लहंगा-ओढ़नी के कपड़े से बनाया कोट-ब्लेजर:मिट्टी और फूलों के कलर की नेचुरल साड़ियां, लोहे के टुकड़ों से बनाते हैं काला रंग

जयपुर में हो रहे हैंडीक्राफ्ट महाकुंभ में जोधपुर, जयपुर चित्तौड़गढ़ समेत देश के विभिन्न राज्यों के आर्टिस्ट पहुंचे हैं। इस बार खास है, दाबू ब्लॉक प्रिंटिंग का कपड़ा, जिसे अक्सर महिलाएं ओढ़नी के लिए उपयोग करती हैं। इसी कपड़े से अब पुरुषों के ब्लेजर, पेंट और शर्ट बनाए जा रहे हैं। जहां पहले दाबू प्रिंट महिलाओं का पहचान हुआ करता था इसका ट्रेंड अब पुरुषों में भी नजर आ रहा है। वहीं इस बार नेचुरल रंग की साड़ियां भी हैं, जिसमें मिट्टी और फूलों के रंगों का इस्तेमाल किया गया है। आर्टिस्ट बताते हैं कि काले रंग के लिए वे लोहे को पानी भिगो कर रखते हैं। अगले दिन उसी के पानी से साड़ियों पर रंग किया जाता है। हैंडीक्राफ्ट महाकुंभ में राजस्थान इंटरनेशनल सेंटर में तीन दिवसीय हैंडीक्राफ्ट महाकुंभ में 60 से ज्यादा स्टॉल लगाए गए। स्टॉल्स पर अलग- अलग स्टेट आर्टिजन की कृतियां शोकेस की गई है। जिनमें जयपुर, मध्य प्रदेश, यूपी, गुजरात, असम, पंजाब, कश्मीर पश्चिम बंगाल और नॉर्थ ईस्ट स्टॉल लगाई हैं। शोकेस हो रही देशभर की हस्तकला इन स्टॉल्स में धाबू ब्लॉक प्रिंटिंग के फेटिया, कश्मिरी शोल, सांझी क्राफ्ट, ब्लू प्रोटरी, अजरक प्रिंट की स्टॉल, दाबू ब्लॉक का फेटिया उड़ीसा का डोकर वर्क की ज्वेलरी और क्राफ्ट आइटम, मिनिएचर पेंटिंग, गुजरात की एम्ब्रॉड्री और विविंग, असम की बुनाई, यूपी से तारकशी का काम शोकेस किया गया है। बंगाल का कांथा, एमपी की छपाई, ट्राइबल आर्टिस्ट की पेंटिंग और कश्मीर के पेपर मेशी को शोकेस किया गया है। पुरुषों को भी भा रहा दाबू प्रिंट हैंडीक्राफ्ट महाकुंभ में चित्तौड़गढ़ जिले के आकोला गांव से आए दाबू ब्लॉक प्रिंटिंग के फेटिया (कपड़ा) आर्टिस्ट योगेश ने बताते हैं- हमारे यहां दाबू ब्लॉक प्रिंटिंग टेक्नीक है और वहां जो फेटिया चुनर बनता है। वहां की छीपा कम्युनिटी 400 साल से इस काम को कर रही है। इसकी क्वालिटी की बात की जाए तो इंडिगो डाई जो की नेचुरल डाई होती है, इस कलर की भी खेती होती है। वहीं जो कॉटन का कपड़ा होता है, वह भी हेल्थ के लिए अच्छा होता। वहां किसान वर्ग की औरतों जो खेतों में काम करती है, वो हैंड ब्लॉक प्रिंटिंग का इस्तेमाल करती हैं। आजकल पुरुष भी इसी कपड़े के ब्लेजर और शर्ट पहन रहे हैं। योगेश ने बताया- इस कपड़े को लेकर वहां का एक ट्रेडिशन है। शादी के बाद महिलाओं को यह कपड़ा पहनना कंपलसरी होता है। एक तरीके से यह उनका एक रिवाज है। छीपा कम्युनिटी जो यह कपड़ा बनाती है उनको वह लहंगा और चुनरी महिलाएं पहनती