बिल्डरों से आम लोगों को राहत दिलाने में रेरा की कोशिशें फेल होती जा रही हैं। अप्रैल 2018 में रेरा के बनने के बाद से अब तक करीब सात साल में करीब 3000 शिकायतें रेरा में की गई हैं। इसमें आधे से ज्यादा दस्तावेजों या प्रमाण की कमी के आधार पर खारिज कर दी गई। रेरा में भले ही शिकायत करना आसान है, लेकिन सुनवाई के दौरान शिकायतकर्ता से इतने दस्तावेज मांगे जाते हैं कि ज्यादातर लोग उसे जमा नहीं कर पाते हैं। यही वजह है कि शिकायतें खारिज कर दी जा रही हैं। रेरा में सालभर में औसतन 400 से भी कम शिकायतें हो रही हैैं। छत्तीसगढ़ की तुलना में महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश जैसे राज्यों में हर साल 10 हजार से ज्यादा शिकायतें दर्ज की जा रही हैं। रेरा में पूरे प्रदेश से ऑनलाइन शिकायत करने का विकल्प है। शिकायत के लिए न्यूनतम एक हजार रुपए शुल्क ही तय किया गया है। इसके बावजूद लोग शिकायत करने में ज्यादा दिलचस्पी नहीं ले रहे हैं। रेरा की वेबसाइट के अनुसार अप्रैल 2018 से मई 2025 तक 2486 मामलों की सुनवाई की गई है। रेरा में इस तरह की शिकायतें बैन लगाने के बाद जांच तक नहीं करते सात साल में प्रोजेक्ट में बड़ी गड़बड़ी करने वाले करीब 10 बिल्डरों की खरीदी-बिक्री पर रोक लगाई गई थी। इसमें ज्यादातर रायपुर के बिल्डर थे। इस तरह के प्रोजेक्ट में प्लॉट, बंगले, मकान या फ्लैट की खरीदी-बिक्री पर रोक के लिए जिला पंजीयक को चिट्ठी लिखी गई थी। चिट्टी लिखने के बाद रेरा के अफसर एक बार भी इस बात की जांच नहीं करते हैं कि बिल्डरों के इस प्रोजेक्ट पर रोक लगाई गई है या नहीं। ऐसे में बिल्डर पंजीयन अफसरों के साथ मिलकर बिना किसी रोक-टोक के अपनी प्रॉपर्टी की बिक्री करते हैं। कुछ बिल्डरों ने बाद में अपना मामला ही रेरा से खत्म करवा लिया।


