बांसवाड़ा के सोडलदूधा गांव में एक चर्च को मंदिर में बदला जा रहा है। ईसाई धर्म के चिह्न क्रॉस की जगह भगवान की प्रतिमा की प्राण प्रतिष्ठा की जाएगी। शनिवार को स्पेशल स्टोरी में भास्कर ने खुलासा किया था कि चर्च की दीवारों पर जय श्री राम के नारे लिखे जा रहे हैं। चर्च के पादरी सहित गांव के कई लोगों ने हिंदू धर्म में वापसी की है। मामले में सबसे बड़ा सवाल था कि क्या कारण थे कि इन लोगों ने पहले ईसाई धर्म अपनाया? इसके अलावा किस बात ने इन्हें हिंदू धर्म में वापसी के लिए प्रेरित किया? सवालों के जवाब जानने के लिए पढ़िए पूरी रिपोर्ट… हिंदू धर्म में वापसी की तो पत्नी ने छोड़ा साथ
सोडलदूधा गांव में पांचवीं क्लास तक पढ़े गौतम गरासिया ने सबसे पहले धर्म बदला था। गौतम ने बताया कि उसके मानसिक तनाव काफी ज्यादा था। हॉस्पिटल से लेकर देवी-देवताओं के सभी स्थान पर चक्कर काटे, लेकिन काेई असर नहीं हुआ। इस दौरान उनके क्षेत्र में गरासिया मिनिस्ट्री के लोग घूम रहे थे। ये लोग बांसवाड़ा में पिछले कई साल से लगातार अपने धर्म का प्रचार कर रहे हैं। गौतम भी उनके सम्पर्क में आ गए। गौतम ने बताया- उन लोगों ने मुझे कहा हमारे साथ आ जाओ। प्रभु की आराधना करो। शांति मिलेगी। वो लोग धर्म परिवर्तन के लिए लाल कलर का दाकरस (खास प्रकार का जूस) पिलाते थे। मीठे स्वाद के दाकरस के जरिए मन परिवर्तन की बात करते थे। गौतम ने बताया कि वह पहले गांव से बाहर लगने वाली सभा में जाता था। बाद में मिनिस्ट्री के लोगों ने उससे गांव में ही अपने घर पर प्रार्थना सभा करने के लिए कहा। गांव के अन्य लोगों को शामिल करने के लिए कहा। उसके लिए गौतम को महीने के 1500 रुपए भी देने लगे। गौतम से प्रभावित होकर उसके गांव के काफी लोगों ने भी धर्म परिवर्तन कर लिया। गौतम ने बताया कि उनकी पत्नी इस धर्म से सबसे ज्यादा प्रभावित थी। पिछले साल गौतम के साथ गांव के 30 लोगों ने धर्म वापसी कर ली। गौतम की पत्नी ने धर्म बदलने से इनकार कर दिया। गौतम ने यह भी बताया कि 30 सालों में ऐसा कुछ भी नहीं लगा कि धर्म परिवर्तन के बाद कोई मानसिक शांति मिली हो या कोई आर्थिक स्तर सुधरा हो। हालात आज भी जस के तस है। तीस साल में पक्की छत तक नहीं बना पाया। अपनों ने बोलना बंद कर दिया था। गौतम का 30 सदस्यों का परिवार है। उसके 6 बेटियां और 5 बेटे हैं। कच्चा घर, बच्चों के लिए कपड़े तक नहीं, जेवर बिक गए
गांव की मीना गरासिया ने बताया कि उसकी शादी को 7 साल हो गए हैं। पति मजदूरी करते हैं। मीना और उसके पति ने साथ में ही ईसाई धर्म अपनाया था। मीना का झोपड़ा सोड़लादूधा गांव में चर्च के पास ही है। बोलीं- हर रविवार को चर्च में होने वाली प्रार्थना सभा को देख वह भी प्रभावित हो गईं। वहां आने वाले लोग बच्चों की पढ़ाई, इलाज और रोजगार की बातें करते थे। मुझे लगा इस धर्म को ग्रहण करने से हमारा जीवन स्तर भी सुधर जाएगा। मीना, उसके पति और उसके तीन बच्चों ने एक साथ ईसाई धर्म अपनाया था। मीना ने