भास्कर न्यूज़| लुधियाना शहर में एक सकारात्मक बदलाव देखने को मिल रहा है, जहां युवा पीढ़ी बुजुर्गों का हाथ थामकर उन्हें डिजिटल दुनिया से जोड़ रही है। स्मार्टफोन चलाना हो, वीडियो कॉल करना हो या ऑनलाइन पेमेंट करना अब दादा-दादी और नाना-नानी भी पीछे नहीं हैं। युवा सीनियर सिटीजंस को धैर्य के साथ मोबाइल की बारीकियां समझा रहे हैं। इससे न केवल बुजुर्गों का आत्मविश्वास बढ़ रहा है, बल्कि पीढ़ियों के बीच संवाद भी मजबूत हो रहा है। इस पहल ने यह साबित कर दिया है कि यदि युवा आगे आएं तो डिजिटल गैप को आसानी से खत्म किया जा सकता है। स्मार्टफोन अब सिर्फ मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि पीढ़ियों को जोड़ने का माध्यम बन चुका है। यह पहल समाज के लिए एक बड़ा संदेश दे रही है सीखने की कोई उम्र नहीं होती, बस साथ देने वाला हाथ होना चाहिए। {पहले कई बुजुर्ग स्मार्टफोन को छूने से भी डरते थे। उन्हें लगता था कि कहीं कुछ गलत बटन दब गया तो फोन खराब न हो जाए,लेकिन जब घर के बच्चे थोड़ा-थोड़ा समय निकालकर उन्हें सिखाने लगे तो स्थिति बदलने लगी। अब वही बुजुर्ग खुद व्हाट्सऐप पर मैसेज पढ़ते हैं, फोटो भेजते हैं और जरूरत पड़ने पर डॉक्टर से ऑनलाइन अपॉइंटमेंट भी बुक कर लेते हैं। आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ते कदम : अब कई बुजुर्ग खुद ऑनलाइन टिकट बुक कर रहे हैं, दवाइयां मंगवा रहे हैं और बैंक बैलेंस चेक कर रहे हैं। इससे उन्हें यह महसूस हो रहा है कि वे किसी पर निर्भर नहीं हैं। युवा भी यह समझ रहे हैं कि तकनीक का सही उपयोग तभी संभव है जब हर उम्र का व्यक्ति इससे जुड़ सके। ऑनलाइन पेमेंट से आसान हुआ रोजमर्रा का काम : बिजली-पानी का बिल भरना हो या किराना का भुगतान करना युवा उन्हें डिजिटल पेमेंट ऐप्स का इस्तेमाल करना सिखा रहे हैं। खासकर पेमेंट करना समझाया जा रहा है। युवा पहले छोटे अमाउंट से प्रैक्टिस करवाते हैं, फिर उन्हें सुरक्षित तरीके से ट्रांजैक्शन की जानकारी देते हैं। इससे बुजुर्गों को बैंक की लंबी लाइन में खड़े होने से राहत मिली है। साइबर सुरक्षा की भी दी जा रही जानकारी : सिर्फ ऐप चलाना ही नहीं, बल्कि ऑनलाइन फ्रॉड से बचने की जानकारी भी दी जा रही है। युवा समझा रहे हैं कि किसी अनजान लिंक पर क्लिक न करें, ओटीपी किसी से साझा न करें और कॉल पर बैंक डिटेल्स न बताएं। इससे बुजुर्ग अधिक सतर्क हो रहे हैं और डिजिटल दुनिया में सुरक्षित महसूस कर रहे हैं। रिश्तों में बढ़ी नजदीकियां : इस पहल का सबसे बड़ा फायदा यह हुआ है कि परिवारों में संवाद बढ़ा है। पहले जहां बुजुर्ग तकनीक से दूरी के कारण खुद को अलग महसूस करते थे, अब वे परिवार के डिजिटल ग्रुप का हिस्सा बन गए हैं। पोते-पोती जब उन्हें रील दिखाते हैं या वीडियो कॉल पर दूर बैठे रिश्तेदारों से मिलवाते हैं तो उनके चेहरे पर खुशी साफ नजर आती है।


