राजधानी रायपुर के भविष्य को लेकर विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों की राय एक साझा दिशा की ओर इशारा करती है। ट्रैफिक, अधोसंरचना, स्वास्थ्य, शिक्षा और शहरी नियोजन… हर मोर्चे पर ठोस और दीर्घकालीन योजना की जरूरत बताई जा रही है। रोड इंजीनियरिंग से लेकर मेट्रो, इंडस्ट्री, आधुनिक स्वास्थ्य सुविधाएं, गुणवत्ता आधारित शिक्षा और सस्टेनेबल शहरी विकास तक, विशेषज्ञ मानते हैं कि समन्वित प्रयासों के बिना रायपुर स्मार्ट और रहने योग्य शहर नहीं बन सकता। संसाधनों के सही उपयोग, मजबूत पब्लिक सिस्टम और पर्यावरण संतुलन के साथ ही राजधानी का भविष्य सुरक्षित किया जा सकता है। सुरेंद्र कुमार जैन, इन्फ्रास्ट्रक्चर एक्सपर्ट
अब हमारे रायपुर को चाहिए मजबूत इंफ्रास्ट्रक्चर, तभी बनेगा स्मार्ट शहर राजधानी के सर्वांगीण विकास में अधोसंरचना की भूमिका बेहद अहम मानी जा रही है। किसी भी शहर या राज्य की प्रगति उसके संसाधनों के सही उपयोग और दीर्घकालीन योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन पर निर्भर करती है। हालांकि, वर्तमान में एक बड़ी चुनौती यह है कि राज्य के अधिकांश संसाधन मुफ्त योजनाओं और वेतन-भत्तों पर खर्च हो रहे हैं, जिससे अधोसंरचना परियोजनाओं के लिए पर्याप्त वित्तीय संसाधन उपलब्ध नहीं हो पा रहे हैं। नवा रायपुर का समग्र विकास, रायपुर-विशाखापट्टनम इकोनॉमिक कॉरिडोर, मेट्रो या मोनोरेल परियोजना, एयरपोर्ट कनेक्टिविटी और अंतरराष्ट्रीय उड़ानों का विस्तार, औद्योगिक हब और आईटी पार्क का निर्माण प्रमुख हैं। इसके साथ ही शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं का व्यापक विस्तार भी जनहित में आवश्यक बताया गया है। इन परियोजनाओं के सफल क्रियान्वयन के लिए विभागों के बीच बेहतर समन्वय को अनिवार्य बताया गया है। वित्तीय निरंतरता को भी एक बड़ी चुनौती माना जा रहा है। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी द्वारा शुरू की गई प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना को इसका सकारात्मक उदाहरण बताया गया है, जो आज भी निरंतर रूप से संचालित हो रही है। वहीं, पर्यावरणीय स्वीकृति, प्रदूषण की समस्या और गिरते भूजल स्तर जैसी बाधाएं भी अधोसंरचना विकास में चुनौती बनी हैं। रायपुर को लॉजिस्टिक और रिटेल पावरहाउस के रूप में विकसित कर सार्वजनिक-निजी निवेश को बढ़ावा मिलेगा, जिससे विकास को नई दिशा मिलेगी। बाधा या बदलाव – स्काईवॉक ने रोका फ्लाईओवर का रास्ता, गार्डन से आगे बनेगा राजधानी रायपुर में पीडब्ल्यूडी स्काईवॉक का निर्माण कर रहा है। इसके साथ ही यहां फ्लाईओवर के निर्माण का रास्ता हमेशा के लिए बंद हो गया है। राज्य सरकार ने हाल ही में गांधी उद्यान (गुरु तेगबहादुर उद्यान) से तेलीबांधा (नेताजी सुभाष चौक/गुरुनानक चौक) तक 173 करोड़ रुपए की लागत से 4-लेन फ्लाईओवर को मंजूरी दी है। स्काईवॉक का ढांचा नहीं होता तो यह फ्लाईओवर फाफाडीह चौक, देवेंद्र नगर, शास्त्री चौक और घड़ी चौक को जोड़कर बनाया जा सकता था। समर पाटनी, रोड इंजीनियरिंग एक्सपर्ट
