रुपहले पर्दे पर दिखी जंगल, जल व जमीन बचाने की पुकार

ऑड्रे हाउस में आयोजित दो दिवसीय ‘सीएमएस वातावरण पर्यावरण ट्रैवलिंग फिल्म फेस्टिवल’ का शुक्रवार को समापन हुआ। महानिदेशक डॉ. वसंती राव की अगुवाई में आयोजित इस महोत्सव ने यह साबित कर दिया कि उपदेशों की तुलना में ‘बोलती तस्वीरें’ यानी फिल्में जनमानस पर गहरा प्रभाव डालती हैं। इस फेस्टिवल का मुख्य उद्देश्य जलवायु परिवर्तन (क्लाइमेट चेंज), युवाओं की बदलती सोच और पर्यावरण संकट जैसे गंभीर मुद्दों पर समाज को जागरूक करना था। फेस्ट के दूसरे दिन झारखंड की मिट्टी और संस्कृति से जुड़ी कुल 9 फिल्मों का प्रदर्शन किया गया। इनमें मानसिंह बख्शी की ‘सारी सरजोम’ (मुंडारी/हिंदी), सेराल मुर्मू की ‘संध्यानी’ (संथाली) और बिजू टोप्पो की ‘झरिया’ जैसी प्रमुख फिल्में शामिल रहीं। इन फिल्मों में पर्यावरण के प्रति जनजातीय समुदायों के गहरे जुड़ाव को दिखाया गया।

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