राजस्थान में किसान ने उगा दी अमेरिकन केसर:एनर्जी बढ़ाने वाली एक ‘जड़’ से लाखों में होगी कमाई, डिमांड में है ये औषधि

राजस्थान में केसर? सुनने में थोड़ा अजीब लगता है, लेकिन ये सच है। हालांकि, ये केसर कश्मीर की वादियों वाला केसर नहीं है। ये है अमेरिकन केसर। जिसका इस्तेमाल फूड आइटम में नेचुरल कलरिंग के लिए किया जाता है। इस केसर की खेती की शुरुआत की है राजसमंद के एक किसान ने। परंपरागत खेती छोड़कर ये किसान एक ऐसी ‘जड़’ की भी खेती रहा है जिसकी डिमांड विदेशों तक है। ये जड़ है अश्वगंधा। खेती में किए गए नवाचार से किसान को इस साल 10 लाख रुपए तक की कमाई का अनुमान है। म्हारे देश की खेती में आज बात राजसमंद के झोर गांव के किसान की … आमेट उपखंड के झोर गांव के रहने वाले किसान रामलाल खारोल (52) 10वीं पास है। पिछले लगभग 25 वर्षों से वे परंपरागत खेती करते आ रहे थे। गेहूं, मक्का और अन्य सामान्य फसलें बोते रहे। लेकिन बढ़ती लागत और घटती आमदनी के बीच संतुलन बनाना कठिन होता जा रहा था। मेहनत भरपूर थी, लेकिन मुनाफा उम्मीद के मुताबिक नहीं मिल रहा था। इसलिए इस बार कुछ अलग करने का फैसला किया। जानें- कैसे मिला औषधीय खेती का नया रास्ता किसान बताते हैं – साल 2025 के जून महीने में वे घूमने के लिए मध्यप्रदेश गए थे। इसी दौरान उन्हें नीमच की प्रसिद्ध मंडी देखने का अवसर मिला। वहां उन्होंने कई नई और औषधीय फसलें देखीं, जो पारंपरिक खेती से बिल्कुल अलग थीं। स्थानीय किसानों ने बताया कि कम पानी में भी अच्छी आमदनी देने वाली खेती संभव है। राजसमंद क्षेत्र की काली और पीली मिट्टी में नई फसल चुनना आसान नहीं था। सबसे बड़ी समस्या अच्छी गुणवत्ता का बीज मिलना भी थी। मंडी में ‘सिम पुष्टि’ अश्वगंधा और अमेरिकन केसर या अडक केसर का बीज सस्ते दाम पर उपलब्ध था, लेकिन उन्होंने जल्दबाजी नहीं की। पहले अनुभवी किसानों से सलाह ली और फिर बेहतर गुणवत्ता का बीज खरीदा। अश्वगंधा का 28 किलो बीज 600 रुपए प्रति किलो के हिसाब से खरीदा, जिस पर करीब 17 हजार रुपए खर्च हुए। वहीं अमेरिकन केसर (अड़क/कुसुम) का 9 किलो बीज 400 रुपए प्रति किलो के हिसाब से खरीदा, जिसमें लगभग 3600 रुपए खर्च आए। उनके अनुसार शुरुआत में बीज पर खर्च ज्यादा लगा, लेकिन यह निवेश आगे चलकर मुनाफे में बदलने वाला है। छिड़काव विधि से बुवाई, कम पानी में ज्यादा कमाई संभव रामलाल खारोल बताते हैं – अश्वगंधा और अमेरिकन केसर दोनों कम पानी की फसलें हैं, इसलिए पानी की कमी वाले क्षेत्र के लिए बेहद उपयुक्त हैं। खास बात यह भी है कि अश्वगंधा की फसल को जानवर नुकसान नहीं पहुंचाते। इसकी जड़, तना और पत्तियां तीनों औषधीय उपयोग में आती हैं, जिससे बाजार में इसकी मांग बनी रहती है। खेत तैयार करने के लिए उन्होंने प्रति बीघा दो ट्रॉली गोबर खाद डाली। इसके बाद दो बार जुताई कर खेत को समतल किया और क्यारियां बनाई। बुवाई छिड़काव विधि से की जाती है, जिसमें एक बीघा में लगभग 4 किलो बीज लगता है। जड़ों में दीमक लगने का खतरा, बीजोपचार जरूरी अश्वगंधा की जड़ों में दीमक लगने का खतरा रहता है, इसलिए बीज को पहले दवा से उपचारित किया जाता है और सुखाने के बाद छिड़काव किया जाता है। बुवाई के बाद पहली सिंचाई की जाती है, फिर पांच दिन बाद दूसरी और 12 दिन बाद तीसरी सिंचाई दी जाती है। चौथी सिंचाई लगभग 45 दिन बाद करनी होती है। करीब 120 दिन में पौधा तैयार हो जाता है और इसकी ऊंचाई लगभग ढाई फीट तक पहुंचती है। 