भास्कर न्यूज | जालंधर फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी पर भगवान विष्णु और आंवले के पेड़ की पूजा करने की परंपरा है। होली से पहले आने वाली इस एकादशी को आमलकी एकादशी भी कहते हैं। ये व्रत 27 फरवरी को किया जाएगा। हिंदू पंचांग के अनुसार हर पक्ष की 11वीं तिथि को एकादशी कहा जाता है। पूर्णिमा के बाद आने वाली एकादशी को कृष्ण पक्ष की एकादशी और अमावस्या के बाद आने वाली एकादशी को शुक्ल पक्ष की एकादशी कहा जाता है। अभी फाल्गुन चल रहा है। मान्यता है कि इस दिन भगवान विष्णु की पूजा के साथ आंवले के पेड़ की पूजा करने से मनोकामनाएं पूरी होती हैं। सांसारिक सुख और मोक्ष भी मिलता है। आमलकी एकादशी को आंवला एकादशी, आमलकी एकादशी या रंगभरी एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। रंगभरी एकादशी एकमात्र एकादशी है, जिसका संबंध भगवान शंकर व माता पार्वती से है। रंगभरी एकादशी के दिन भक्त अपने बाबा पर अबीर-गुलाल उड़ाते हैं। भगवान विष्णु को पीला रंग बेहद पसंद है इसलिए इस दिन पीले रंग के कपड़े पहनने से व्रत का पूरा फल मिलता है। आमलकी एकादशी पर केला, केसर या हल्दी का दान करना उत्तम माना जाता है। मान्यता है कि इस दिन आंवले के वृक्ष के नीचे बैठकर भगवान विष्णु की स्तुति, स्रोत पाठ, विष्णु सहस्रनाम जाप तथा आंवले की टहनी की कलश में स्थापना करके पूजन करना चाहिए। पूजन उपरांत आंवले सहित भोजन का दान एवं सेवन करना अति उत्तम होता है। आंवले के सेवन से शीतलता प्राप्त होती है। इस पूजन के प्रभाव से रोग, दोष समाप्त होकर उत्तम स्वास्थ्य तथा सौभाग्य की वृद्धि होती है। आमलकी का अर्थ आंवला होता है। ऐसा कहा जाता है कि भगवान विष्णु ने आंवले को आदि वृक्ष के रूप में प्रतिष्ठित किया था। मान्यता है कि आमलकी एकादशी के दिन आंवला और श्री हरि विष्णु की पूजा करने से मोक्ष मिलता है। आमलकी एकादशी का जिक्र पद्म पुराण में मिलता है। इस पूजा से परिवार में भी सुख और प्रेम का वातावरण बना रहता है। शिव शक्ति मां बगलामुखी धाम के पंडित विजय ने बताया कि आंवले के पेड़ के नीचे पूजा के बाद जरूरतमंद लोगों को धन और अनाज के साथ ही आंवले का दान भी करें। जो लोग इस दिन व्रत करते हैं, उन्हें आंवले का रस पानी में मिलाकर स्नान करना चाहिए। स्नान के बाद सूर्य को जल चढ़ाएं और घर के मंदिर में विष्णु जी के सामने व्रत और पूजा करने का संकल्प लें। पूजा करें और दिनभर निराहार रहें। दूध और फलों का सेवन किया जा सकता है। शाम को सूर्यास्त के बाद विष्णु पूजा करें। तुलसी के पास दीपक जलाएं। अगले दिन सुबह जल्दी उठें, स्नान के बाद पूजा करें और जरूरतमंद लोगों को धन और अनाज का दान करें। भोजन कराएं। इसके बाद खुद भोजन ग्रहण करें।