बताया- चार साल में जीवन में ऐसा कोई बदलाव नजर नहीं आया। पहले वह और उसका पति मजदूरी करने भी जाते थे। मिनिस्ट्री से जुड़ने के बाद उनके लोग कोई न कोई काम बताते रहते हैं। कोई पैसा भी नहीं मिलता था। उस काम को प्रभु की सेवा कहा जाता है। इसके बाद मीना घर के हालात दिखाने के लिए झोपड़े के अंदर ले गई। कोने में कच्चा चूल्हा था। पास में तीन महीने का बेटा सो रहा था। दो साल का बेटा वहीं घूम रहा था। मीना ने बताया मिनिस्ट्री के लोगों की सेवा करते करते घर के गहने तक बिक गए। हमें कोई पैसा नहीं मिलता था, बल्कि पेट्रोल और खाने-पीने के पैसे मांगते थे। हम कहां से देते? इसलिए हम वापस धर्म में लौट आए। प्रेमी से प्रभावित होकर फिर हिंदू धर्म में लौटी युवती सोड़लादूधा गांव के भरत गरासिया ने बताया कि उसके चाचा और उनके बेटे ने ईसाई धर्म ग्रहण किया था। उन लोगों को भी काफी बार धर्म बदलने के लिए प्रेरित किया, लेकिन वे नहीं माने। भरत ने बताया कि- उसे ईसाई धर्म ग्रहण कर चुकी लड़की से प्रेम हो गया था। बात शादी तक पहुंची तो लड़की के परिजनों ने ईसाई धर्म के आधार पर ही शादी करने और धर्म ग्रहण करने के लिए कहा। भरत ने साफ इनकार कर दिया। भरत ने अपनी प्रेमिका को हिंदू धर्म और संस्कृति के बारे में बताया। इसके बाद लड़की ने धर्म में वापसी कर भरत से शादी कर ली। भरत ने बताया 9 मार्च को चर्च के मंदिर में बदलने पर भव्य कार्यक्रम होगा। एक हजार से ज्यादा लोग एकत्रित होंगे। बहुत से साधु संत भी आएंगे। 150 साल से चल रहा धर्म परिवर्तन का काम : रामस्वरूप महाराज विश्व हिंदू परिषद के केंद्रीय सहमंत्री रामस्वरूप महाराज ने बताया कि हम लोगों ने भील व गरासिया लोगों को दाता बनाया। इनके क्षेत्र में जितने भी काम चलते हैं, उनमें 70 प्रतिशत भागीदारी इन लोगों की ही होती है। उन्होंने बताया-बांसवाड़ा और डूंगरपुर में पिछले कई सालों से धर्म परिवर्तन का काम चल रहा है। पहले यह लोग दूसरे प्रदेश से यहां गांवों में आकर रहने लगे। वहां शिक्षा के लिए धीरे-धीरे 400 छोटी स्कूलें खोलीं। जिनमें 250 अब भी संचालित हैं। लोगों के लिए दवा की व्यवस्था करते थे। दवा के बहाने धीरे-धीरे रविवार को प्रार्थना सभा करने लगे और चर्च खड़े कर दिए। धीरे-धीरे आदिवासियों में इनका प्रभाव बढ़ता ही गया। रामस्वरूप महाराज ने बताया कि हालांकि पिछले कुछ सालों में इनमें बदलाव आने लगा है। यह लोग अब गांवों में खुद ही विरोध करने लगे हैं। अपने स्तर पर ही वापस अपने धर्म में लौट रहे हैं। बांसवाड़ा जिले के सल्लोपाट, सज्जनगढ़, गांगड़तलाई, कुशलगढ़, बागीदौरा क्षेत्र में एक दौर में तेजी से धर्म परिवर्तन के केस सुनने को मिल रहे थे। अब बदलाव की बयार शुरू हो चुकी है। हजारों लोग धर्म वापसी कर चुके हैं। धर्म परिवर्तन करने वाला संगठन इस तरह करता है काम राजस्थान में पहली बार…जहां चर्च था, मंदिर बनेगा:ईसाई धर्म के क्रॉस की जगह भगवान की प्रतिमा, बाइबल की जगह जय श्रीराम के नारे