35 हजार रुपए प्रति क्विंटल तक मिलता है भाव रामलाल खारोल बताते हैं – मुख्य जड़ का बाजार भाव करीब 35 हजार रुपए प्रति क्विंटल तक मिल जाता है, जबकि जड़ों के तार 14 से 15 हजार रुपए प्रति क्विंटल बिकते हैं। उनके अनुमान के अनुसार एक बीघा में करीब 3 क्विंटल जड़ उत्पादन संभव है और कुल उत्पादन लगभग 21 क्विंटल तक पहुंच सकता है। इससे करीब साढ़े सात लाख रुपए तक की कमाई की उम्मीद है। कोरोना के बाद अश्वगंधा के प्रोडक्ट की डिमांड बढ़ी है। ये प्रोडक्ट इंडिया से यूरोप, अमेरिका तक भेजे जा रहे हैं। अंकुरण तेज करने की खास तकनीक रामलाल खारोल ने अपनी खेती में एक विशेष तकनीक भी अपनाई। यदि बीज को 24 घंटे पानी में भिगोकर, फिर उपचारित कर सुखाकर बोया जाए तो केवल 7 दिन में अंकुरण हो जाता है। सामान्य विधि में यही प्रक्रिया लगभग 25 दिन लेती है। इस तकनीक से समय की बचत होती है और पौधों की बढ़वार भी तेज होती है, जिससे पूरी फसल अधिक स्वस्थ और समान रूप से विकसित होती है। अमेरिकन केसर से फूल और बीज दोनों में कमाई किसान रामलाल खारोल बताते हैं – अमेरिकन केसर की खेती भी कम पानी में अच्छी उपज देती है, इसलिए उन्होंने इसे अश्वगंधा के साथ अपनाया। एक बीघा खेत के लिए करीब 3 किलो बीज पर्याप्त रहता है। बुवाई से पहले खेत में गोबर खाद डालकर रोटावेटर चलाया जाता है, फिर प्लाऊ से जमीन को समतल किया जाता है ताकि बीज समान रूप से फैल सके। इसके बाद छिड़काव विधि से बुवाई कर पहली सिंचाई की जाती है, दूसरी सिंचाई 10 दिन बाद और फिर 30-30 दिन के अंतर से दो और सिंचाई दी जाती हैं। पौधे को एक फीट की दूरी पर लगाने से अच्छी ग्रोथ पौधे निकलने के बाद उन्हें लगभग एक-एक फीट की दूरी पर रखा जाता है, जिससे पौधों की बढ़वार बेहतर होती है। यह पौधा लगभग चार फीट तक ऊंचा हो जाता है और करीब 120 दिन में फूल आना शुरू हो जाते हैं। शुरुआत में फूल पीले रंग के होते हैं, लेकिन पकने पर लाल हो जाते हैं। लाल होने पर ही तुड़ाई की जाती है। फूल और बीज से ढाई लाख रुपए कमाई का अनुमान रामलाल खारोल बताते हैं कि तुड़ाई के बाद फूलों को धूप में नहीं बल्कि छाया में सुखाया जाता है, क्योंकि तेज धूप में उनका रंग फीका पड़ जाता है और बाजार भाव कम हो जाता है। एक बीघा खेत से लगभग 50 किलो फूल प्राप्त होते हैं, जिनका बाजार भाव 800 से 1200 रुपए प्रति किलो तक मिल जाता है। इससे करीब डेढ़ लाख रुपए तक आय होने का अनुमान है। वहीं इसी फसल से लगभग 4 क्विंटल बीज भी निकलता है, जिसका भाव करीब 90 रुपए प्रति किलो तक मिल जाता है और इससे करीब एक लाख रुपए की अतिरिक्त कमाई संभव है। इस तरह अमेरिकन केसर से कुल मिलाकर लगभग ढाई लाख रुपए तक की आय की उम्मीद बनती है। किसान करने लगे बीज की बुकिंग रामलाल खारोल बताते हैं – उनकी फसल को देखने के लिए आसपास के किसान लगातार खेत पर पहुंच रहे हैं। कई किसानों ने तो बीज के लिए एडवांस बुकिंग भी कर रहे हैं। यदि स्थानीय किसान भी इस तरह की औषधीय खेती अपनाएं तो कम पानी में अच्छा मुनाफा कमाया जा सकता है। — खेती-किसानी से जुड़ी ये खबर भी पढ़िए… कोरोना में नौकरी छूटी, चिया की फसल ने बदली जिंदगी:सही बीज की तलाश में लगे 2 साल, अब 50 लाख की कमाई की उम्मीद कभी टेक्सटाइल फैक्ट्री में मशीनों की फिटिंग करने वाला युवक आज चिया सीड की खेती से लाखों रुपए कमा रहा है। पांच साल की उम्र में उनके सिर से पिता का साया उठ गया था। पूरी खबर पढ़िए

FacebookMastodonEmail

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *