योग मानव-जीवन का अनिवार्य धारणीय आभूषण: व्यास गोर

डूंगरपुर| आध्यात्मिक अष्टांग योग मानव-जीवन का एकमात्र लक्ष्य है और इस योग के न्यूनाधिक अभाव में मनुष्य उतना ही न्यूनाधिक मात्रा में अयोग्य हो जाता है। योग से ही योग्य व योग्यता आदि शब्द उपजाएं गए हैं। ये विचार रविवार की सुबह व्यास आश्रम दामड़ी में योग शिविर के तहत ब्रह्मर्षि पं.विद्याशंकर व्यास गोर ने व्यक्त किए। साधकों के विभिन्न प्रश्नों के उत्तर देते हुए व्यास ने बताया कि ब्रह्मांड के भौतिक स्वरूप को अनंत या अनंत रहित बताना दोनों ही विकट महाश्चर्य हैं, जिसके चिंतन से आधुनिक वैज्ञानिक व प्राचीन ऋषि-मुनि दोनों ही वर्ग स्तब्ध हैं। व्यास ने श्री रामचरित मानस के बालकांड में वर्णित देवी-देवताओं ने की गई ईश्वर-स्तुति का जिक्र करते हुए बताया कि शारदा, चार वेद, सहस्रफणी शेषनाग, समस्त ऋषि-मुनि भी ईश्वर की अनंतता के दर्शन करने में विफल हैं। राहुल पाटीदार ने साधकों को योग का महत्व बताया।

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