गुमला|लौकी बेलदार सब्जी फसलों में से एक है, जिसकी खेती जिले में की जाती है। यह पौष्टिक, सुपाच्य और कम लागत में अधिक उत्पादन देने वाली फसल है। जिला कृषि विज्ञान केंद्र के कृषि वैज्ञानिक अटल तिवारी ने बताया कि लौकी में पानी की मात्रा अधिक होती है, जिससे यह गर्मी के मौसम में स्वास्थ्य के लिए बहुत लाभकारी मानी जाती है। इसकी खेती ग्रीष्म, वर्षा व जायद तीनों मौसमों में सफलता पूर्वक की जा सकती है। उन्होंने कहा कि लौकी की खेती के लिए गर्म और आर्द्र जलवायु सबसे उपयुक्त होती है।इसके अच्छे विकास के लिए 25 से 35 डिग्री सेल्सियस तापमान आदर्श माना जाता है। पाला और अत्यधिक ठंड फसल को नुकसान पहुंचाती है। मिट्टी की बात करें तो अच्छी जल निकास वाली दोमट या बलुई दोमट मिट्टी लौकी के लिए सर्वोत्तम रहती है। मिट्टी का पीएच मान 6.0 से 7.5 के बीच होना चाहिए। लौकी की उन्नत किस्मों में पूसा नवीन, पूसा संदेश, अर्का बहार, नरेंद्र लौकी-1 व नरेंद्र लौकी-2 प्रमुख हैं। इसके अलावा कई संकर किस्में भी बाजार में उपलब्ध हैं, जो अधिक उत्पादन देती हैं। बुवाई का समय मौसम पर निर्भर करता है। ग्रीष्मकालीन फसल के लिए जनवरी-फरवरी, खरीफ के लिए जून-जुलाई और रबी के लिए अक्टूबर-नवंबर उपयुक्त समय है। लौकी की बुवाई बीज द्वारा की जाती है। बीज दर लगभग 2.5 से 3.0 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर पर्याप्त होती है। बुवाई से पहले बीज को फफूंद नाशक दवा या ट्राइकोडर्मा से उपचारित करना लाभदायक रहता है। बीज 2-3 सेंटीमीटर गहराई पर गड्ढों में बोए जाते हैं। पौधे से पौधे की दूरी 1-1.5 मीटर और कतार से कतार की दूरी 2-2.5 मीटर रखनी चाहिए। उन्होंने कहा कि खाद व उर्वरक प्रबंधन में 20-25 टन सड़ी हुई गोबर की खाद प्रति हेक्टेयर खेत की तैयारी के समय डालनी चाहिए। आप खेती-किसानी से जुड़े किस विषय पर जानकारी चाहते हैं, वॉट्सएप नंबर 94314 21095 पर सिर्फ मैसेज करें।


