमें आसपास के गाँवो सहित मेवाड़ के उदयपुर, राजसमंद, चित्तौड़गढ़, डूंगरपुर, निम्बाहेड़ा, मालवा एवं मध्यप्रदेश के हज़ारों लोग साक्षी बनेंगे। मेनार प्राचीन ठाकुरजी मंदिर ओंकारेश्वर चौक में मनाए जाने वाले पर्व की तैयारियों की जा रही है। करीब 451 साल पहले मुगल चौकी ध्वस्त करने की खुशी में यहां मेनारिया समाज बारूद की होली खेल रहा है। युवाओं, बुजुर्गों द्वारा एक से बढ़कर एक हेरतंगेज जोशीले अंदाज़ मे दोनों हाथों मे तलवारें लेकर घुमायी जाती है और आग के गोटे को घुमाते है। इस आयोजन को लेकर शाम को 5 बजे से 8 बजे तक घरों में विविध व्यंजन बनाये जाते है तथा मेहमाननवाजी होती है। जानिए इतिहास को गांव के मोतबीर (बुजुर्ग) बताते है कि महाराणा अमर सिंह प्रथम के समय की एक ऐतिहासिक घटना से जुड़ा है। 1576 में हुए हल्दीघाटी के युद्ध के बाद मेवाड़ के जन मानस में राष्ट्र भक्ति की ऐसी लहर उठी कि हर गांव मुगल शासकों के खिलाफ उठ खड़ा हुआ। जगह-जगह मुगलों की चौकियां नष्ट की जाने लगी। मुगलों की एक मुख्य चौकी ऊंटाला वल्लभगढ़ (वर्तमान वल्लभनगर) में स्थापित थी, जिसकी उप चौकी इसी मेनार गांव में थी। महाराणा प्रताप के निधन के बाद मुगलों के आतंक से त्रस्त होकर मेनार के मेनारिया ब्राह्मणों ने मुगल सेना को हटाने की रणनीति बनाई। एक दिन समाज के पंचों ने गोपनीय बैठक बुलाकर इस चौकी को नष्ट करने की योजना तैयार की। करीब साढ़े चार सौ साल पहले होली के दूसरे दिन जमराबीज पर मेनारिया वीरों ने मुगलों पर हमला कर दिया। विक्रम संवत 1657 (सन 1600) चैत्र सुदी द्वितीया को मुगलों की चौकी नष्ट कर दी। तब उस समय महाराणा अमर सिंह ने मेनार के मेनारिया ब्राह्मणों को शाही लाल जाजम, रणबांकुरा ढोल, सिर पर कलंकी धारण, ठाकुर की पदवी एवं मेवाड़ की 17वीं उमराव की उपाधि दी। साथ ही आजादी तक गांव की 52 हज़ार बीघा जमीन पर लगान वसूला नहीं जाएगा। ओंकार माराज के चबूतरे से शुरु हुई लड़ाई छावनी तक पहुँच गई और मुगलों को मार गिराया और मेवाड़ को मुगलो के आतंक से बचाया। जिसको लेकर मेनार में उनकी याद में शौर्य और वीरता पर्व मनाया जाता है। सहयोग : चेतन व्यास

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