ट्रैफिक नियमों के पालन से ही जाम से राहत, बायपास सड़क की भी जरूरत राजधानी में बढ़ते ट्रैफिक दबाव के पीछे लोगों में ट्रैफिक सेंस की कमी बड़ी वजह है। यदि वाहन चालक ट्रैफिक नियमों का पालन करें, तो कई जगहों पर जाम की स्थिति ही पैदा न हो। इसके साथ ही स्मार्ट ट्रैफिक व्यवस्था के लिए बड़े पैमाने पर निर्माण कार्य और नई सड़कों की भी आवश्यकता है। शहर के भीतर एक बायपास सड़क की जरूरत बताई गई है, जिससे ट्रैफिक का दबाव कम किया जा सके। मोवा-सड्डू क्षेत्र की ओर नई सड़क या लंबा ओवरब्रिज बनाया जाना चाहिए, क्योंकि शहर का विस्तार इसी दिशा में तेजी से हो रहा है। टाटीबंध से जोरा तक एक्सेस कंट्रोल हाईवे बनाने की आवश्यकता पर भी जोर दिया गया है। इस मार्ग पर दोनों ओर सर्विस रोड और अंडरपास का निर्माण किया जाना चाहिए। नया एक्सप्रेसवे बनाकर बिलासपुर रोड को सीधे एयरपोर्ट से जोड़ा जाए, ताकि बाहरी क्षेत्रों से आने-जाने वाले वाहनों का समय बचे। वहीं, नवा रायपुर के प्रमुख जंक्शनों का सर्वे कर उन्हें सिग्नल फ्री जंक्शन में बदले जाने की जरूरत है, जिसके लिए अभी से योजना और तैयारी शुरू करनी होगी। शहर में निजी वाहनों का दबाव कम करने के लिए पब्लिक ट्रांसपोर्ट सिस्टम को मजबूत करना भी जरूरी है। इसके तहत एसी बसें चलाई जाएं और हर रूट पर सिटी बस सेवा उपलब्ध कराई जाए। इसके अलावा सिलतरा बायपास को बिलासपुर रोड से जोड़ने के लिए नई एक्सेस कंट्रोल सड़क बनाई जाए, जिससे दुर्ग और रायपुर के बीच ट्रैफिक दबाव कम हो सके। मनीष पिल्लीवार, टाउन प्लानर एंड आर्किटेक्ट
टिकाऊ, समावेशी व जल-संवेदनशील शहर हो वर्ष 2026 तक रायपुर को सस्टेनेबल (टिकाऊ), समावेशी और जल-संवेदनशील शहर के रूप में विकसित करने की जरूरत बताई जा रही है। इसके लिए शहर में वॉक-फ्रेंडली सड़कें, चौड़े फुटपाथ और साइकिल ट्रैक को अनिवार्य रूप से विकसित किया जाना चाहिए। इससे निजी वाहनों की संख्या घटेगी, जाम की समस्या कम होगी और ध्वनि व वायु प्रदूषण में भी कमी आएगी। पब्लिक ट्रांसपोर्ट को प्राथमिकता देना जरूरी है। इसके तहत अधिक से अधिक ई-बसों की सुविधा विकसित की जानी चाहिए, ताकि लोग निजी वाहनों की बजाय सार्वजनिक परिवहन को अपनाएं। इसके साथ ही नई इमारतों में रेन-वॉटर हार्वेस्टिंग, सोलर रूफ और नेचुरल वेंटिलेशन जैसी व्यवस्थाओं को सख्ती से लागू किया जाना चाहिए। शहर के तालाब, नाले और हरित कॉरिडोर को शहरी डिजाइन का अभिन्न हिस्सा बनाया जाना चाहिए, जिससे पर्यावरण संतुलन बना रहे। मिश्रित भूमि उपयोग को बढ़ावा देने से ट्रैफिक का दबाव कम किया जा सकता है। वहीं, पब्लिक स्पेस, बस-स्टॉप और बाजारों को मानव-केंद्रित डिजाइन के तहत विकसित करने पर जोर दिया जा रहा है। यही भविष्य का रायपुर होगा-एक स्वच्छ, सुरक्षित और रहने योग्य शहर। डॉ. जवाहर सूरी सेट्टी, वरिष्ठ शिक्षाविद्
