कठपुतलियां तो आपने देखी होंगी, लेकिन कभी मंच पर इन कठपुतलियों को महात्मा गांधी या स्वामी विवेकानंद की जीवनी प्रस्तुत करते देखा है? राजस्थान में कठपुतली थिएटर करने वाला एकमात्र संस्थान भारतीय लोककला मंडल ऐसे ही शोज करता है। इन शोज में लकड़ी की कठपुतलियां दांडी यात्रा करती हैं, स्वामी विवेकानंद बनती हैं, काबुलीवाला की पीड़ा दिखाती हैं और कालीबाई का साहस जीती हैं। इस एक घंटे की प्रस्तुति के पीछे महीनों की मेहनत छिपी होती है। लेकिन अफसोस लकड़ियों में किरदारों को ज़िंदा करने वाली यह कला अपने आखिरी दौर में है… मंडल में स्थाई रूप से सिर्फ 3 कलाकार बचे हैं। कठपुतली बनाने-नचाने में रुचि खत्म हो रही है, अब कठपुतली कहानियां नहीं कहतीं, दीवार पर टांगी जाती है 85 साल के कठपुतली निर्माता रामचंद्र शर्मा आज भी लकड़ी, रंग और औजार लेकर काम करते हैं। वे बताते हैं- 1965 में यह काम शुरू किया था। उस दौर में इतना काम होता था कि दिन-रात का फर्क मिट जाता था। ऑर्डर पर ऑर्डर आते थे। आज हालात उलट हैं।कठपुतलियां अब कोई नहीं खरीदता। 35 साल से कला से जुड़े भगवती माली बताते हैं- कठपुतली चलाना सीखने में ही दो महीने लग जाते हैं। कई बार कठपुतली बनाने के दौरान लकड़ी खराब होती है, मेहनत मिट्टी हो जाती है। नैन-नक्श सही नहीं बनेंगे तो दर्शक किरदार नहीं समझेंगे। मोहनलाल डांगी कहते हैं- बेटा कुछ समय के लिए इस काम से जुड़ा, लेकिन मेहनत-धैर्य की मांग देखकर पीछे हट गया। राकेश देवड़ा बताते हैं- परिवार में अकेले यह काम कर रहे हैं। लोगों को पता है कि कठपुतली घर के बाहर टांगी जाती है, लेकिन कम लोग जानते हैं कि कठपुतली थिएटर भी होता है। लोककला मंडल के निर्देशक लईक हुसैन बताते हैं- 14वीं सदी में खिलजी ने जालोर, नागौर पर हमला किया, तब किलों के भीतर सैनिकों को पूर्वजों की शौर्य गाथाएं कठपुतलियों के जरिए दिखाई गईं। कठपुतलियों ने सैनिकों का हौसला बढ़ाया, उन्होंने किले का दरवाजा नहीं खोला, बल्कि लड़े। आज वही कला अपने अस्तित्व के लिए लड़ रही है। ग्रुप में 25 कलाकार थे। 50 देशों में 1000 से ज्यादा शो कर चुके। आज 3 कलाकार ही बचे हैं।


