राजस्थान हाईकोर्ट करेगा द्रव्यवती नदी के रखरखाव की मॉनिटरिंग:कहा- साफ और प्रदूषण मुक्त वातावरण में रहना नागरिकों का अधिकार

जयपुर शहर के बीच में से गुजरने वाली द्रव्यवती नदी के रखरखाव की मॉनिटरिंग अब राजस्थान हाई कोर्ट करेगा। गुरुवार को राजस्थान हाईकोर्ट की जयपुर बेंच ने इस मामले में स्वप्रेरित प्रसंज्ञान लेते हुए जेडीए और द्रव्यवती नदी के रखरखाव का जिम्मा संभालने वाली टाटा प्रोजेक्ट्स लिमिटेड (टीपीएल) से कहा है कि वह रखरखाव की वार्षिक रिपोर्ट हाईकोर्ट में सब्मिट करें। कोर्ट ने अपने आदेश में कहा- स्वच्छ और प्रदूषण रहित वातावरण में रहना प्रत्येक नागरिक का मौलिक अधिकार है। नागरिकों को प्रदूषण रहित वातावरण प्रदान करना सरकार का दायित्व और संवैधानिक कर्तव्य है। कोर्ट ने कहा- यदि परियोजना का संचालन और रखरखाव ठीक से नहीं होता है और उसकी उचित निगरानी नहीं की जाती है तो निश्चित रूप से परिणाम प्रतिकूल होंगे। यह जनता के हित में नहीं है। यह उनके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन होगा। रखरखाव पर हर साल हो रहे 20.60 करोड़ खर्च
कोर्ट ने कहा- अमानीशाह नाले के पुनरुद्धार और उसे द्रव्यवती नदी में परिवर्तित करने का काम जेडीए और कंपनी के बीच महज एक अनुबंध नहीं हैं। यह जनहित से भी जुड़ा मामला है। यह योजना सरकार द्वारा जनहित में जयपुर शहर के शहरीकरण और सौंदर्यीकरण के विकास की दिशा में एक कदम आगे बढ़ाने के नेक उद्देश्य से शुरू की गई थी। यह निश्चित रूप से जन सरोकार का विषय है कि द्रव्यवती नदी का संचालन, रखरखाव और सफाई निरंतर और नियमित रूप से होनी चाहिए। इस परियोजना में राजस्थान सरकार ने भारी मात्रा में निवेश किया है, जो कि करोड़ों रुपए में जाता है। कोर्ट ने कहा- अनुबंध के अनुसार कंपनी 10 साल तक द्रव्यवती नदी के रखरखाव की जिम्मेदारी उठाएगी। जिसमें अपशिष्ट जल का उपचार, नदी तल की सफाई, सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) का संचालन, नदी के पानी से अपशिष्ट की सफाई आदि शामिल हैं। जिसके लिए जेडीए कंपनी को 206 करोड़ का भुगतान करेगा। जेडीए और कंपनी में हो गया था विवाद
जेडीए के अधिवक्ता अनुरूप सिंघी ने बताया- जेडीए कॉमर्शियल कोर्ट के आदेश के खिलाफ हाई कोर्ट पहुंचा था। जेडीए की ओर से कहा गया था कि द्रव्यवती नदी की डीपीआर और निर्माण के लिए कंपनी के साथ 1470.85 करोड़ का अनुबंध किया गया था। लेकिन कंपनी ने सीकर बांध क्षेत्र, गूलर बांध क्षेत्र और रामचंद्रपुरा बांध के डूब क्षेत्रों में निर्माण कार्य नहीं किया था। जिसके कारण जेडीए ने कंपनी के 52.28 करोड़ रुपए रोक लिए थे। कंपनी ने इसके खिलाफ आरबिट्रेशन ट्रिब्यूनल में याचिका दायर की। जहां से कंपनी के पक्ष में फैसला हो गया। जिसके खिलाफ जेडीए कॉमर्शियल कोर्ट पहुंचा। लेकिन कॉमर्शियल कोर्ट ने आधी राशि पर स्टे कर दिया और आधी राशि कंपनी को अदा करने के लिए कोर्ट में जमा कराने का आदेश दिए। इसके खिलाफ कंपनी ने हाई कोर्ट में अपील दायर की थी। हाई कोर्ट ने सुनवाई के बाद जेडीए को राहत देते हुए कहा कि वह देय राशि एफडी के रूप में कोर्ट में जमा कराए। जिसे कंपनी फैसला होने तक विड्रो नही कर सकती हैं।

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