डीग में लैंगिक अपराधों से जुड़े मामलों में झूठी रिपोर्ट दर्ज कराना अब परिवादियों को भारी पड़ सकता है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि किसी प्रकरण में आरोप असत्य पाए जाते हैं और परिवादी द्वारा जानबूझकर विरोधाभासी बयान दिए जाते हैं, तो ऐसे परिवादियों के खिलाफ कानून के तहत सख्त आपराधिक कार्रवाई की जाएगी। जिला एवं सेशन न्यायालय में कार्यरत लोक अभियोजक राकेश खंडेलवाल ने बताया कि न्यायालय में लंबित एक मामले ‘सरकार बनाम लेखराज’ में परिवादी द्वारा लगाए गए आरोप न्यायिक जांच और साक्ष्य परीक्षण के दौरान झूठे सिद्ध हुए हैं। परिवादी ने 14 सितंबर 2024 को पुलिस थाना कुम्हेर में एक रिपोर्ट दी थी। इस रिपोर्ट में अभियुक्तों को नामजद करते हुए पीड़ित के विरुद्ध गंभीर लैंगिक अपराध किए जाने का विस्तृत विवरण अंकित किया गया था। रिपोर्ट के आधार पर पुलिस ने एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की। पुलिस जांच के दौरान परिवादी ने अपने कथनों का समर्थन करते हुए बयान दिए, आवश्यक साक्ष्य उपलब्ध कराए और अनुसंधान से संबंधित दस्तावेजों पर अपने हस्ताक्षर होना भी स्वीकार किया। पूरे अनुसंधान काल में परिवादी ने सहयोग किया, जिससे प्रथम दृष्टया आरोप गंभीर प्रतीत हुए। कोर्ट में अपने बयान से पलटा
लेकिन जब मामला कोर्ट में अन्वीक्षा (जिरह) के चरण में पहुंचा, तो परिवादी ने अपने ही पूर्ववर्ती कथनों से पूरी तरह पलटते हुए यह स्वीकार किया कि अभियुक्तों द्वारा किसी भी प्रकार का कोई अपराध कारित नहीं किया गया था। हालांकि, इस दौरान परिवादी ने यह भी स्वीकार किया कि तहरीरी रिपोर्ट, प्राथमिकी और अनुसंधान के दौरान तैयार किए गए अभिलेखों पर उसके ही हस्ताक्षर हैं। जानबूझकर झूठे आरोप लगाए
न्यायालय ने पाया कि परिवादी द्वारा अनुसंधान और विचारण के विभिन्न चरणों पर भिन्न-भिन्न और परस्पर विरोधी कथन दिए गए। इस विरोधाभासी व्यवहार के कारण अभियुक्तों को दोषमुक्त किया गया। न्यायालय की दृष्टि में यह स्पष्ट हुआ कि परिवादी द्वारा जानबूझकर मिथ्या साक्ष्य गढ़े गए, जिससे न्याय प्रक्रिया को प्रभावित करने का प्रयास किया गया। कोर्ट ने परिवादी के खिलाफ दिए आदेश
इन तथ्यों के आधार पर जिला एवं सेशन न्यायालय डीग ने सख्त रुख अपनाते हुए भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता में वर्णित प्रावधानों के अंतर्गत परिवादी के विरुद्ध अलग से आपराधिक कार्रवाई के आदेश पारित किए। कोर्ट ने मिथ्या साक्ष्य गढ़ने के अपराध में परिवादी के खिलाफ कार्यवाही प्रारंभ करने के आदेश दिए हैं। साथ ही, धारा 379 भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता में निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट डीग के समक्ष न्यायालय के रीडर को परिवाद प्रस्तुत करने का आदेश दिया गया है, ताकि परिवादी के कृत्य की विधिक जांच कर उचित दंड सुनिश्चित किया जा सके। यह निर्णय समाज और न्याय व्यवस्था के लिए एक महत्वपूर्ण संदेश है कि लैंगिक अपराध जैसे संवेदनशील मामलों में झूठे आरोप लगाकर कानून का दुरुपयोग करने वालों को अब बख्शा नहीं जाएगा और उनके खिलाफ भी उसी सख्ती से कार्रवाई होगी, जैसी किसी अन्य अपराधी के खिलाफ की जाती है।