डिग्री पर नहीं, बल्कि शिक्षा पर हो फोकस समय तेजी से बदल रहा है और तकनीक लगातार नई दिशा ले रही है। यह आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का दौर है, जिसमें केवल डिग्री हासिल करना पर्याप्त नहीं रह गया है। ऐसे में प्रदेश में अब शिक्षा व्यवस्था का फोकस डिग्री के बजाय गुणवत्ता आधारित शिक्षा पर होना चाहिए। स्कूली स्तर पर कौशल विकास और समानांतर शिक्षा को प्रभावी रूप से वर्ष 2026 से लागू किया जाना आवश्यक है। प्रदेश में आईआईटी, ट्रिपल आईटी और आईआईएम जैसे प्रतिष्ठित संस्थान मौजूद हैं, लेकिन इनमें प्रदेश के महज एक प्रतिशत विद्यार्थी ही प्रवेश पा रहे हैं। इसे देखते हुए जरूरी है कि प्रदेश के निजी और सरकारी दोनों तरह के शैक्षणिक संस्थानों को कम से कम एनआईटी स्तर की गुणवत्ता के साथ विकसित किया जाए, ताकि अधिक संख्या में छात्रों को बेहतर शिक्षा का अवसर मिल सके। इसके साथ ही बच्चों के बौद्धिक विकास के साथ-साथ शारीरिक विकास पर भी समान रूप से ध्यान देने की जरूरत बताई जा रही है। तकनीकी युग में बच्चों की आउटडोर गतिविधियां लगातार कम होती जा रही हैं, जिससे शारीरिक समस्याओं का खतरा बढ़ रहा है। ऐसे में प्रदेश में पर्याप्त खेलकूद के संसाधन विकसित कर अनुकूल माहौल बनाना जरूरी होगा। ताकि बच्चों को स्वस्थ और संतुलित विकास का अवसर मिले। डॉ विवेक चौधरी, कैंसर विशेषज्ञ व डीन मेडिकल कॉलेज, रायपुर
मेकाहारा से उम्मीद, पर पुरानी मशीनें बनीं चुनौती डॉ. भीमराव अंबेडकर अपस्ताल केवल राजधानी रायपुर ही नहीं, बल्कि पूरे प्रदेश के मरीजों की उम्मीदों का केंद्र है। यहां एक्स-रे से लेकर सोनोग्राफी, सीटी स्कैन, एमआरआई और कैंसर इलाज तक की सुविधाएं निःशुल्क उपलब्ध हैं। हालांकि, अस्पताल में लगी अधिकांश जांच और उपचार से जुड़ी मशीनें पुरानी हो चुकी हैं या अपनी निर्धारित उम्र पूरी करने के करीब हैं, जिसके चलते मरीजों को कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। पुरानी मशीनों को तत्काल बदले जाने की जरूरत है, ताकि जांच और इलाज की गुणवत्ता में सुधार हो सके। इसके अलावा जिला अस्पताल और हमर क्लीनिकों में विशेषज्ञ डॉक्टरों की भारी कमी बनी हुई है। यदि विशेषज्ञों की नियमित पोस्टिंग हो जाए, तो सरकारी अस्पतालों की स्वास्थ्य व्यवस्था काफी हद तक पटरी पर आ सकती है। इसका सीधा असर अंबेडकर अस्पताल पर भी पड़ेगा, जहां मरीजों की भीड़ कम होगी और इलाज के स्तर में सुधार संभव होगा। राजधानी के निजी अस्पतालों में वर्तमान में अंग प्रत्यारोपण की सुविधाएं उपलब्ध हैं। किडनी के साथ-साथ लीवर ट्रांसप्लांट के मामलों में भी लगातार बढ़ोतरी हो रही है। वहीं, शहर के बीच स्थित डॉ. खूबचंद बघेल (डीकेएस) सुपर स्पेशलिटी अस्पताल में अंग प्रत्यारोपण शुरू करने के लिए आवश्यक संसाधन मौजूद बताए जा रहे हैं।


