रहस्यमयी नॉर्थ कोरिया की ‘फुटबॉल डिप्लोमेसी’:16 साल बाद एशियन मंच पर वापसी कर रही महिला टीम, ऑस्ट्रेलिया में खेलेगी

दुनिया के सबसे रहस्यमयी देशों में शुमार नॉर्थ कोरिया एक बार फिर सुर्खियों में है। एक मार्च से ऑस्ट्रेलिया में शुरू हो रहे विमंस एशियन कप में नॉर्थ कोरिया की महिला फुटबॉल टीम हिस्सा लेने जा रही है। लंबे समय तक अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं से लगभग गायब रहने के 16 साल बाद वर्ल्ड नंबर-9 टीम टूर्नामेंट में उतर रही है। नॉर्थ कोरिया के महिला फुटबॉल की कहानी 1986 में शुरू हुई थी। कहा जाता है कि जब फीफा कांग्रेस में महिलाओं के लिए वर्ल्ड कप की मांग उठी, तो नॉर्थ कोरियाई प्रतिनिधियों ने इसे अपनी गिरती राजनीतिक साख को बचाने के एक मौके के तौर पर देखा। नॉर्थ कोरिया ने एक सोची-समझी रणनीति के तहत महिलाओं के खेल में भारी निवेश किया। स्कूल पाठ्यक्रम में फुटबॉल कार्यक्रम जोड़े गए, सेना में महिला टीमें बनाई गईं और देशभर में फुटबॉल से जुड़ी फेसिलिटी तैयार की गईं। तत्कालीन नेता किम जोंग-इल (फुटबॉल प्रेमी) ने महिला फुटबॉल को ‘पॉलिटिकल प्रोपेगेंडा’ का जरिया बनाया। 2010 तक नॉर्थ कोरिया एशिया की सबसे मजबूत टीमों में से एक थी। 2011 में टीम की रफ्तार पर तब ब्रेक लग गया, जब वर्ल्ड कप के दौरान पांच खिलाड़ी डोप टेस्ट में फेल हो गईं। तब नॉर्थ कोरिया ने अजीबोगरीब दलील दी थी। उन्होंने कहा कि खिलाड़ियों पर बिजली गिरी थी, जिसके इलाज के लिए उन्हें ‘कस्तूरी मृग’ की ग्रंथियों से बनी प्राकृतिक दवा दी गई थी। फीफा ने इस दलील को खारिज कर टीम पर चार साल का प्रतिबंध लगा दिया। इसके बाद आर्थिक प्रतिबंधों, राजनीतिक अलगाव और कोरोना के कारण टीम गायब रही। हालांकि बैकग्राउंड में काम जारी रहा। 2013 में ‘प्योंगयोंग इंटरनेशनल फुटबॉल स्कूल’ खोला गया। नॉर्थ कोरिया की अंडर-17 और अंडर-20 टीमें मौजूदा वर्ल्ड चैम्पियन हैं। युवाओं के स्तर पर नॉर्थ कोरिया के पास रिकॉर्ड 14 खिताब हैं। महिला एशियन कप में उसकी वापसी अहम है। नॉर्थ कोरिया का शुरुआती मैच उज्बेकिस्तान से है। देखना दिलचस्प होगा कि युवा स्तर की सफलता सीनियर मंच पर कितनी प्रभावी साबित होती है। सफल खिलाड़ी ‘नेशनल हीरो’ थीं, इनाम में घर दिए जाते थे नॉर्थ कोरिया ने 2001 से 2008 के बीच तीन एशियन कप खिताब जीते। प्योंगयोंग के 1.5 लाख की क्षमता वाले स्टेडियम में महिला फुटबॉल मैच देखने भीड़ उमड़ती थी। सफल खिलाड़ियों को ‘नेशनल हीरो’ माना जाता। खिलाड़ियों को सफलता के बदले अपार्टमेंट और राजधानी में रहने का अवसर मिलता था, जहां जीवन स्तर ग्रामीण इलाकों से बेहतर माना जाता है। सरकार ने डाक टिकट, पोस्टर और टीवी धारावाहिकों के जरिए महिला फुटबॉल को राष्ट्रीय गौरव के प्रतीक के रूप में पेश किया था।

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