छत्तीसगढ़ के धमतरी में वट सावित्री का पर्व धूमधाम से मनाया गया। शहर के विभिन्न स्थानों पर बरगद के पेड़ों के नीचे व्रती महिलाएं बड़ी संख्या में एकत्र हुईं। महिलाओं ने सोलह श्रृंगार कर विधिवत पूजा-अर्चना की। उन्होंने वट वृक्ष में कच्चा सूत लपेटा और सात परिक्रमा की। व्रती महिलाओं ने हाथ में भीगा चना लेकर सावित्री-सत्यवान की कथा सुनी। इसके बाद भीगा चना, रुपये-पैसे और वस्त्र अपनी सास को देकर आशीर्वाद लिया। रायपुर से भी कई महिलाएं धमतरी पहुंचीं। यह परंपरा कई वर्षों से चली आ रही है। महिलाओं ने परिवार में सुख, शांति और समृद्धि के लिए प्रार्थना की। पूजा सामग्री के साथ पहुंची महिलाओं ने लगभग दो घंटे तक पूजा-अर्चना की। अंत में वट वृक्ष की कोपल खाकर उपवास तोड़ा। पति की लंबी उम्र के लिए महिलाओं ने रखा वट सावित्री व्रत कुछ महिलाएं जहां कई वर्षों से यह व्रत कर रही हैं, वहीं कुछ ने इस साल पहली बार वट सावित्री का व्रत रखा। पहली बार व्रत रखने वाली महिलाओं ने बताया कि आज वट सावित्री पर्व है, जो सौभाग्यवती स्त्रियों के लिए बेहद खास माना जाता है। इस अवसर पर वे वार्ड में स्थित पुराने बरगद के पेड़ के नीचे एकत्र हुईं। पूजा के दौरान उन्होंने पेड़ के चारों ओर कच्चे धागे से 11 फेरे लगाए, सिंदूर चढ़ाया और भेंट अर्पित की। इसके बाद महिलाओं ने अपने बड़ों को सिंदूर लगाकर आशीर्वाद लिया। व्रती महिलाओं ने कहा कि यह व्रत पति की दीर्घायु और पारिवारिक कल्याण के लिए रखा गया है। पहली बार व्रत रखने वाली महिलाओं ने अनुभव साझा करते हुए कहा कि यह दिन उनके लिए बेहद खास रहा और उन्होंने इस अवसर से बहुत कुछ सीखा। उन्होंने यह भी संकल्प लिया कि वे आगे भी इस परंपरा को निभाते हुए व्रत रखेंगी। सावित्री-सत्यवान की कथा से मिली प्रेरणा महिलाओं ने बताया कि यह व्रत सावित्री और सत्यवान की कथा पर आधारित है, जिसमें सावित्री ने अपने पति सत्यवान के प्राण यमराज से वापस ले आए थे। यह कथा महिलाओं को धैर्य, समर्पण और प्रेम की प्रेरणा देती है। उसी भावना से महिलाएं भगवान से प्रार्थना करती हैं कि उनके परिवार में सुख, शांति और समृद्धि बनी रहे। सोलह शृंगार कर पहुंचीं व्रती महिलाएं व्रती महिलाओं ने व्रत के अनुसार सोलह श्रृंगार कर बरगद पेड़ के पास पहुंचकर सावित्री-सत्यवान की कथा सुनी। उन्होंने बर के पत्ते पर सावित्री-सत्यवान का नाम लिखकर पूजा की और कच्चे धागे से पेड़ की परिक्रमा की। पूजा के पश्चात हल्दी, कुमकुम और सिंदूर का आदान-प्रदान किया। अंत में सभी ने पीपल का फोंक और ढाई चना से बना विशेष शरबत पीकर व्रत पूर्ण किया।