हैं। लेकिन, धीरे-धीरे समय के साथ नए जमाने में अब यह परंपरा खत्म होती जा रही है। अब ऐसे में हमने उस लहंगे के फेटिये की डिजाइन को पुरुषों के ब्लेजर और अन्य गारमेंट्स में शामिल किया है। यह मान लीजिए कि अब इसमें वेस्टर्न वियर में लाने का सोचा है। ताकि स्थानीय लोगों को और रोजगार मिल सके। इस कपड़े की कीमत लोकल मार्केट में कीमत 200 से 250 रुपए मीटर बिकता है। लेकिन इंटरनेशनल मार्केट में 2000 रुपए से 2500 रुपए तक कपड़ा बिक सकता है। बोद्धि ट्री भी है ख़ास यहां पहुंचने वाले लोगों को बौद्धी ट्री भी पसंद आ रहा है। शिल्पगुरू चंचल चक्रवर्ती ने बताया- यहां डिस्पले आइटम में सबसे खास बौद्धी ट्री है। जो सबको पसंद आ रहा है। इसको शुभ माना जाता है। इसको हाथ से ही बनाया जाता है। जिस तरीके से स्कल्पचर बनते हैं उसी तरीके से मोल्ड लेकर इसकी कास्टिंग की जाती है। फिर इसकी फिनिशिंग और वेल्डिंग करके, उनकी डिटेलिंग करके, हीट ट्रीटमेंट भी किया जाता है। ताकि यह जल्दी से टूट न जाए। यह ब्रास और पीतल का होता है। इसको बनाने में करीब 2 से 3 महीने लगे। इसकी कीमत 54 हजार रुपए है। नेचुरल कलर से बन रहीं साड़ियां ​​​​​​​जोधपुर के पीपाड़ सिटी से डाबू ब्लॉक प्रिंट की साड़िया बनाने वाले मोहम्मद यासिन छीपा ने बताया- हम लोग दाबू ब्लॉक प्रिंट की साड़ियां बनाते हैं। यह टसर सिल्क में हम मिट्टी से प्रिंट करते हैं। यह टसर रॉ सिल्क रायपुर छापा से आती है। इस रॉ सिल्क पर मिट्टी से प्रिंट की जाती है। यह हमारा पुश्तैनी काम है। हम चार पीढ़ी से यह काम कर रहे हैं। इन साड़ियों को बनाने के लिए ग्रे माला आता है उसे केस्टर ऑयल में डुबोया जाता है। फिर इसको मिट्टी से प्रिंट किया जाता है। उन्होंने बताया- यह सारे कलर नेचुरल कलर होते हैं। इंडिगो कलर पत्तियों से लिया जाता है। यह पत्तियां पांडिचेरी से आता है। येलो कलर के लिए जो बच्चों को अरहड़ दिया जाता है, उससे लिया जाता है। रेड कलर के लिए धावड़ी के फूलों से लिया जाता है। धावड़ी के फूलों को एक घंटा गर्म करने के बाद उससे रंगा जाता है। वहीं ब्लैक कलर के लिए केमिकल का इस्तेमाल नहीं किया जाता है। आयरन के टुकडों को पानी में भिगो कर 15 दिन रखा जाता है। फिर उसका एस्टेग निकलता है उस पानी से कलर किया जाता है। यह टसर सिल्क की साड़ी 3 हजार से लेकर 10 हजार रुपए तक की मिल जाती है। जयपुर के राजस्थान इंटरनेशनल सेंटर(RIC) में कला और शिल्प उत्सव का 17 से 18 दिसंबर तीन दिवसीय आयोजन हो रहा है। यहां हाथ से बने हैंडीक्राफ्ट उत्पादों का डिस्प्ले किया गया। यहां शिल्पकारों के हस्त शिल्प उत्पाद प्रदर्शित किए गए हैं।

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